Srishti Khanda Extracted Page 118

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-118

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Sanskrit Original

भीष्म उवाच कथं सर्वरुतज्ञोभूद्रह्मदत्तो नराधिपः ॥८६॥ तच्चापि चाभवत्कुत्र चक्रवाकचतुष्टयं । तन्मे कथय सर्वज्ञ कुले कस्य च सुव्रतम् ॥८७॥ पुलस्त्य उवाच तस्मिन्नेव पुरे जाताश्चक्रवाका अथो नृप ॥८ ८॥ वृद्धद्विजस्य दायादा विप्रा जातिस्मरा बुधा:। धृतिमांस्तत्त्वदर्शी च विद्यावर्णस्तपोधिकः ॥८ ९॥ नामतः कर्मतश्चैव सुदरिद्रस्य ते सुताः । तपसे बुद्धिर भवत्तेषां वै द्विजजन्मनाम् ॥९०॥ यास्याम: परमां सिद्धिमूचुस्ते द्विजसत्तमाः । तत्तेषां वचनं श्रुत्वा सुदरिद्रो महातपाः ॥९९॥ उवाच दीनया वाचा किमेतदिति पुत्रकाः । अधर्म एष वः पुत्रा पिता तानित्युवाच ह ॥९२॥ वृद्धं पितरमुत्सृज्य दरिद्रं वनवासिनम् । क्वनु धर्मोऽत्र भविता मां त्यक्त्वा गतिमेव च॥९३॥ ऊचुस्ते कल्पितावृत्तिस्तव तात वचःश्ृणु । व्रतमेतत्पुरा राज्ञः स ते दास्यति पुष्कलम्॥९४॥ धनं ग्रामसहस्त्राणि प्रभाते पठतस्तव । कुरुक्षेत्रे तु ये विप्रा व्याधा दशपुरे तु ये ॥९५॥ कालंजरे मृगा भ्रूताश्चक्रवाकास्तुमानसे । इत्युक्तवा पितरं जग्मुस्ते वनं तपसे पुनः॥९६॥ वृद्धोपि स द्विजो राजन् जगाम स्वार्थसिद्धये। अणुहो नाम वैभ्राजः पञ्जालाधिपतिः पुरा ॥९७॥ पुत्रार्थी देवदेवेशं पद्मयोनिं पितामहम् । आराधयामास विभुं तीव्रब्रतपरायणः॥९८॥ ततः कालेन महता तुष्टस्तस्य पितामहः। वरं वरय भद्रं ते हृदयेभीष्सितं नृप ॥९९॥ अणुह उवाच पत्रं मे देहि देवेश महाबलपराक्रमम् । पारगं सर्वविद्यानां धार्मिकं योगिनां वरम् ॥९००॥ ब्रह्मदत्त इन सारी बातों को जानकर सहसा हँस पड़ा । भीष्मजी ने कहा-- राजा ब्रह्मदत्त किस कारण से सभी जीवों की बोली समझने वाला हो गया ?॥८५-८६॥ किञ्च वे चारो कहाँ पर चक्रवाक हुए । हे सर्वज्ञ ! वे किसके कुल में हुए ? इन सारी बातों को आप मुझे बतलायें ॥८७॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- हे राजन् ! वे उसी नगर में ब्राह्मण हुए ॥८८॥ वृद्ध ब्राह्मण के वे पुत्र जातिस्मर थे । उनके कर्मानुसार नाम थे धृतिमान्, तत्त्वदर्शी, विद्यार्णव और तपोधिक । वे अत्यन्त दरिद्र के पुत्र थे । उन सभी ब्राह्मणों की तपस्या करने की इच्छा हुयी ॥८९-९०॥ उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने कहा हमलोग परमा सिद्धि (मोक्ष) को प्राप्त करेंगे । उन सबों की वाणी को सुनकर महातपस्वी सुदरिद्र ने कहा ॥९१॥ हे पुत्रों ! यह क्या करना चाहते हो ? उन सबों के पिता ने कहा पुत्रों यह अधर्म है । वन में रहने वाले मुझ वृद्ध दरिद्र को छोड़कर कहीं जाने से कौन सा धर्म होगा ?॥९३॥ उन सबों ने कहा-- हे तात! आप हमलोगों की बात सुनें । आपकी वृत्ति की व्यवस्था हो गयी है । इस नगरी के राजा का यह व्रत है वह आपको पुष्कल दान देगा ॥९४॥ प्रातःकाल में वेद का पाठ करने वाले आपको राजा धन तथा हजारों ग्राम का दान देगा । आप उससे कहेंगे कुरुक्षेत्र के दशपुर में जो व्याघ हुए थे वे ॥९५॥ वे कालञ्जर पर्वत पर मृग हो गये । उसके बाद वे मानसरोवर में चक्रवाक हुए । इस तरह से कहकर वे तपस्या करने के लिए वन में चले गये ॥९६॥ हे राजन् ! वह वृद्ध ब्राह्मण भी अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए उस नगरी में चला गया । उस समय विभ्राज का पुत्र अणुह ही पाञ्चाल देश का स्वामी था पुत्र प्राप्ति की कामना से उसने तीव्र तपस्या करते हुए पद्मयोनि ब्रह्माजी की आराधना की॥९७-९८॥ दीर्घकाल के पश्चात् ब्रह्माजी प्रसन्न हुए । उन्होंने कहा-- राजन् ! अपने अभिलषित वरदान को माँगो॥९९॥ अणुह ने कहा- हे देवेश मुझे आप महाबलवान् तथा महापराक्रमी पुत्र प्रदान कीजिये । जो सभी विद्याओं का ज्ञाता, धार्मिक और श्रेष्ठयोगी हो ॥१००॥ आप सभी जीवों की ध्वनि को जानने वाले पुत्र को प्रदान

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