Srishti Khanda Extracted Page 111
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-111
Sanskrit Original
प्राङ्मुखोनिर्वपेत्पिण्डान्पूर्वा श्चैव पुरातनान् । संपन्नमित्यभ्युदये दद्यादर्घ द्ययोईयो: ॥१८९॥ युग्माद्विजातयः पूज्या वस्त्राकल्पांबरादिभिः । तिलकार्यं यवैः कार्यं तच्च सर्वानुपूर्वकम् ॥१९०॥ मांगल्यानि च सर्वाणि वाचयेद्दिजपुंगवान् । एवं शूद्रोपि सामान्यं वृद्धिश्राद्धं च सर्वदा॥१९९॥नमस्कारेण मंत्रेण कुर्याद्दानानि वै बुधः । दानं प्रधानं शूद्रस्य इत्याह भगवान्प्रभुः ॥ दानेन सर्वकामाप्तिस्तस्य संजायते यत: ॥१९२॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे साधारणाभ्युदयकीर्तन॑ नाम नवमोध्याय: ॥९॥ ऊ्ूशओई- दसवाँ अध्याय पुलस्त्य उवाच एकोद्दिष्टं ततो वक्ष्ये यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा । मृते पुत्रैर्यथाकार्यमाशौचं च पितुर्यदि ॥९॥ दशाहं शावमाशौचं ब्राह्मणस्य विधीयते । क्षत्रियेषु दशद्वेच पक्षं वैश्येषु चैव हि ॥२॥ शूद्रेषु मासमाशौचं सपिंडेषु विधीयते । नैशमाचूडाशौचं त्रिरात्रं परतः स्मृतम्॥३॥ जाती है ॥१८७॥ उसके बाद में मातामह, प्रमातामह तथा वृद्ध प्रमातमह की पूजा तथा विश्वेदेव की पूजा करनी चाहिए । इस श्राद्धको प्रदक्षिण, पूजोपचार (पूजन सामग्री) दही, अक्षत, फल तथा जल से करना चाहिए । इस श्राद्ध को पूर्वाभिमुख बैठकर तथा सव्य रहकर ही किया जाता है । पूर्वाभिमुख होकर ही पितरों को पिण्डदान भी किया जाता है । पिण्डदान तथा अर्घ्य सम्पन्नम् कहकर कर देना चाहिए । इस श्राद्ध में पत्नी से युक्त ब्राह्मण को अर्ध्य देना चाहिए, तथा सपत्मीक, ब्राह्मण को वस्र तथा सुवर्ण आदि के द्वारा पूजन करना चाहिए । तिल का काम यव से करना चाहिए । तथा सभी कार्या को पूर्ववत् करना चाहिए ॥१८८-१९०॥ इसमें श्रेष्ठ ब्राह्मणों के द्वारा इसी तरह शूद्र को भी सभी कर्मो को वृद्धि श्राद्ध में करना चाहिए ॥१९१॥ विज्ञ पुरुष, नमस्कार तथा मन्त्र के द्वारा इस श्राद्ध को करे । ब्रह्माजी ने कहा है कि शूद्र के श्राद्ध में दान की ही प्रधानता होती है । दान के ही द्वारा शूद्रों की सभी कामनाओं की पूर्ति होती हैं ॥१९२॥ इस तरह श्रीपद्महापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के नवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ९।। — ke एकोदिष्ट श्राद्ध विधि, वर्णो के अनुसार जननाशौच तथा शावाशौच (मरणाशौच) का निर्णय, अस्थि संचयनादि प्रेतकर्म, लेप भोगी तथा सपिण्ड पितृगण का निर्णय, ब्राह्मणों के भोजन करने से पितरों की तृप्ति विषयक शङ्का का समाधान, श्राद्ध विषयक कौशिक पुत्र की कथा पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- जिसे पहले ब्रह्माजी ने बतलाया था उस एकोदिष्ट श्राद्ध को मैं बतलाऊँगा और यह भी बतलाऊंगा कि पिता आदि के मरने पर पुत्रों को किस प्रकार से अशौच का पालन करना चाहिए ॥१॥ ब्राह्मणों के यहाँ शावाशौच (मरणाशौच) दश दिन का होता हैं क्षत्रियों के यहाँ बारह दिन का और वैश्यों के यहाँ पन्द्रह दिन का शावाशौच होता है ॥२॥ शूद्रों के यहाँ शावाशौच एक महीने का होता है यह अशौच सभी सपिण्डों
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know