Srishti Khanda Extracted Page 106

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-106

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Sanskrit Original

अयने विषुवे चैव अमावस्यार्कसंक्रमे । अमावस्याष्टकाकृष्णपक्षपंचदशीषु च॥१२४॥ आद्रामघारोहिणीषु द्रव्यब्राह्मणसंगमे । गजच्छायाव्यतीपाते विष्टिवैधृतिवासरे॥ १ २५॥ वैशाखस्य तृतीयायां नवमी कार्तिकस्य च। पंचदशी तु माघस्य नभस्ये च त्रयोदशी ॥१२६॥ युगादयः स्मृता ह्वोताः पितृपक्षोपकारिकाः । तथामन्वंतरादौ च देयं श्राद्धं विजानता ॥९२७॥ अश्वयुङ्नवमीचैवद्वादशीकार्तिकेतथा । तृतीयाचैत्रमासस्य तथा भाद्रपदस्य च ॥१२८॥ फाल्गुनस्य त्वमावास्या पौषस्यैकादशी तथा । आषाढस्यापि दशमी माघमासस्य सप्तमी ॥१२९॥ श्रावणे चाष्टमी कृष्णा तथाषाढी च पूर्णिमा । कार्तिकी फाल्गुनी चैव ज्येष्ठे पंचदशी सिता ॥१३०॥ मऱ्वंतरादयस्त्वेता दत्तस्याक्षयकारिकाः। पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं, दद्यात्पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः॥१ ३ १॥ श्राद्ध कृतं तेन समास्सहस्रं, रहस्यमेतत्पितरो वदंति । वैशाख्यामुपावासेषु तथोत्सवमहालये ॥१३२॥ तीर्थायतनगोष्ठेषु द्वीपोद्यानगृहेषु च । विविक्तेषूपलिप्तेषु आद्धं देयं विजानता ॥१३३॥ विप्रान्पूर्वेपरे चाह्नि विनीतात्मा निमंत्रयेत् । शीलवृत्तगुणोपेतान्वयो रूपसमन्वितान् ॥१३४॥ द्वौ दैवे पितृकृत्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा । भोजयेत्सुसमृद्धोपि न प्रकुर्वीत विस्तरम् ॥१३५॥ विश्वेदेवान्यवैः पुष्पैर भ्यर्च्यासनपूर्वकम् । पूरयेत्यात्रयुग्मं तु स्थाप्यं दर्भपवित्रके ॥१३६॥ शन्नोदेवीत्यपः कुर्याद्यवोसीतियवानपि । गंधपुष्पैस्तु संपूज्य विश्वान् देवान् प्रतिन्यसेत् ॥१३७॥ तरह श्राद्ध करना चाहिए ॥१२२॥ इसके बाद जिसे ब्रह्माजी ने बतलाया है उस साधारण श्राद्ध को मैं बतलाऊंगा । यह श्राद्ध भोग तथा मोक्ष रूपी फल को प्रदान करने वाला होता है ॥१२३॥ उत्तरायण तथा दक्षिणायन के प्रारम्भ होने के दिन तुला तथा मेष की संक्रान्ति रूप विषुव नामक योग में, प्रत्येक अमावस्या, तथा प्रत्येक संक्रान्ति के दिन, (पौष, माघ, फाल्गुन तथा अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी रूप) अष्टका तिथियों में, पूर्णिमा को॥१२४॥ आर्द्रा, मघा और रोहिणी इन नक्षत्रों में, श्राद्ध के योग्य उत्तम द्रव्य के मिलने पर उत्तम ब्राह्मण के मिलने पर, व्यतिपात, विष्टि तथा वैधृति योग जिस दिन हो, उस दिन ।।१२५॥ वैशाख मास की तृतीया को, कार्तिक मास की नवमी तिथि को, माघ मास की पूर्णिमा को तथा भाद्र पद मास की त्रयोदशी तिथि को श्राद्ध का अनुष्ठान करना चाहिए ॥१२६॥ उपर्युक्त सभी तिथियाँ युगादि कहलाती है और पितरों का उपकार करने वाली होती हैं । इसी तरह मन्वन्तरादि तिथि में भी श्राद्ध करना चाहिए ॥१२७॥ आश्विन शुक्ल नवमी, कार्तिक शुक्ल द्वादशी, चैत्र तथा भाद्र पद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया, फाल्गुन मास की अमावस्या, पौष शुक्ल एकादशी, आषाढ शुक्ल दशमी, माघ शुक्ल सप्तमी, श्रावण कृष्ण अष्टमी, आषाढ, कार्तिक, फाल्गुन तथा ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा ॥१२८-१३०॥ ये मन्वन्तरादि तिथियाँ हैं । इन तिथियों में किया हुआ श्राद्ध अक्षय होता है अतएव मनुष्य को चाहिए कि वह इन तिथियों में पितरों को तिल मिश्रित जल दान करे ॥१३१॥ इन तिथियों को श्राद्ध करने वाले को हजार वर्षों तक श्राद्ध करने का फल प्राप्त होता है, इस रहस्य को पितृगण ही बतलाते हैं ।विज्ञ पुरुष को चाहिए कि वह वैशाख की पूर्णिमा, ग्रहण के दिन, किसी उत्सव के अवसर पर और महालय (अश्विन कृष्णपक्ष) में किसी तीर्थ, मन्दिर, गोशला, द्वीप, उद्यान तथा गृह आदि में लिपे हुए एकान्त स्थान में श्राद्ध करे ॥१३२-१३३॥ नम्रता पूर्वक श्राद्ध से एक दिन पहले अथवा श्राद्ध के ही दिन ब्राह्मणों को निमन्त्रित करे । ब्राह्मणों को शील गुण सम्पन्न एवं अवस्था एवं रूप से युक्त होना चाहिए ॥१३४॥ विश्वेदेव के लिए दो तथा पितरों के लिए तीन ब्राह्मणों को, अथवा दोनों के लिए एक-एक ही ब्राह्मणों को ही भोजन कराना चाहिए । ब्राह्मणों का विरतार न करे ॥१३५॥ विश्वेदेवों को आसन प्रदान

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