Srishti Khanda Extracted Page 108
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-108
Sanskrit Original
तत्रापि पूर्वतः कु्यादग्निकार्य विमत्सरः । उभाभ्यामपि हस्ताभ्यामाहृत्य परिवेषयेत् ॥१५०॥ उशन्त्स्वेति तं दर्भ पाणिभक्तं विशेषतः। गुणान्वितैश्च शाकाद्यैर्नानाभक्ष्वैस्सथैव च ॥१५१॥ अन्नं च सदधिक्षीरं गोघृतं शर्करान्वितम् । मासं प्रीणाति वै सर्वान्पितृनित्याह पद्मजः ॥१५२॥ हौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन्मासाऱ्हारिणेन तु । औरभ्रेणाथचतुरः शाकुनेनाथपंच वै ॥१५३॥ बाराहस्य तु मांसेन षण्मासं तृप्तिरुत्तमा । सप्त लोहस्यमासेन तथाष्टावाजकेन तु ॥१५४॥ पृषतस्य तु मांसेन तृप्तिर्मासान्नवैव तु । दशमासांश्च॒ तृप्यन्ते वराहमाहिषामिषैः ॥१५५॥ शशकूर्मयोस्तु मांसेनमासानेकादशैव तु । संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन वा ॥१५६॥ सौकरेण तु तृप्यते मासाऱ्पंचदशैव तु । वारध्रीणस्य मांसेन तृप्तिर्दाशवार्षिकी ॥१५७॥ कालशाकेन चानंत्यं खड्गमासेन चैव हि। यत्किचिन्मधुना मिश्रं गोक्षीरं दधिपायसम्॥१५८॥ दत्तमक्षयमित्याहुः पितरः पूर्वदेवताः । स्वाध्यायं श्रावयेत्पित्र्यं पुराणान्यखिलानि च ॥१५९॥ ब्रह्मविष्ण्वर्करूद्राणां स्तवानि विविधानि च । इंद्रेशसोमसूक्तानि पावमानीश्च शक्तितः ॥१६०॥ बृहद्रथंतरं तत्र ज्येष्ठसामाथ रौरवम् । तथैव शांतिकाध्यायं मधुब्राह्मणमेव च ॥९६९॥ मण्डलब्राह्मणं तद्दत्प्रीतिकारि च यत्पुनः । विप्राणामात्मनश्चापि तत्सर्वं समुदीरयेत् ॥१६२॥ दान की प्रक्रिया है कि पहले पिता के पात्र का जल पितामह के पात्र में डाले उसके बाद पितामह के पात्र का जल प्रपितामह के पात्र में डाल दे । उसके बाद प्रपितामह के जल पात्र को पितामह के पात्र में रखे, और उन दोनों पात्रों को पिता के पात्र में रखकर पिता के आसन के उत्तर भाग में *पतृभ्यः स्थानमसि यह कहकर उलट दे । उसके बाद अन्न को परोसे ॥१४९॥ अन्न परोसने से पहले अग्निकार्य करे । अर्थात् अन्न में से थोड़ा सा लेकर अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा इस मन्त्र से अग्नि के लिए तथा सोमाय पितृमते स्वाहा इस मन्त्र से सोम देवता के लिए दो-दो बार अग्नि में आहुति दे । इसके बाद दोनों हाथों से अन्न निलकालकर हाथ में कुश लिए हुए परोसे, उस समय उशन्तस्त्वा इत्यादि मन्त्र को पढता रहे । उत्तम गण वाले शाकों तथा अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थो से॥१५०-१५१॥ ब्रह्मजी ने कहा कि दही, दूध, गोधृत तथा शक्कर से युक्त अन्न पितरों को एक मास तक तृप्त रखता है ॥१५२॥ पितरों को मछली के मांस से दो महीनों तक, हरिण के मांस से तीन महीने तक, और के मांस से चार मास तक, पक्षी के मांस से पाँच मास तक ॥१५३॥ वनेले सूकर के मांस से छह मास तक, लोह के मांस से सात मास तक, बकरी के माँस से आठ मास तक ॥१५४॥ पृषत् के मांस से नव महीनों तक वराह तथा महिष के मांस से दश महीने तक ।१५५॥ खरगोश तथा कछुए के मांस से ग्यारह मास तक, गौ के दूध अथवा गौ के दूध से निर्मित खीर से एक वर्ष तक पितरों की तृप्ति होती है ॥१५६॥ सूकर के मांस से पितरों को पन्द्रह महीनों तक तृप्ति होती है । वार्ध्रीणस के मास से पितरो को बारह वर्ष तक तृप्ति बनी रहती है ॥१५७॥ काले शाक तथा गैण्डे के मांस से पितरों की तृप्ति अनन्त काल पर्यन्त बनी रहती है । मधु मिलाकर बनायी हुयी कोई भी वस्तु तथा गौ के दूध से निर्मित खीर से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है ॥१५८॥ ऐसा पितरों ने स्वयं कहा है । इस तरह से मोजन परोस कर पितृ सम्बन्धी वेद मन्त्रों का पाठ समस्त पुराणों को सुनायें ॥१५९॥ ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और रुद्र सम्बन्धी अनेक स्तोत्रों को सुनाये । इन्द्र, रुद्र तथा सोम देवताक सूक्तों को सुनायें । अपनी शक्ति के अनुसार पावमानी सूक्त सुनाये ॥१६०॥ बृहद्रथन्तर, ज्येष्ठसाम का रौरवगान, शान्तिकाध्याय, मधु ब्राह्मण ॥१६१॥ मण्डल ब्राह्मण इसके अतिरिक्त और जो ब्राह्मणों को तथा अपने को भी प्रिय लगे उसे सुनाये । राजन् ब्राह्मणों को भोजन कर लेने पर
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