Srishti Khanda Extracted Page 114
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-114
Sanskrit Original
आमश्राद्धं तदा कुर्याद्विधिज्ञ: श्राद्धदस्ततः। तेनाम्नौ करणं कुर्यात्पिडास्तेनेव निर्वपेत् ॥३२॥ त्रिभिः सपिंडीकरणं मासैक्ये त्रितये तथा। यदा प्राप्स्यति कालेन तदा मुच्येत बंधनात् ॥३३॥ मुक्तोपि लेपभागित्वं प्राप्रोति कुशमार्जनात्। लेपभाजश्चतुर्थाद्या्रयः स्युः पिंड भागिन: ॥३४॥ पिंडदः सप्तमस्तेषां सपिंडा: सप्त पूरुषाः। भीष्म उवाच कथं हव्यानि देयानि कव्यानि च जनैरिह ॥३५॥ गूहति पितृलोके वा प्रायः के कैर्निगद्यते। यदि मर्त्ये द्विजो भुंक्ते हूयते यदि वानले ॥३६॥ शुभाशुभात्मकाः प्रेतास्तदन्नं भुंजते कथम् । पुलस्त्य उवाच वसुस्वरूपाः पितरो रुद्राश्चैव पितामहाः ॥३७॥ प्रपितामहास्तथादित्या इत्येषा वैदिकी श्रुतिः । नामगोत्रं पितृणां तु प्रापकं हव्यकव्ययोः ॥३८॥ श्राद्धस्य मन्त्रतस्तत्वमुपलभ्येत भक्तितः । अग्निष्वात्तादयस्तेषामाधिपत्ये व्यवस्थिताः ॥३९॥ नामगोत्रास्तदादेशा भवंत्युद्धवतामपि । प्राणिनः प्रीणयत्येतदर्हणं समुपागतम्॥४०॥ दिव्यो यदि पिता माता गुरुः कर्मानुयोगतः। तस्यान्नममृतं भूत्वा दिव्यत्तवेप्यनुगच्छति ॥४ १॥ येऽपिदैत्यत्वे भोगरूपेण पशु तृणंभवेत्। श्राद्धान्नं वायुरूपेण नागत्वेप्युपतिष्ठति ॥४२॥ पानं भवति यक्षत्वे राक्षसत्वे तथामिषम्। दानवत्वे तथापानं प्रेतत्वे रुधिरोदकम्॥४३॥ प्रकार प्रेतत्व से छूटकारा प्राप्त हो तथा स्वर्ग की प्राप्ति हो उसके लिए आम (कच्चे अन्न से) श्राद्ध करना चाहिए । वह आमान्न से ही अग्नौकरण करे तथा उसी से पिण्ड दान दे ॥३२॥ तीन महीने अथवा एक महीने में भी यदि सपिण्डीकरण कर दिया जाता है तो वह प्रेतत्व से मुक्त प्राप्त कर लेता है ॥३३॥ प्रेतत्व से मुक्त हो जाने पर उससे लेकर तीन पीढी तक के पितृगण कहलाते हैं । मुक्ति हो जाने पर भी वह कुश से मार्जन करने के कारण लेप भागी होता हैं । अर्थात्, पिता पितामह और प्रपितामह ये तीन पिण्ड भागी होते हैं और चतुर्थ (वृद्ध प्रपितामह) से लेकर तीन पीढी तक के पितृगण लेप भागी होते हैं ॥३४॥ पिण्डदान करने वाला सातवाँ होता है अतएव पिण्ड सप्त पुरुष कहलाते हैं । भीष्मजी ने कहा-- लोगों को हव्य तथा कव्य कैसे प्रदान करना चाहिए ॥३५॥ पितृलोक में उनको कीन ग्रहण करता है ? यदि मर्त्य लोक में उनको ब्राह्मण खा लेते हें अथवा अग्नि में उनका हवन कर दिया जाता है तो ॥३६॥ शुभ तथा अशुभ योनियों में गये हुए प्रेत उसका कैसे भोग करते हैं ? पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- वेद वतलाता है कि पिता वसु स्वरूप हो जाते है, पितामह रुद्र रूप हो जाते हैं और प्रपितामह आदित्य स्वरूप हो जाते है । पितरों के नाम तथा उनके गोत्र ही उन तक हव्य तथा कव्य को पहुँचाने वाले होते हैं ॥३६-३८॥ मन्त्र की शक्ति तथा हृदय की भक्ति से श्राद्ध का सार पितरों को प्राप्त हो जाता है । पिता, पितामह इत्यादि के अधिपति अग्निष्वाता आदि पितृगण हैं ॥३९॥ पितरों में से जो लोग कहीं जन्म लेते हैं, उनका नाम, गोत्र तथा देश होता ही है । उसी नामादि के द्वारा उन सबों को श्राद्ध का सार भाग उन प्राणियों को तृप्त करने का काम करता है ॥४०॥यदि अपने कर्मो के अनुसार माता, पिता, गुरुजन दिव्य (देव) योनि को प्राप्त करते हैं तो श्राद्ध में प्रदत्त अन्न अमृत वनकर उनको प्राप्त होता है ॥४१॥ दैत्य योनि प्राप्त करने पर वह भोग रूप से प्राप्त करता है, पशु योनि को प्राप्त होने पर तृण रूा से और सर्प योनि प्राप्त करने पर वायु रूप से प्राप्त होता है ॥४२॥ यक्ष योनि को प्राप्त करने पर
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