Srishti Khanda Extracted Page 109
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-109
Sanskrit Original
Z¥ श्रीपडामहापुराण भारताध्ययनं कार्यपितृणां परमंप्रियम् । भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोज्यतोयादिकं नृप॥१६३॥ सार्ववणिकमन्नाद्यामानयेत्सावधारणम् । समुत्सृजेद्धुक्तवतामग्रतो विकिरान्भुवि ॥१६४॥ अग्निदग्धाश्च ये जीवा येप्यदग्धाः कुले मम । भूमौ दत्तेन तृप्यंतु तृप्ता यांतु परां गतिम् ॥१६५॥ येषां न माता न पिता न बंधु र्नचापि मित्रं न तथान्नमस्ति । तत्तृप्तयेन्न भुवि दत्तमेतत् प्रयांतु योगाय यतो यतस्ते ॥९६६॥ असंस्कृतप्रमीतानां त्यागिनां कुलभागिनाम् । उछिष्टभागधेयानां दर्भेषु विकिरासनम् ॥१६७॥ तृप्तान् ज्ञात्वोदकं दद्यात्सकृद्विकिरणे तथा । विप्रलिप्तमहीपृष्ठे गोशकृन्मूत्रवारिणा ॥१६८॥ निध्ायदर्भान्विधिवहक्षिणाग्रान्प्रयत्मतः । सर्ववर्णविधानेनपिंडांश्च पितृयज्ञवत् ॥१६९॥ अवनेजनपूर्व तु नामगोत्रं तु मानवः। उक्त्वा पुष्पादिकं दत्वा कृत्वा प्रत्यवनेजनम्॥१७०॥ ् ञात्वापसव्यं सव्येन पाणिना त्रिःप्रदक्षिणम् । पितृवन्मातृकं कार्य विधिवददर्भपाणिना ॥१७९॥ दीपप्रज्वालनं तद्वत्कुर्यात्पुष्पार्चनं बुधः । तथाचांतेषु चाचम्य दद्याच्चापः सकृत्सकृत् ॥१७२॥ तथा पुष्पाक्षतान् पश्चादक्षय्योदकमेव च । सतिलं नामगोत्रेण दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम्॥१७३॥ गोभूहिरण्यवासांसि भव्यानि शयनानि च । दद्याद्यदिष्टं विणामात्मनः पितुरेव च ॥१७४॥ वित्तशाठ्येन रहितः पितृभ्यः प्रीतिमावहेत् । ततः स्वधावाचनकं विश्वेदेवेषु चोदकम् ॥१७५॥ दत्वाशीः प्रतिगृह्णीयाद्द्विजेभ्योपि यथाबुधः । अघोराः पितरः संतु संत्तवित्युक्तः पुनर्ह्िजैः॥१७६॥ RE मिल अल कक + दीप पक लिप हिल जि ना पक उससे बचे हुए अन्न को ब्राह्मणों के ही सामने जमीन पर बिखेर दे । क्योंकि वह अन्न तथा जल उन जीवों का भाग होता है जो संस्कार आदि से हीन होने के कारण अधम गति को प्राप्त कर लिए हैं ॥१६२-१६४॥ उस समय अग्निदग्धा० इत्यादि श्लोकों को पढना चाहिए । इन श्लोकों का अर्थ है, मेरे वंश में जो जीव, आग में जल गये, अथवा अदग्ध ही रह गये, वे पृथिवी पर दिए गये इन अत्नों से तृप्त होकर परम गति को पाप्त करें ॥१६५॥ जिन जीवों के माता, पिता, मित्र, बन्धु अन्न इत्यादि कुछ भी नहीं हैं उनकी ही तृप्ति के लिए यह अन्न पृथिवी पर दिया गया है, इससे तृप्त होकर वे योग को प्राप्त करें ॥१६६॥ जो संस्कार के बिना ही मर गये तथा जिन लोगों ने वंश का परित्याग कर दिया जो उच्छिष्ट भाग के अधिकारी हैं, उन सबों के लिए कुशों पर विकरासन है ॥१६७॥ जब ब्राह्मण तृप्त हो जायं तों उनको वहीं पर एक बार जल दे । उसके बाद गाय के गोबर तथा गोमूत्र से लिपी हुयी भूमि पर ॥१६८॥ दक्षिणाग्र कुशों को बिछाकर पितृ यज्ञ के ही समान विधिपूर्वक पिण्डदान करे ॥१६९॥ पिण्डदान से पूर्व पितरों के नाम एवं गोत्र का उच्चारण करके उन्हें अवनेजन का जल प्रदान करे । फिर पिण्डों का फूल इत्यादि से पूजन करके उसके ऊपर प्रत्यवनेजन का जल गिराये ॥१७०॥ सव्यापसव्य का विधान जानकर हाथ से ही तीन बार प्रदक्षिणा करे । पिता के ही समान माता का भी श्राद्ध हाथ में कुश लेकर करना चाहिए ॥१७१॥ विज्ञ पुरुष को चाहिए कि वह दीप जलाये तथा पुष्प इत्यादि से पूजा करे । फिर ब्राह्मणों के आचमन कर लेने पर स्वयं भी आचमन करे । फिर सब ब्राह्मणों को एक-एक बार जल दे ॥१७२॥ फिर फूल तथा अक्षत देकर तिल सहित अक्षय्योदक दान करे और अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा दे ॥१७३॥ गौ, भूमि, सोना, वस्त्र तथा सुन्दर शय्या को प्रदान करे। जो वस्तुएँ, ब्राह्मणों, पितरों तथा अपने को प्रिय लगे उन सभी वस्तुओं का दान करना चाहिए ॥१७४॥ वित्तशाठ्य न करे पितरों की प्रसन्नता प्राप्त करे । उसके बाद स्वधा वाचन करके विश्वेदेवों को जल प्रदान करे। १७५॥ उसके पश्चात् ब्राह्मणों से आशीर्वाद ग्रहण करे । वह पूर्वाभिमुख खड़ा होकर ब्राह्मणो से कहे अघोराः पितरः सन्तु।
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