Srishti Khanda Extracted Page 120
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-120
Sanskrit Original
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य सपपात शुचान्वितः । जातिस्मरत्वमगमत्तौ च मंत्रिवरात्मजौ ॥९१५॥ कामशास्त्रप्रणेता तु बाभ्रव्यः स तु बालकः । पंचाल इति लोकेषु विश्रुतः सर्वशास्त्रवित् ॥११६॥ पुंडरीकोपि धर्मात्मा वेदशास्तरप्रवर्तकः । भूत्वा जातिस्मरो शोकात्पतितावग्रतस्तथा ॥११७॥ हा वयं कर्मविश्रष्टा: कामतः कर्मबंधनात् । एवं विलप्यबहुशस्त्रयस्ते योगपारगाः ॥११८॥ विस्मयाच्छाद्धमाहाम्यमभिनंद्य पुनः पुनः । स तु तस्मै धनं दत्त्वा प्रभूतग्रामसंयुतम् ॥१९९॥ विसृज्य ब्राह्मणं तं च वृद्धं धनमदन्वितम् । आत्मीयं नृपतिः पुत्रं नृपलक्षणसंयुतम् ॥१२०॥ विष्वक्सेनाभिधानं च राजा राज्येभ्यषेचयत् । मानसे सलिले सर्वे ततस्ते योगिनांवराः ॥९२९॥ ब्रह्मदत्तादयस्तस्मिन्पितृभक्ता विमत्सराः । सन्नतिश्चाभवद्धृष्टा मयैव तव दर्शितम् ॥१२२॥ राजन्योगफलं सर्व॑ यदेतदभिलक्ष्यते। तथेति प्राह राजापि पुरस्तादभिनंदयन् ॥१२३॥ त्वत्प्रसादादिदं सर्व मयैवं प्राप्यते फलम् । ततस्ते योगमास्थाय सर्व एव वनौकसः ॥१२४॥ ब्रह्मरंप्रेण परमं पदमापुस्तपोबलात् ॥१२५॥ एवमायुर्धनं विद्यां स्वर्गमोक्षसुखानि च । प्रयच्छंति सुतं राज्यं नृणां तुष्टाः पितामहाः ॥१२६॥ इदं च पितृमाहात्म्यं ब्रह्मदत्तस्य वै नृप । द्विजेभ्यः श्रावयेद्विदान् शृणोति पठतेपि वा वी कल्पकोटिशतं साग्रं ब्रह्मलोके महीयते ॥१२७॥ इति श्रीपदामहापुराणे प्रथमे रुष्टिखंडे पितृमाहात्म्यकथनं नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥ ie तथा उसके दोनों जो मंत्री थे वे पुन: जातिस्मर हो गये ॥११५॥ वह बालक बाभ्रव्य कामशास्त्र का प्रणेता हुआ । वह सभी शास्रों का ज्ञाता हुआ तथा लोक में पञ्चाल के नाम से विख्यात हुआ ॥११६॥ धर्मात्मा पुण्डरीक भी वेदशास्त्र का प्रवर्तक था वह जाति स्मर होकर उन दोनों के समक्ष शोक संतप्त होकर गिर पड़ा ॥११७॥ हाय ! हमलोग काम के कारण योगभ्रष्ट हो गये । इस तरह से वे तीनों योगी बहुत अधिक विलाप करके ॥११८॥ विस्मय पूर्वक श्राद्ध को महिमा का वार-वार अभिनन्दन किये ब्रह्मदत्त ने उस ब्राह्मण को प्रभूत धन सम्पत्ति तथा ग्राम प्रदान किया॥११९॥ उस ब्राह्मण को विदा करके धन के मद से युक्त अपने पुत्र को जो राजा के लक्षण से युक्त था ॥१२०॥ जिसका नाम विष्वक्सेन था उसको अपने राज्य पर अभिषिक्त कर दिया । उसके बाद वे सभी ब्रह्मदत्त इत्यादि श्रेष्ठ योगी मानसरोवर के जल में मत्सर रहित होकर पितृभक्त हो गये । सन्नति भी यह कहती हुयी प्रसन्न हो गयी कि आपने मुझे दिखा दिया ॥१२१-१२२॥ हे राजन् ! यह सब जो दिखायी देता है, योग का फल है । उसके समक्ष अभिनंदन करते हुए राजा ने भी कहा-- हाँ ऐसी ही बात है ॥१२३॥ तुम्हारी कृपा से मुझे यह सब फल प्राप्त हो रहा है॥१२३-१२४॥ उसके बाद वे सभी वनवासी योग को धारण करके, अपनी तपस्या के बल से ब्रह्मरन््र से उत्क्रमण करके परमपद को प्राप्त कर लिए ॥१२५॥ इसतरह प्रसन्न होकर पितृगण, श्राद्ध कर्ता को आयु, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष तथा सुख प्रदान करते हैं ॥१२६॥ हे राजन् ! यह जो ब्रह्मदत्त का पितृ माहात्म्य है ।विद्वान् को चाहिए कि वह द्विजों को सुनाये, अथवा जो ब्राह्मणों से इसे सुनता है वह सौ करोड़ कल्पों से भी अधिक काल तक ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है ॥१२७॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के पितृमाहात्म्य वर्णन नामक दशवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ९१०।। ——
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