Srishti Khanda Extracted Page 112
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-112
Sanskrit Original
जननेप्ययमेव स्यात्सर्ववर्णेषु सर्वदा । अस्थिसंचयनादूर्ध्वम्ञस्पर्शो विधीयते ॥४॥ प्रेताय पिंडदानं तु द्वादशाहं समाचरेत् । पाथेयं तस्य तत्प्रोक्ते यतः प्रीतिकरं महत् ॥५॥ यस्मात्प्रेतपुरं प्रेतो द्वादशाहेन नीयते । गृहे पुत्रकलत्रं च द्वादशाहं प्रपश्यति ॥६॥ तस्मान्निधेयमाकाशे दशरात्रं पयस्तथा । सर्वदाहोपशांत्यर्थमध्वश्रमविनाशनम् ॥७॥। ततस्त्वेकादशाहेऽपि द्विजानेकादशैवतु । गोत्रादिसूतकांते च भोजयेन्मनुजो द्विजान् ॥८॥ दवितीयेह्णि पुनस्तद्ददेकोददिष्ठं समाचरेत्। नावाहनाग्नौकरणं दैवहीनं विधानतः ॥९॥ एक एदित्रमेकोर्घ एक: पिंडो विधीयते । उपतिष्ठतामितिवदेद्देयं पश्चात्तिलोदकम्॥ ९१ ०॥ स्वास्ति ब्रूयाद्विप्रकरे विसगें चाभिरम्यताम्। शेषं पूर्ववदत्रापि कार्य वेदविदो विदुः ॥१९॥ अनेन विधिना सर्वमनुमासं समाचरेत् । सूतकांते द्वितीयेहि शय्यां दद्याद्विलक्षणाम् ॥१२॥ कांचनं पुरुषं तद्दत्फलवस्जसमन्वितम्। प्रपूज्य द्विजदांपत्यं नानाभरणभूषितम् ॥१३॥ उपवेश्य तु शय्यायां मधुपर्क ततो ददेत्। रजतस्य तु पात्रेण दधिदुग्धसमन्वितम् ॥१४॥ अस्थिलालाटिकं गृह्ण सूक्ष्मं कृत्वा विमिश्रयेत्। पाययेद्द्विजदांपत्यं पितृभक्तूया समन्वितः ॥१५॥ एष एव विधिर्हष्ट: पार्वतीयै ई़िजोतमैः। तेन दुष्टा तु सा शय्या न ग्राह्या द्विजसत्तमैः ॥१६॥ गृहीतायां तु तस्यां हि पुनः संस्कारमर्हति । वेदे चैव पुराणे च शय्या सर्वत्र गर्हिता ॥१७॥ को लगता है । मुण्डन संस्कार से पहले बच्चे की मृत्यु हो जाने पर एक रात का अशौच होता है । उसके बाद तीन रात तक का अशोच होता हे ॥३॥ सभी वणों में जननाशौच भी इतना ही होता है । अस्थि संचयन हो जाने पर दाहकर्ता के शरीर का स्पर्श किया जा सकता है ॥४॥ मरे हुए व्यक्ति के लिए बारह दिन पर्यन्त पिण्ड दान करना चाहिए । क्योकि वही प्रेत का पाथेय होता हैं, अतएव उससे मरे हुए जीव को प्रसन्नता होती है ॥५॥ क्योंकि मृत्यु के बारहवें दिन प्रेत यमपुरी जाता है । उतने दिन तक वह घर में ही रहकर अपने पुत्र तथा पत्नी आदि को देखता है॥६॥ इसलिए दश दिन तक उसके लिए आकाश में दूध रखना चाहिए । उसके द्वारा उसके (प्रेत के) सारे सन्ताप विनष्ट हो जाते हैं और मार्ग में होने वाले श्रम विनष्ट हो जाते हैं ॥७॥ उसके बाद ग्यारहवें दिन भी ग्यारह ब्राह्मणों को तथा सूतक समाप्त हो जाने पर अपने गोत्र आदि के लोगों को तथा ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए ॥८॥ उसके दूसरे दिन उसी तरह से एकोदिष्ट श्राद्ध करना चाहिए । इसमें न तो आवाहन होता है, और न तो अग्नौकरण होता है । इस श्राद्ध में विश्वेदेव भी नहीं होते हैं ॥९॥ इसमें एक ही पवित्रक होता है एक ही अर्घ होता है तथा पिण्ड भी एक ही बनता है । पिण्ड दान करते समय पहले तवोपतिष्ठताम् कहकर बाद में पिण्ड देना चाहिए उसके बाद तिल तथा जल पिण्ड पर छोड़ना चाहिए । सङ्कल्प के जल को ब्राह्मण के हाथ में छोड़ना चाहिए । उस समय ब्राह्मण स्वस्ति कहें और विसर्जन करते समय अभिरम्यताम् कहना चाहिए । वेदज्ञों ने कहा है कि शेष सभी कायों को पहले के ही समान करना चाहिए ॥१०-११॥ इसी विधि से प्रत्येक मास में एकोदिष्ट करना चाहिए । मरणाशौच समाप्त हो जोने के दूसरे दिन सुन्दर शय्यादान करना चाहिए ॥१२॥ उसके बाद काञ्चन पुरुष की फल एवं वसह के साथ पूजा करके तथा ब्राह्मण दम्पत्ती की पूजा करके उसे शय्या पर बैठाये उसके बाद उन्हें मधुपर्क प्रदान करे । दही और दूध से युक्त चांदी के पात्र में ॥१३-१४॥ मृत् पुरुष के ललाट की अत्यन्त सूक्ष्म हड्डी को मिला दे और पिता की भक्ति के युक्त होकर उस दुग्ध को द्विज दम्पती को पिलाये ॥१५॥ पार्वतीय द्विजोत्तमों के यहाँ यही पद्धति देखी गयी है, अतएव उस दूषित शय्या को श्रेष्ठ ब्राह्मणों को नही लेना चाहिए ॥१६॥ यदि उस शय्या को ले तो उसका पुनः
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