Srishti Khanda Extracted Page 105
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-105
Sanskrit Original
विधृत्य सोदकं त्वन्नं सतिलं प्रक्षिपेद्धवि । आचांतेषु पुनर्दद्याज्जलं पुष्पाक्षतोदकम् ॥११०॥ स्वघावाचनकं सर्व पिंडोपरि समाचरेत् । देवाद्यंतं प्रकुर्वीत श्राद्धनाशोन्यथा भवेत् ॥१ १ १॥ विसृज्य विप्रान् प्रणतस्तेषां कृत्वा प्रदक्षिणम्। दक्षिणां दिशमाकांक्षन्पितून॒ुद्दिय मानवः ॥१९२॥ दातारो नोभिवर्द्धतां वेदाः संततिरेव च। श्रद्धा च नो मा व्यगमद्वहुदेयं यं च नो स्त्विति।११३॥ अन्नं च नो बहु भवेदतिथींश्च लभेमहि । याचितारश्च नः सतु मा च याचिष्म कंचन ॥११४॥ एतदग्निमतः प्रोक्तमन्वाहार्यं तु पार्वणम् । यथेदुसंक्षये तद्वदन्यत्रापि निगद्यते ॥११५॥ पिंडांस्तु गोजविप्रेभ्यो दद्यादग्रौ जलेपि वा। वप्रांते वाथ विकिरेदापोभिरथ वापयेत् ॥११६॥ पत्नी तु मध्यमं पिंडं प्राशयेद्विनयान्विताम्। आधत्त पितरो गर्भ पुत्रसंतानवर््नम् ॥११७॥ तावन्निर्वापणं तिष्ठेद्यावद्विप्रा विसर्जिताः । वैश्वदेवं ततः कुर्यान्निवृत्तः पितृकर्मणः ॥११८॥ इष्टैः सह ततः शांतो भुंजीत पितृसेवितम्। पुनर्भोजनमध्वानं यानमायासमैथुनम् ॥११९॥ श्राद्धकृच्छाद्धभुग्यो वा सर्वमेतद्विवर्जयेत् । स्वाध्यायं कलहं चैव दिवास्वप्रं च सर्वदा ॥१२०॥ अनेन विधिना श्राद्धं त्रिवर्गस्येह निर्वपेत् । कन्याकुंभवृषस्थेकै कृष्णपक्षेषु सर्वदा ॥१२१॥ यत्र यत्र प्रदातव्यं सपिंडीकरणात्मकम् । तत्रानेन विधानेन देयमग्निमता सदा ॥१२२॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि ब्रह्मणा यदुदीरितम् । श्राद्धं साधारणं नाम भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥१२३॥ ब्राह्मणों को अभिप्रेत पवित्र भोजन कराये ॥१०८॥ भगवान् श्रीहरि का स्मरण करता रहे, क्रोध न करे । ब्राह्मण जब भोजन करके तृप्त हो जायं तब सार्ववर्णिक विकिर कर्म करे ॥१०९॥ तिल एवं जल के साथ अन्न को लेकर उसे पृथिवी पर डाल दे । ब्राह्मणों के आचमन कर लेने के बाद पिण्डों पर जल, पुष्प एवं अक्षत प्रदान करे ॥११०॥ उसके बाद पिण्ड पर ही स्वधा वाचक सभी कर्मो को करे । स्वधा कर्म को देवादि पर्यन्त करना चाहिए अन्यथा श्राद्ध का नाश हो जाता है ॥१११॥ फिर प्रणत होकर ब्राह्मणों का विसर्जन करके उनकी प्रदक्षिण करे । उसके बाद दक्षिणाभिमुख होकर पितरो से प्रार्थना करे ॥११२॥ मुझको देने वाले बढें, वेदों तथा सन्तानों की समृद्धि हो । हमारी श्रद्धा कभी भी समाप्त न हो, हम बहुत अधिक दान करें ॥११३॥ हमारे यहाँ अन्न बहुत होए । अतिथियों को मैं प्राप्त करता रहूँ । याचना करने वाले लोग मेरे पास आयें, मैं किसी से भी याचना न करूँ ॥११४॥ यह अग्निहोत्री ब्राह्मणों का अन्वाहार्य पार्वण कहलाता है । यह अमावस्या के दिन जैसे किया जाता है उसको अन्यत्र भी बतलाया गया है ॥११५॥ पिण्डों को गाय अथवा बकरी को खिला दे, अथवा ब्राह्मणों को दे दे या अग्नि अथवा जल में डाल दे । या उसे खेत में विखेर दे या धारा में बहा दे ॥११६॥ विनीत पत्नी को मध्यम पिण्ड को खिला दे और पितरों से प्रार्थना करे कि हे पितृगण आपलोग इसके गर्भ में सन्तान वर्द्धक पुत्र का आधान कर दें ॥११७॥ जब तक ब्राह्मणों का विसर्जन नहीं हो जाता है तब तक श्राद्ध तथा पिण्डदान आदि की स्थिति वनी रहती है । पितृकर्म से निवृत्त होने के बाद श्राद्ध कर्त्ता बलिवैश्वदेव करे ॥११८॥ उसके बाद पितरों से सेवित अन्न का शान्ति पूर्वक इष्ट मित्रों के साथ भोजन करे । उस दिन श्राद्ध करने वाले तथा श्राद्ध में भोजन करने वाले को फिर भोजन, मार्ग में चलना, सवारी पर चलना, व्यायाम करना तथा मैथुन करने आदि को त्यागना चाहिए, उस दिन वेदाध्ययन, कलह तथा दिन में सोना आदि को भी त्याग देना चाहिए ॥१२०॥ इस विधि से किया गया श्राद्ध त्रिवर्ग (घर्म, अर्थ एवं काम) को प्रदान करने वाला होता है । जब सूर्य कन्या, कुम्भ तथा दुष राशि पर हो तो कृष्णपक्षमें प्रतिदिनि श्राद्ध करे ।॥। १२ १॥ अग्निहोत्री को चाहिए कि उसे जहाँ-जहाँ पर श्राद्ध करना हो वहाँ-वहाँ सपिण्डी करण विधि से इसी
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