Srishti Khanda Extracted Page 107
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-107
Sanskrit Original
विश्वेदेवास इत्याभ्यामावाह्य विकिरेद्यवान् । यवोसिधान्यराजस्त्वं वारुणो मथुमिश्रित: ॥१३८॥ निर्णुदः सर्वपापानां पवित्रक्रषिसंस्तुतः । गंधपुष्पैरलंकृत्य यादिव्येत्यर्घमुत्सृजेत्॥९३९॥ अभ्यर्च्य गंधाद्युत्सृज्य पितृयज्ञं समारभेत् । दर्भासनादिकृत्वा दौ त्रीणि पात्राणि चार्चयेत् ॥९४०॥ सपवित्राणि कृत्वादौ शन्नोदेवीत्यपः क्षिपेत्। तिलोसीति तिलान्कुर्याद्नन्धपुष्पादिकं पुनः ॥१४१॥ पात्रं वनस्पतिमयं तथा पर्णमयं पुनः । राजतं वा प्रकुर्वीत तथा सागरसंभवम् ॥९४२॥ सौवर्ण राजतं ताम्रं पितृणां पात्रमुच्यते । रजतस्य कथा वापि दर्शनं दानमेव च॥१४३॥ राजतैर्भाजनैरेषां पितृणां रजतान्वितैः । वार्यपि श्रद्धया दत्तमक्षयायोपकल्पते ॥१४४॥ अद्यापि पितृपात्रेषु पितृणां राजतान्वितम् । शिवनेत्रोद्धवं यस्मादुत्तमं पितृवल्लभम् ॥१४५॥ एवं पात्राणि संकल्प्य यथालाभं विमत्सरः । यादिव्येति पितुर्नामगोत्र दभन्करे न्यसेत् ॥१४६॥ पितृनावाहयिष्यामि तथेत्युक्तः स तैः पुनः । उशंतस्त्वा तथायन्तुऋग्भ्यामावाहयेत्पितृूनू ॥९४७॥ यादिव्ये्य्घ्यमुत्सृज्य दद्याद्गंधादिकं ततः । वस्त्रोत्तरं दर्भपूर्वं दत्वा संश्रयमादितः ॥९४८॥ पितृपात्रे निधायाथ न्युब्जमुत्तरतो न्यसेत् । पितृभ्यः स्थानमसीति निधाय परिंवेषयेत् ॥१४९॥ SS करके यव तथा पुष्प से पूजा करके उनके लिए दो पात्रों को जल से भरे, (क्योंकि विश्वेदेव के लिए दो आसन होते हैं, एक आसन पितृ पितामह सम्बन्धी विश्वेदेव के लिए तथा दूसरा मातामहादि सम्बन्धी विशवेदेवों का) और उस जल पात्र पर कुश तथा पवित्रक को रखे ॥१३६॥ शन्नोदेवी इत्यादि मन्त्र से जल दे और यवोसि इत्यादि मन्त्र से यव प्रदान करे । उसके बाद गन्ध तथा पुष्प से पूजा करके वहाँ पर विश्वेदेव की स्थापना करे ॥१३७॥ विश्वेदेवास आगत इत्यादि दो मन्त्रों से आवाहन करके वहाँ यव डाले । यव छोड़ने के समय यवोऽसि धान्यराजोऽसि० इत्यादि मन्त्र को पढे । इसका अर्थ है कि हे यव तुम ही अत्नों के राजा हो । तुम्हारे देवता वरुण हैं, वरुण से ही तुम्हारी उत्पत्ति हुयी है तुम्हारे भीतर मधु मिला हुआ है, तुम सभी पापों को विनष्ट करने वाले हो तथा पवित्र हो, मुनिजन तुम्हारी प्रशंसा करते हैं । उसके बाद चन्दन एवं पुष्प से अलंकृत करके या दिव्या० इत्यादि मन्त्र को पढते हुए अर्ध्य पात्र को विश्वेदेवों को प्रदान करे ॥१३८-१३९॥ पात्र तथा गन्ध आदि प्रदान करके ही पितृकर्म को प्रारम्भ करे । सर्वप्रथम दर्भ के आसन आदि को प्रदान करके तीन पात्रों की पूजा करे ॥१४०॥ उसके बाद उसमें पवित्र रखकर शान्नो देवी इत्यादि इस मन्त्र से जल डाले । तिलोऽसि इत्यादि मन्त्र से तिल डाल कर उसमें चन्दन और पुष्प आदि डाले ॥१४१॥ अर्घ्य पात्र पिपल आदि वनस्पति के, पत्ते का या चाँदी का होना चाहिए । अथवा समुद्र से निकले हुए शंख इत्यादि को अर्ध्य पात्र बनाये ॥१४२॥ पितरों का पात्र सुवर्ण का, या चाँदी का, या ताम्वे का होना चाहिए । पितृगण चाँदी का नाम भी सुनकर प्रसन्न हो जाते हैं । चाँदी के दर्शन तथा चाँदी का दान भी अक्षय कारक होता है ॥१४३॥ चाँदी से युक्त अथवा चाँदी के पात्र से पितरों को यदि जल भी श्रद्धा पूर्वक दिया जाता तो वह प्रदत्त वस्तु अक्षय होती है । आज भी पितरों के पात्र चाँदी के ही होते है । रजत चूकि शिवजी के नेत्र से उद्भूत है इसीलिए पितरों को अत्यन्त प्रिय है ॥१४५॥ इसतरह से जो सुलभ हो उसे अर्ध्य पात्र बनाकर बिना किसी मत्सर के या दिव्या० इत्यादि मन्त्र पढकर पितरों के नाम तथा गोत्र का उच्चारण करके फिर कुशों को हाथ में ले ले ॥१४६॥ इसके बाद आये हुए ब्राह्मणों से कहे पितृन् आवाहयिष्यामि और वे ब्राह्मण भी कहें तथास्तु उसके बाद उशन्तस्त्वा० तथा आयान्तु० इन दो मन्त्रों से पितरों का आवाहन करे ।।१४७।। उसके बाद या दिव्या० इत्यादि मन्त्र से अर्घ्यं देकर उसके बाद गन्ध इत्यादि तथा उत्तम वस्त्र पितरों को चढाये ।१४८॥। अर्ध्य
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