Srishti Khanda Extracted Page 116

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-116

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Sanskrit Original

तदा गत्वा विशंकास्ते गुरवे च न्यवेदयन् । व्याघ्रेण निहता धेनुर्वत्सोयं प्रतिगृह्यताम् ॥५७॥ एवं सा भक्षिता धेनुः सप्तभिस्तैस्तपोधनैः। वैदिकं बलमाश्रित्य क्रूरे कर्मणि निर्भयाः ॥५८॥ ततः काले प्रण ष्टास्ते व्याधा दशपुरेऽ भवन्। जातिस्मरत्वं प्राप्तास्ते पितृभावेन भाविताः ॥५९॥ तत्र विज्ञाय वैराग्यं प्राणातुत्सृज्य धर्मतः । लोकैरवीक्ष्यमाणास्ते तीर्थातेऽनशनेन तु ॥६०॥ संजाता मृगरूपास्ते सप्त कालंजरे गिरौ । प्राप्तविज्ञानयोगास्ते तत्यजुस्तां निजां तनुम् ॥६९॥ मग्नः प्रपतनेनाथ जातवैराग्यमानसाः । मानसे चक्रवाकास्ते संजाताः सप्तयोगिनः ॥६२॥ नामतः कर्मतः सर्वे सुमनाः कुसुमो वसु: । चित्तदर्शी सुदर्शी च ज्ञाता ज्ञानस्य पारगाः ॥६३॥ ज्येष्ठानुरक्ताः श्रेष्ठास्ते सप्तैते योगपावनाः। योग भ्रष्टास्नयस्तेषां बभूवुश्चलचेतसः ॥६ ४॥ दृष्ट्वा विभ्राजमानं तमणुहं स्त्रीभिरन्वितम् । क्रीडंतं विविधैभोगैर्महाबलपराक्रमम् ॥६ ५! पञ्चालान्वयसंभूतं प्रभूतबलवाहनम् । राज्यकामो भवत्त्वेकस्तेषां मध्ये जलौकसाम् ॥६६॥ पितृवर्ती च यो विप्र: श्राद्धकृत्पितृवत्सलः | अपरौ मंत्रिणौ दृष्टवा प्रभूतबलवाहनौ ॥६७॥ मंत्रित्वे च क्रतुश्चेच्छामस्मिन्मत्यौं द्विजोत्तमौ। विभ्राजपुत्रस्त्वेकोभूद्ब्रह्मदत्त इति स्मृतः॥६८॥ मंत्रिपुत्रौ तथा चैव पुंडरीकसुबालकौ । ब्रह्मदत्तोभिषिक्तस्तु कांपिल्ये नगरोत्तमे ॥६९॥ पंचालराजो विक्रांतः श्राद्धकृत्पितृवत्सल: । योगवित्सर्वजंतूनां चित्तवेत्ताभवत्तदा ॥७ ०॥ तस्य राज्ञोभवद्धर्या सुदेवस्यात्मजा तदा । सन्नतिर्नामविख्याता कपिला या भवत्पुरा॥७१॥ पितरों की भक्ति से युक्त होकर उसने श्राद्ध किया ॥५५-५६॥ इसके बाद जाकर उन सबों ने महर्षि से कहा आपकी गाय को बाघ मारकर खा गया बछड़ा बचा है इसे लीजिये ॥५७॥ इसतरह से क्रूर कर्म में वैदिक बल को अपना कर उन सातों तपस्वियों ने गौ को निर्भय होकर खा लिया ॥५८॥ उसके बाद वे समयानुसार मर कर दशपुर में व्याध हुए । पितृपरायण होने के कारण वे उस जन्म में भी जातिस्मर हुए; अपने पूर्व जन्म को याद रखने वाले हुए॥५९॥ उस जन्म में भी वैराग्य को अपना कर वे लोगों से अदृश्य रहकर ही अनशन तीर्थ में अपने प्राणों का धर्मपूर्वक त्याग कर दिये ॥६०॥ उसके बाद वे सातो कालंजर नामक पर्वत पर जाकर मृग हुए । ज्ञानी होने के कारण उन सबों ने अपने उस शरीर का भी परित्याग कर दिया ॥६१॥ मन में वैरागय हो जाने के कारण वे पर्वत से गिरकर अपने शरीर का परित्याग कर दिए । उसके बाद वे सातो योगी मानस तीर्थ में जाकर चक्रवाक पक्षी हो गये ॥६२॥ वहाँ वे कर्मानुसार नाम वाले हुए । उनके नाम थे-- सुमना, कुसुमोवसु, चित्तदर्शी, सुदर्शी, ज्ञाता तथा ज्ञान पारंगत ॥६३॥ वे श्रेष्ठ योगी थे तथा अपने बड़े भाई में अनुरक्त रहने वाले थे । उनमें से चंचल चित्त वाले होने के कारण तीन तो योगभ्रष्ट हो गये ॥६४॥ वे महाबलवान् महा पराक्रमी अणुह को स्त्रियों के साथ क्रीडा करते हुए देखकर योग भ्रष्ट हुए थे ॥६५॥ अणुह पाञ्चालराज के वंश में उत्पन्न हुआ था तथा प्रभूत सेना और वाहन से युक्त था । उन तीनों में से एक तो राज्य की इच्छा वाला हो गया ॥६६॥ पहले जिसका नाम पितृवर्ती था तथा पितृभक्ति परायण था, वह राजा बनना चाहा । शेष दो अणुह के प्रभूत सेना तथा वाहन से युक्त दो मन्त्रियों को देखकर मंत्री होना चाहे । उनमें से एक तो विभ्राज का पुत्र ब्रह्मदत्त हुआ ॥६८॥ और दो उनके मंत्री के पुण्डरीक तथा सुबालक नामक पुत्र हुए । ब्रह्मदत्त काम्पिल्य नामक नगर का राजा हुआ ॥६९॥ वह पाञ्चालराज श्राद्ध करने वाला, पितृभक्त, योगवेत्ता और सभी जीवों के चित्त को जाने वाला हुआ ॥७०॥ उस राजा की पत्नी सुदेव की पुत्री हुयी । वह कपिला के गर्भ से उत्पन्न तथा सन्नति के नाम से विख्यात थी ॥७१॥ पितरों के कार्य में नियुक्त होने के कारण वह ब्रह्मवादिनी

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