Srishti Khanda Extracted Page 122
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-122
Sanskrit Original
कुरुक्षेत्रं महापुण्यं यत्र मार्गोपि लक्ष्यते । अद्यापि पितृतीर्थं तु सर्वकामफलप्रदम् ॥१४॥ नीलकण्ठमिति ख्यातं पितृतीर्थं नराधिप । तथा भद्रसरः पुण्यं सरो मानसमेव च ॥१५॥ मंदाकिनी तथाच्छोदा विपाशा च सरस्वती । सर्वमित्रपदं तद्ददवैद्यनाथं महाफलम् ॥१६॥ क्षिप्रा नदी तथा पुण्या तथा कालंजर शुभम् । तीर्थोद्धेदे हरोद्धेदं गर्भभेदं महालयम् ॥१७॥ भद्रेश्वरं विष्णुपदं नर्मदाद्वारमेव च । गयापिंडप्रदानेन समान्याहुर्महर्षयः॥ १ ८॥ एतानि पितृतीर्थानि सर्वपापहराणि च । स्मरणादपि लोकानां किमु श्राद्धप्रदायिनाम् ॥१९॥ ॐकारं पितृतीर्थं तु कावेरी कपिलोदकम् । संभेदश्चण्डवेगायां तथैवामरकंटकम् ॥२०॥ कुरुक्षेत्राच्चद्विगुणं तस्मिन्स्नानादिकं भवेत् । शुक्लतीर्थं तु विख्यातं तीर्थं सोमेश्वरं परम् ॥२९॥ सर्वव्याधिहरं पुण्यं फलं कोटिगुणाधिकम् । श्राद्धे दाने तथा होमे स्वाध्याये चापि सन्निधौ॥ २२॥ कायावारोहणं नाम देवदेवस्य शूलिनः। अवतारं रोचमानं ब्राह्मणावसथे शुभे ॥२३॥ जातं तत् सुमहापुण्यं तथा चर्मण्वती नदी । शूलतापी पयोष्णी च पयोष्णीसंगमस्तथा ॥२४॥ महौषधी चारणा च नागतीर्थप्रवर्त्तिनी । महावेणा नदीपुण्या महाशालस्तथैव च ॥२५॥ गोमती वरुणा तद्दत्तीर्थं हौताशनं परम् । भैरवं भृगुतुंगं च गौरीतीर्थमनुत्तमम्॥२६॥ तीर्थं वैनायकं नाम वस्त्रे्वरमनुत्तमम् । तथा पापहरं नाम पुण्या वेत्रवती नदी॥२७॥ महारुद्रं महालिंगं दशार्णा च महानदी । शतरुद्रा शताह्वा च तथा पितृपदं पुरम् ॥२८॥ अंगारवाहिकातद्दन्नदौ द्वौ शोणघर्घरौ। कालिका च नदी पुण्या पितरा च नदी शुभा॥२९॥ इक्षुमती नामक तीर्थ पितरों का कल्याण करने वाला है । जहाँ पर गङ्गा एवं यमुना का सङ्गम है वहाँ पर श्राद्ध करने से पितृगण सदैव तृप्त रहते हैं ॥१३॥ कुरुक्षेत्र अत्यन्त पुण्यप्रद तीर्थ है, वहाँ पर आज भी सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले पितृतीर्थ का मार्ग दिखायी देता है ॥१४॥ हे राजन् ! नीलकण्ठ नामक पितृतीर्थ विख्यात है । इसी तरह का भद्रसर और मानसरोवर तीर्थ है । मन्दाकिनी, अच्छोदा, विपाशा, सरस्वती, सर्वमित्रपद, तथा महान फल देने वाला वैद्यनाथ तीर्थ है ॥१५-१६॥ उसी तरह परम पवित्र क्षिप्रा नदी और कालंजरगिरि तीर्थ हैं । तीर्थोद्रेद, हरोद्धेद, गर्भोद्भेद महालय ॥१७॥ भद्रेश्वर, विष्णुपद, नर्मदाद्वार (अमरकण्टक) तथा गया इन तीर्थो में पिण्डदान करने से एक समान फल होता है, यह महर्षियों ने कहा है ।।१८।! ये सभी पितृतीर्थ स्मरण करने मात्र से भी सभी पापों को विनष्ट कर देने वाले हैं, जो लोग इन तीर्थो में पिण्डदान करते हैं उनके पुण्य के विषय में क्या कहना है?।।१९॥ ओह्कार तीर्थ, कावेरी नदी, कपिला का जल, चण्डवेगा नदी में मिली हुयी नदियों के सङ्गम का जल तथा अमर कण्टक ये सभी पितृतीर्थ हैं ॥२०॥ अमरकण्टक में स्नान आदि करने से कुरुक्षेत्र की अपेक्षा दश गुना फल होता है । विख्यात शुक्ल तीर्थ तथा महान् सोमेश्वर तीर्थ ॥२१॥ ये सभी व्याधियों के विनाश करने वाले हैं । यहाँ पर श्राद्ध, दान, होम, स्वाध्याय तथा निवास करने से अन्य तीर्थो की अपेक्षा करोड़ गुना अधिक पुण्य होता है ॥२२॥ कायावार नामक महान् तीर्थ में किसी तेजस्वी ब्राह्मण के घर में भगवान् शङ्कर का अवतार हुआ था ॥२३॥ वह तीर्थ अत्यन्त पवित्र है । चर्मण्वती, शूलतापी, पयोष्णी तथा पयोष्णी का सङ्गम ॥२४॥ महौषधी, चारणा, नागतीर्थपरवर्तिनी, अत्यन्त पवित्र महावेणा नदी, महाशाला ॥२५॥ गोमती, वरुणा, हुताशनपुर, भैरवतीर्थ, महान् भृगुतीर्थ, श्रेष्ठ गौरी तीर्थ ॥२६॥ वैनायक नामक तीर्थ, श्रेष्ठ वस्नेश्वर तीर्थ, पापहर तीर्थ, पवित्र वेत्रवती (बेतवा) नदी ॥२७॥ महारुद्र तीर्थ, महालिङ्ग तीर्थ, दशार्णा नदी, महानदी, शतरुद्रा नदी, शताह्न नदी, पितृपद पुर ॥२८॥ अङ्गारवाहिका नदी,
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