Srishti Khanda Extracted Page 113

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-113

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Sanskrit Original

&८ श्रीपद्ममहापुराण ग्रहीतारस्तु जायन्ते सर्वे नरकगामिनः । ग्रथितां वसुजालेन शय्यां दांपत्यसेविताम् ॥१८॥ ये स्पृशंति न जानंतः सर्वे नरकगामिनः । नव श्राद्धे न भोक्तव्यं भुक्तवा चांद्रायणं चरेत् ॥१९॥ पितृभक्त्या तु पुत्राणां कार्यमेव सदा भवेत्। वृषोत्सर्गं च कुर्वीत देया च कपिला शुभा ॥२०॥ उदकुंभश्च दातव्यो भक्ष्यभोज्यफलान्वितः । यावदब्दं नरश्रेष्ठ सतिलोदकपूर्वकम् ॥२९॥ ततः सवंत्सरे पूर्णे सपिंडीकरणं भवेत् । सपिंडीकरणादूर्ध्वं प्रेतः पार्वणभुग्यतः ॥२२॥ वृद्धिपूर्वेषु कार्येषु गृहस्थस्य भवेत्ततः । सपिंडीकरणं श्राद्धं देवपूर्वं नियोजयेत्॥२३॥ पितृनावहयेत्तत्र पृथक्म्रेतं विनिर्दिशेत् । गंधोदकतिलैर्युक्त कुर्यात्पात्रचतुष्टयम् ॥२४॥ अर्घ्यार्थं पितृपात्रेषु प्रेतपात्रं प्रसेचयेत् । तद्वत्सङ्कल्प्य चतुरः पिंडान्पितृपरस्तदा ॥२५॥ ये समाना इति द्वाभ्यामन्नं तु विभजेत्रिधा। अनेन विधिना चार्घ्यं पूर्वमेव प्रदापयेत् ॥२६॥ ततः पितृत्वमापन्नस्स चतुर्थस्तदात्वनु। अग्निष्वातादिमध्ये तु प््राप्रोत्यमृतमुत्तमम् ॥२७॥ सपिण्डीकरणादूर्ध्व पृथक्तस्मै न दीयते । पितृष्वेव च दातव्या तत्पिंडं येषु संस्थितम् ॥२८॥ ततः प्रभृति संक्रान्तावुपरागादिपर्वसु । त्रिपिंडमाचरेच्छाद्धमेको दिष्टं मृतेऽहनि ॥२९॥ एकोद्दिष्टं परित्यज्य मृताहे यःसमाचरेत् । सदैवं पितृहा स स्यात्तथा भ्रातृविनाशकः ॥३०॥ मृताहे पार्वणं कुर्वन्नधो याति स मानवः । संपृक्ते स्वर्गतीभावे प्रेतमोक्षे यतो भवेत् ॥३९॥ संस्कार करना पड़ता है । वेद तथा पुराण में सर्वत्र शय्या ग्रहण की निन्दा की गयी है ॥१७॥ सभी शय्या ग्रहण करने वाले नरकगामी होते हैं । सम्पत्ति से भरी हुयी तथा दम्पती से सेवित ॥१८॥ शय्या को जो अज्ञानी पुरुष ले लेते हैं, वे सबके सब नरकगामी होते हैं, ग्यारहवें दिन जो श्राद्ध होता है, उस श्राद्ध में भोजन नहीं करना चाहिए। यदि भोजन कर ले तो फिर चांद्रायण करे ॥१९॥ जो पुत्र पिता के भक्त होते हैं, उन्हें इस तरह से कार्य करना चाहिए । वह वृषोत्सर्ग करे (सांड, छोड़े) तथा कपिला गौ का दान करे ॥२०॥ भक्ष्य, भोज्य तथा फल से युक्त पितरों को उद्देश्य करके जलकुम्भ का दान करे । पुत्र को तिल और जल के साथ इन सारे कार्यो को एक वर्ष पर्यन्त करते रहना चाहिए ॥२१॥ उसके बाद वर्ष पुरा हो जाने पर सपिण्डीकरण करे । क्योंकि सपिण्डीकरण के बाद ही रेत पार्वण श्राद्ध का भागी होता है ॥२२॥ गृहस्थ के धर में होने वाले बृद्धि कार्यो तथा पर्वो पर वृद्धिश्राद्ध होते हैं। सपिण्डीकरण श्राद्ध को विश्वेदेव पूर्वक किया जाता है ॥२३॥ इस श्राद्ध में चन्दन, तिल तथा जल से युक्त चार अर्घ पात्रों को बनाये; फिर पितरों का आवाहन करे और प्रेत के पात्र को अलग रखे ॥२४॥ उसके बाद प्रेत के पात्र के जल को तीन भागों में विभक्त करके पितरों के अर्घ्य पात्र में मिला दे उसके बाद पहले के ही समान सङ्कल्प करके वह चार पिण्डों को बनाये । उसके बाद ये समाना इत्यादि दो मन्त्रों से प्रेतपिण्ड के अन्न को तीन भागों मे विभक्त करे । इसी विधि से अर्ध्य को पिण्डदान से पहले देना चाहिए ॥२५-२६॥ सपिण्डीकरण के बाद ही प्रेत पितृत्व को प्राप्त कर पाता है और अग्निष्वात्ता आदि पितरों के बीच में बैठकर अमृत पान करता है ॥२७॥ सपिण्डीकरण के बाद प्रेत के लिए पितरों से अलग कुछ भी नहीं दिया जाता है । उसको भी पितरों में ही पिण्ड दे देना चाहिए, क्योंकि वह उन पितरों में ही स्थित रहता है ॥२८॥ उसके बाद संकान्ति अथवा ग्रहण की बेला पर किए जाने वाले श्राद्ध में तीन पिण्डों को ही बनायें । मृत्यु की तिथि पर एकोदिष्ट करना चाहिए ॥२९॥ जो व्यक्ति मृत्यु तिथि परएकोदिष्ट न करके पार्वण श्राद्ध करता है वह सदा-सदा के लिए पिता को मारने वाला तथा भाइयों का विनाश करने वाला होता है ॥३०॥ जो मृत्यु तिथि पर पार्वण करता है वह अधो गति को प्राप्त करता है । मृत व्यक्ति को जिस

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