Srishti Khanda Extracted Page 121

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-121

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Sanskrit Original

ग्यारहवाँ अध्याय भीष्म उवाच कस्मिन्वासरभागे तु श्राद्धी श्राद्धं समाचरेत्। तीर्थेषु केषु वै श्राद्धं कृतं बहुफलं द्विज॥१॥ पुलस्त्य उवाच तीर्थ तु पुष्करं नाम चत्तु श्रेष्ठतमं स्मृतम्। सर्वेषां द्विजमुख्यानां मनोरथमिव स्थितम् ॥२॥ तत्र दत्तं हुतं जप्तमनन्तं भवति ध्रुवम् । पितृणां वल्लभं नित्यमृषीणां परमं मतम् ॥३॥ नंदाथ ललिता तदइत्तीर्थमायापुरी शुभा । तथामित्रपदं राज॑स्ततः केदारमुत्तमम् ॥४॥ गंगासागरमित्याहुः सर्वतीर्थमयं शुभम् । तीर्थं ब्रह्मसरस्तददच्छतद्रुसलिलं शुभम् ॥५॥ तीर्थ तु नैमिषं नाम सर्वतीर्थफलप्रदम् । गंगोद्धेदस्तु गोमत्यां यत्रोद्धूतः सनातनः ॥६॥ तथा यज्ञवराहस्तु देवदेवश्च शूलधृक् । यत्र तत्कांचनं दानमष्टादशभुजो हरः ॥७॥ नेमिस्तु धर्मचक्रस्य शीर्णा यत्राभवत्पुरा । तदेतन्नैमिषारण्यं सर्वतीर्थनिषेवितम् ॥८॥ देवदेवस्य तत्रापि वराहस्य च दर्शनम् । यः प्रयाति स पूतात्मा नारायणपुरं व्रजेत् ॥९॥ कोकामुखं परं तीर्थमिन्द्रमार्गोऽपि लक्ष्यते। अथापि पितृतीर्थं ब्रह्मणोव्यक्तजन्मनः ॥१०॥ पुष्करारण्यसंस्थोसौ यत्र देवः पितामहः । विरिंचिदर्शनं श्रेष्ठमपवर्गफलप्रदम् ॥९९॥ कृतं नाम महापुण्यं सर्वपापनिषूदनम् । यत्राद्यो नारसिंहस्तु स्वयमेव जनार्दनः ॥१२॥ तीर्थमिक्षुमती नाम पितृणां च शुभावहा। तुष्यन्ति पितरो नित्यं गंगायमुनसंगमे ॥१३॥ श्राद्धयोग्य प्रशस्त स्थानों का वर्णन, सत्य, दया, इन्द्रिय, निग्रह, तथा शम आदि के तीर्थत्व का वर्णन तथा श्राद्ध के योग्य प्रशस्त काल का वर्णन भीष्मजी ने कहा-- हे द्विज ! श्राद्ध करने वाले को दिन के किस भाग में श्राद्ध करना चाहिए ? किन तीर्था में किया हुआ श्राद्ध अधिक फलप्रद होता है ? पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- पुष्कर नामक तीर्थ सबसे श्रेष्ठ माना गया है । वह सभी श्रेष्ठ द्विजों के मनोरथ के समान माना गया है ॥२॥ वहाँ पर किया गया होम, दान, जप अनन्त फलप्रद होता है, इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है । वह ऋषियों तथा पितरों को अत्यन्त प्रिय तीर्थ है ॥३॥ इसके अतिरिक्त नन्दा, ललिता तथा मायापुरी (हरिद्वार) भी पुष्कर ही समान तीर्थ हैं । उससे बढकर मित्र पट तथा उससे बढकर केदार तीर्थ है ॥४॥ गङ्गासागर को सर्वतीर्थमय बतलाया गया है । उसी तरह का तीर्थ ब्रह्म सरोवर है, तथा शतद्रु का जल शुभ है ॥५॥ नैमिष तीर्थ सभी तीर्थो का फल प्रदान करने वाला है । नैमिष तीर्थ में गोमती नदी में गङ्गा नदी का सनातन श्रोत उत्पन्न हुआ है । वहाँ पर भगवान् यज्ञवराह तथा भगवान् शूलपाणि विराजते हैं । वहाँ सुवर्ण का दान दिया जाता है । वहाँ पर अठारह भुजाओं वाली भगवान् शङ्कर की मूर्ति है ॥७॥ नैमिषारण्य में ही धर्मचक्र की नेमि शीर्ण हो गयी थी, वह सभी तीर्थो से सेवित नैमिष तीर्थ है ।॥८॥ वहाँ देवाधिदेव बराह का दर्शन जो कोई भी करता है, वह पवित्र होकर भगवान् नारायण के लोक में जाता है ॥९॥ कोकामुख नामक तीर्थ भी श्रेष्ठ तीर्थ है, वहाँ पर इन्द्रमार्ग का दर्शन होता है । यहाँ पर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी का पितृतीर्थ है॥ १०॥ वहाँ के पुष्करारण्य में विद्यमान ब्रह्माजी का दर्शन मोक्षरूपी फल प्रदान करने वाला है ॥११। कृत नामक तीर्थ सभी पापों का विनाश करने वाला है । वहाँ पर स्वयं भगवान् जनार्दन आद्यनृसिंह रूप में विराजमान हैं ॥१२॥

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