Srishti Khanda Extracted Page 117
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-117
Sanskrit Original
पितृकार्ये नियुक्तत्वादभद्दह्मवादिनी । तया चकार सहितः स राज्यं राजनंदन:॥७ २॥ कदाचिद्रत उद्यानं तया सह स पार्थिव: । ददर्श कीटमिथुनमनंगकलहान्वितम् ॥७३॥ पिपीलिकामधोवक्त्रां पुरतः कीटकामुकः । पंचबाणाभितप्तांगः सगद्नदमुवाच ह॥७४॥ नत्वया सदृशी लोके कामिनी विद्यते क्वचित्। मध्ये क्षीणातिजघना बृहद्वक्त्रातिगामिनी ॥७५॥ सुवर्णवर्णसदृशी सद्दक्त्रा चारुहासिनी । आलक्ष्य ते च वदनं गुडशर्करवत्सलम्॥७६॥ भोक्ष्यसे मायि भुक्ते त्वं स्नासि स्नाते तथा मयि। प्रोषिते मयि दीना त्वं क्रुद्धे च भयचंचला ॥७७॥ किमर्थ वद कल्याणि सदाधोवदना स्थिता । सा तमाहज्वलत्कोपा किमालपसि रे शठ ॥७८॥ त्वया मोदकचूर्ण तु मां विहायापि भक्षितम्। प्रादास्त्वं तदतिक्रम्य मामन्यस्यै समन्मथः ॥७९॥ पिपीलक उवाच त्वत्सादृश्यान्मया दत्तमन्यस्यै वरवर्णिनि । तदेकमपराधं मे क्षंतुमर्हसि भामिनि ॥८०॥ नैवं पुनः करिष्यामि त्यज कोपं च सुस्तनि। स्पृशामि पादौ सत्येन प्रणतस्य प्रसीद मे ॥८ १॥ ु ष्टायां त्वयि सुश्रोणि मृत्युर्मे पुरतो भवेत् । तुष्टायां त्वयि वामोरु पूर्णाः सर्वमनोरथाः ॥८ २॥ पूर्णचंद्रोपमं वक्त्रं स्वादेऽमृतरसोपमम् । निर्भरं पिब सुश्रोणि कामासक्तस्य मे सदा ॥८३॥ एतन्मत्वा शुभे कार्या सर्वदा तु कृपा मयि । इति सा वचनं श्रुत्वा प्रसन्ना चाभवत्ततः॥८४॥ आत्मानमर्पयामास मोहनाय पिपीलिका । ब्रह्मदत्तोऽपि तत्सर्वं ज्ञात्वा सस्मयाहसत् ॥८५॥ सर्वसत्वरुतज्ञानी प्रभावात्पूर्वकर्मणः । हुयी । वह राजकुमार उसी के साथ राज्य करता था ॥७२॥ उसके साथ एक बार वह राजा उद्यान में गया था, वहाँ पर उसने काममोहित होकर प्रणय कोप किए हुए दो कीड़ों की जोड़ी को देखा ॥७३॥ मादा चिंटी के सामने नर कीड़ा काम के बाणों से सन्तप्त होकर उससे गद्गद वाणी में कहा ॥७४॥ तुम्हारे समान संसार में पतली कमर वाली, विस्तृत जंघों वाली तथा कम्र गामिनी कोई दूसरी सुन्दरी नहीं है ॥७५॥ सुवर्ण के समान तुम्हारा वर्ण है, तुम अत्यन्त मनोहर ढंग से हँसती हो । तुम्हारा मुख देखने में गुड तथा शर्करा के समान प्रिय लगता है ॥७६॥ तुम मेरे खा लेने के बाद खाती हो तथा मेरे नहा लेने के बाद नहाती हो । मेरे बाहर चले जाने पर दीन हो जाती हो तथा मेरे क्रुद्ध होने से तुम भयभीत हो जाती हो ॥७७॥ हे कल्याणी ! तुम सदा अपना मुख नीचे क्यों किए रहती हो । उस चीटीं ने अत्यधिक क्रोध में कहा-- आरे दुष्ट ! तुम क्या बक रहे हो ॥७८॥ तुमने मुझको छोड़कर अकेले मिठाई के चूर्ण को खा लिया । तुम कामुक होकर मुझसे भिन्न को उसे (मिठाई के चूर्ण को दे) दिया ॥७९॥ नर चींटी ने कहा-- हे सुन्दरि ! जिस तरह तुम दूसरे को बाँटती हो उसी तरह से मैंने भी दूसरी को दे दिया । अतएव हे सुन्दरी ! मेरे इस एक अपराध को क्षमा कर दो ॥८०॥ हे सुन्दर स्तनों वाली ! अब में ऐसा अपराध कभी नहीं करूँगा अब तो क्रोध त्याग दो । में तुम्हारा पैर छूकर सत्य बोल रहा हूँ, अतएव मेरे ऊपर प्रसन्न हो जाओ ॥८१॥ हे सुश्रोणि ! तुम्हारे रुष्ट हो जाने पर तो मेरी मृत्यु ही हो जायेगी । हे सुन्दरि ! तुम्हारे प्रसन्न रहने पर मेरे सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं ॥८२॥ कामार्त पूर्ण चन्द्रमा के समान मेरे मुख में विद्यमान अमृत रस के समान रस का तुम स्वच्छन्दता पूर्वक पान करो ॥८३॥ हे शुभे ! इन सारी बातों का विचार करके तुम्हें मेरे ऊपर कृपा करनी चाहिए! इस तरह की बातों को सुनकर वह प्रसन्न हो गयी ।॥८४।। उसके बाद वह पिपीलिका (चिंटी) अपने शरीर को उसे समर्पित कर दी जिससे कि वह मोहित हो गया । पूर्वकृत कर्मो के प्रभाव से सभी जीवों की बाणी को जानने वाले
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