Srishti Khanda Extracted Page 119

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-119

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Sanskrit Original

सर्वसत्वरुतज्ञं मे देहि योगिनमात्मजम् । एवमस्त्विति विश्वात्मा तमाह परमेश्वरः॥१०१॥ पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवांतरधीयत । ततः स तस्य पुत्रोभूद्वह्मदत्तः प्रतापवान् ॥१०२॥ सर्वसत्वानुकंपी च सर्वसत्त्वबलाधिकः । सर्वसत्त्वरुतज्ञश्च सर्वसत्त्वेश्वरेश्वरः ॥१०३॥ अथ सत्त्वेन योगात्मा स पिपीलकमागतः। यत्र तत्कीटमिथुनं रममाणमवस्थितम्॥९०४॥ ततः सा सन्नतिर्दष्ट्वा प्रहसंतं सुविस्मितम्। किमप्याशंकमाना सा तमपृच्छन्नरेश्वरम् ॥९०५॥ सन्नतिरुवाच अकस्मादितिहासोऽयं किमर्थमभवन्नप । हास्यहेतुं न जानामि यदकाले कृतं त्वया॥१०६॥ अवदद्राजपुत्रोऽसौ तं पिपीलिकभाषितम् । रागवद्विर सोत्पन्नमेतद्धास्यं वरानने॥ १ ०७॥ नचान्यत्कारणं किंचिद्धास्यहेतुः शुचिस्मिते । न सामन्यत तं देवी प्राहालीकमिदं तव ॥१०८॥ अहमेवेह हसिता न जीविष्ये त्वयाधुना । कथं पिपीलिकालापं मर्त्यो वेत्ति सुरादृते ॥१०९॥ तस्मात्त्वयाऽहमेवाद्य हसिता किमतः परम् । ततो निरुत्तरो राजा जिज्ञासुस्तद्वचो हरेः॥९९०॥ आस्थाय नियमं तस्थौ सप्त रात्रमकल्मषः । स्वप्नान्ते प्राह तं ब्रह्मा प्रभाते पर्यटन्पुरम् ॥९९९॥ वृद्धद्विजोत्तमाद्वाक्यं सर्व ज्ञास्यति ते प्रिया । इत्युयुक्त्वांतर्दधे ब्रह्मा प्रभाते च नृपः पुरात्॥९९२॥ निर्गच्छन्मन्त्रिसहितः सभार्यो वृद्धमग्रतः। गदंतं विप्रमायांतं वृद्धंच स ददर्श ह ॥९९३॥ ब्राह्मण उवाच ये विप्रमुख्याः कुरुजांगलेषु दाशास्तथा दाशपुरे मृगाश्च । कालजंरे सप्त च चक्रवाका ये मानसे तत्र वसंति सिद्धाः ॥९९४॥ करें । ऐसा ही हो; यह कहकर विश्वात्मा परमेश्वर ॥१०१॥ ब्रह्माजी सबों के देखते ही देखते अन्तर्धान हो गये । उसके बाद उस अणुह के प्रतापी पुत्र ब्रह्मदत्त हुए ॥१०२॥ वे सभी जीवों पर कृपा करने वाले तथा सभी जीवों से अधिक बलवान् थे । वे सभी जीवों की ध्वनि को जानने वाले तथा सभी जीवों के नियामक थे ॥१०३॥ उसके वाद वे योगात्मा उस चींटी के पास आये जहाँ पर वे दोनों कीट रमण करते हुए विद्यमान थे ॥१०४।॥ उसके बाद उनकी पत्नी सन्नति उनको जोर से हँसते हुए देखकर कुछ आशं५, करके राजा से पूछी ॥१०४-१०५॥ सन्नति ने कहा-- राजन् ! आप अकस्मात् इतना अधिक क्यों हँसे बिना किसी कारण के इतनी हँसी का कारण क्या है?॥१०६॥ उसके बाद राजा ने उस चींटी की वाणी को बतलाया और कहा-- सुमुखि ! इस वाणी को सुनकर मुझे हँसी आ गयी ॥१०७॥ हे शुचिस्मिते ! हँसी का दूसरा कोई कारण नहीं है, किन्तु सन्नति ने उसे माना नहीं और कहा यह तुम झूठ बोल रहे हो ॥१०८॥ तुमने मुझको देखकर हँसा है, अब मैं जीवित नहीं रह सकती । किसी देवता को छोड़कर कोई मनुष्ट किसी चींटी की बात को कैसे जान सकता है ?।।१०९॥ अतएव तुम आज मुझ पर ही हँसे हो, इसको छोड़कर कोई दूसरी बात नही हो सकती है । उसके बाद राजा निरुत्तर हो गये । श्रीहरि की वाणी को जानने की इचछा से ॥११०॥ निष्पाप राजा सात रात्रियों तक नियम का पालन किए । प्रातःकाल में उस नगर में आकर ब्रह्माजी स्वप्न के अन्त में कहे ॥१११॥ श्रेष्ठ ब्राह्मण की वाणी सुनकर तुम्हारी पत्नी सारी बातों को जान - जायेगी । इसतरह से स्वप्न के अन्त में कहकर ब्रह्माजी राजा के नगर से अन्तर्धान हो गये ॥११२॥ राजा भी अपनी पत्नी तथा मन्त्री के साथ उस नगर से बाहर निकले । उन्होंने अपने सामने वेदपाठ करते हुए आते हुए वृद्ध ब्राह्मण को देखे ॥११३॥ ब्राह्मण ने कहा-- जो श्रेष्ठ ब्राह्मण इस कुरुजांगल (कुरुक्षेत्र) प्रदेश में दशपुर में दाश (व्याध) हुए उसके बाद में कालंजर पर्वत पर जाकर मृग हुए । उसके बाद वे सातों मानसरोवर में चक्रवाक पक्षी हुए । वे सभी सिद्ध वहीं पर निवास करे हैं ॥११४॥ इस वाणी को सुनकर वह राजा शोक सन्तप्त होकर गिर पड़ा । वह

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