Srishti Khanda Extracted Page 115
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-115
Sanskrit Original
है श्रीपद्यमहापुराण मनुष्यत्वेन्नपानादि नानाभोगवतां भवेत् । रतिशक्तिस्त्रियः कान्तेऽ न्येषां भोजनशक्तिता॥४४॥ दानशक्तिः सविभवा रूपमारोग्यमेव च । श्राद्धं पुष्पमिदं प्रोक्तं फलं ब्रह्मसमागमः ॥४५॥ आयुः पुत्रान् घने विद्यां स्वर्ग मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीताः पितृगणा नृप ॥४६॥ श्रूयते च पुरा मोक्षं प्राप्ताः कौशिकसूनवः । पंचभिर्जन्मसंबंद्यैः प्राप्ता ब्रह्मपरंपदम् ॥४७॥ भीष्म उवाच कथं कौशिकदायादाः प्राप्ता योगमनुत्तमम्। पंचभिर्जन्मसंबन्यैः कथं कर्मक्षयो भेवत् ॥४८॥ पुलस्त्य उवाच कौशिको नाम धर्मात्मा कुरुक्षेत्रे महानृषिः। नामतः कर्मतस्तस्य पुत्राणां तान्निबोध मे ॥४९॥ स्वसृपः क्रोधनो हिंस्रः पिशुनः कविरेव च । वाग्दुष्टः पितृवर्ती च `? राष्यास्तदाभवन् ॥५०॥ पितर्युपरते तेषामभूददर्भिक्षमुल्वणम् । अतावृष्टिश्चमहतीसर्वलोकभयङ्करी ॥५१॥ गगदिशादने दोरध्री रक्षन्ति च तपोधनाः । खादामः कपिलामेतां वयं क्षुत्पीडिता भृशम् ॥५२॥ इति चितयतां पापं लघुः प्राह तदानुजः। यद्यवश्यमियं वध्या आद्वरूपेण योज्यताम् ॥५३॥ श्राद्धे नियोज्यमानायां पापं नश्यति नो ध्रुवम्। एवं कुर्वित्यनुज्ञातः पितृवर्ती तदानुजैः ॥५४॥ चक्रे समाहितः श्राद्धमुपयुज्याथ तां पुनः। द्वौ दैवे ् रातरौ कृत्वा पित्र्ये त्रीश्चापरान् क्रमात्॥५५॥ तथैकमतिथिं कृत्वा श्राद्धदः स्वयमेव तु । चकार मंत्रवच्छााद्धं स्मरन्पितृपरायणः ॥५६॥ पान रूप से तथा राक्षस योनि प्राप्त करने पर मांस रूप से प्राप्त होता है दानव होने पर पान रूप से तथा प्रेत योनि प्राप्त करने पर रुधिर रूप से प्राप्त होता है ॥४३॥ पितरों के मनुष्य योनि प्राप्त करने पर वे श्राद्ध की वस्तुएँ अन्न, पान तथा अनेक प्रकार के भोग रूप से प्राप्त होती हैं । स्री की योनि प्राप्त होने पर उसके पति को रति की शक्ति के रूप में प्राप्त होता है, दूसरे जीवों को भोजन की शक्ति के रूप में प्राप्त होता हे ।४४॥ दान की शक्ति वैभव, आरोग्य तथा रूप के रूप में प्राप्त होती है । श्राद्ध को पुष्प कहा गया है, इसका फल ब्रह्म की प्राप्ति है ॥४५॥ हे राजन् ! पितृगण प्रसन्न होकर श्राद्धकर्ता को आयु, पुत्र, धन, विद्या स्वर्ग, मोक्ष तथा सुख को प्रदान करते हैं किं बहुना वे उसे राज्य भी प्रदान करते हैं ॥४६॥ सुना जाता है कि कौशिक के पुत्रं ने मोक्ष प्राप्त किया । पाञ्च जन्मों के संबन्ध के कारण उन सबों ने परम पद प्राप्त किया ॥४७॥ भीष्मजी ने कहा-- कौशिक के पुत्रों ने कैसे सर्वोत्तम योग को प्राप्त किया ? पाञ्च जन्मों के सम्बन्ध से कर्मो का क्षय कैसे सम्भव है ?2॥४८॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- कुरुक्षेत्र में महान् धर्मात्मा कौशक ऋषि रहते थे । अब तुम उनके पुत्रों के नाम और कर्म को जानो॥४९॥ वे सब गर्ग महर्षि के शिष्य थे । उनके नाम थे स्वसृप, गोधन, हिंस्र, पिशुन, कवि, वाग्दुष्ट तथा पितृवर्ती ॥५०॥ इनके पिता की मृत्यु हो जाने पर भयङ्कर दुर्भिक्ष हुआ । अत्यन्त भयङ्कर अनावृष्टि हुयी ॥५१॥ वे गर्ग महर्षि के आदेश से वन में उनकी गौ की रक्षा करते थे वे भूख से अत्यन्त पीडित होकर निश्चित किया कि इस गौ को ही हमलोग खा लें, क्योंकि भूखे हैं ॥५२॥ इस तरह से जब वे विचार कर रहे थे; उसी समय उनके सब से छोटे भाई ने कहा-- यदि इसको मारना है तो इसका उपयोग श्राद्ध रूप से कर लें ॥५३॥ जब इसका उपयोग श्राद्ध में करेंगे तो हमलोगों के पाप का तो नाश हो ही जायेगा । इस तरह से सभी अनुजों के द्वारा कहे जाने पर सबसे बड़ा जो पितृवर्ती था वह ।।५४।। सावधानी से उस गौ से श्राद्ध कर दिया । उसने दो भाइयों को विश्वेदेव बनाया तथा तीन भाइयों को विश्वेदेव, फिर एक को अतिथि बनाकर स्वयं श्राद्ध कर्ता बन गया । और अन्न से युक्त
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