Srishti Khanda Extracted Page 104
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-104
Sanskrit Original
आसनेषृपविष्टेषु दर्भवत्सुविधानतः । उपस्पृष्टोदकान्विप्रानुपवेश्यानुमंत्रयेत् ॥९५॥ द्वौ दैवे पितृकृत्ये त्रीनेकैकं चोभयत्र वा । भोजयेदीश्वरोपीह न कुर्याद्विस्तरं बुधः ॥९६॥ दैवपूर्वनिवेद्याथ विप्रानर्घादिना बुधैः । अग्रौ कुर्यादनुज्ञातो विप्रर्विप्रो यथाविधि ॥९७॥ स्वगृह्णोक्तेन विधिना काले कृत्वा समंततः । अग्नीषोममयाभ्यांतु कुर्यादाप्यायनं बुधः ॥९८॥ दक्षिणाग्नौ प्रणीतेन स एवाम्निर्दिजोत्तमः । यज्ञोपवीतान्निर्वरत्यं ततः पर्युक्षणादिकम् ॥९९॥ प्राचीनावीतिना कार्यमेतत्सर्व विजानता । लब्ध्वा तस्माद्विशेषेणा पिंडान् कुर्वीत चोदकम्॥९००॥ दद्यादुदकपात्रैस्तु सलिलं सव्यपाणिना । दद्यात्सर्वप्रयत्नेन दमयुक्तो विमत्सरः ॥१०१॥ विधाय रेखां यत्नेन निर्वपेदवनेजनं । दक्षिणाभिमुखः क्कुयत्तितो दर्भान्निधाय वै ॥१०२॥ निधायपिंडमेकैकं सर्व॑ दभोपरि क्रमात् । निर्वपेदथ दर्भेषु नामगोत्रानुकीर्तनैः॥९०३॥ तेषु दर्भेषु तं हस्तं विमृज्याल्लेपभागिनाम् । तथैव च जपं कुर्यात्पुनः प्रत्यवनेजनम् ॥१० ४॥ जलयुक्तं नमस्कृत्य गंधधुपार्चनादिभिः । एवमावाह्ण तत्सर्वं वेदमंत्रैर्यथोदितैः ॥१०५॥ एकाग्निरेकएवाद्धिर्निर्वपेददर्विकां तथा । ततः कृत्वा नरो दद्यात्पितृभ्यस्तु कुशान् बुधः॥९०६॥ ततःपिंडादिकं कुर्यादावाहनविसर्जनम्। ततो गृहीत्वा पिडेभ्यो मात्राः सर्वाः क्रमेण तु॥१०७॥ तानेवविप्रानप्रथममाशयित्वा च मानवः । वर्णयन्भोजयेदन्नमिष्टं पूतं च सर्वदा॥१०८॥ वर्जयेत्क्रोधपरतां स्मरन्नारायणं हरिम् । तृप्तान् ज्ञात्वा पुनः कुर्याद्विकिरं सार्ववर्णिकम्॥१०९॥ कुश युक्त आसन पर बैठे हुए ब्राह्मणों के विधिपूर्वक आचमन कर लेने पर आसन पर बैठाकर उनसे मन्त्रोच्चारण कराये । अथवा उनको मन्त्रों से अभिमन्त्रित करे ॥९५॥। श्राद्धकर्ता के बहुत अधिक धनिक होने पर भी दैव कृत्य में दो तथा पितृकृत्य में तीन अथवा दोनों में एक-एक ही ब्राह्मण को भोजन करना चाहिए, इससे अधिक विस्तार नहीं करे ॥९६॥ पहले देवताक ब्राह्मणों को अर्ध्य इत्यादि प्रदान करके उसके बाद पितृ सम्बन्धी ब्राह्मणों को अर्घ्य इत्यादि प्रदान करना चाहिए । उसके बाद उन ब्राह्मणों से आज्ञा लेकर अग्नि में होम इत्यादि करे । अपने गृहासूत्र में वर्णित विधि से समयानुसार होम इत्यादि करे । वह चरु से अग्नि तथा सोम को आहुति देकर उनका आप्यायन करे ॥९८॥ इन सबों को दक्षिणाग्नि में ही करना चाहिए । वह अग्नि ही श्रेष्ठ ब्राह्मण है । उसके बाद पितरों के लिए किए जाने वाले पर्युक्षण आदि सभी कार्या को विज्ञ पुरुष को अपसव्य होकर ही करना चाहिए । हवन से बचे हुए अन्न को लेकर उससे कई पिण्डों को बनाये और उसका दान जल और तिल के साथ दाहिने हाथ से करे । इन सभी कार्यों को जितेन्द्रिय तथा मत्सर रहित होकर करना चाहिए ॥१०१॥ उसके बाद वेदी पर कुश से रेखा बनाकर सावधानी पूर्वक अवनेजन डाले । इसके बाद दक्षिणाभिमुख होकर कुश रखकर ॥१०२॥ कुशों पर एक-एक पिण्ड को सभी कुशों पर रखे । और पितरों के नाम तथा गोत्र का उच्चारण करे ॥१०३॥ उन कुशों पर उस हाथ को पोंछकर, कहे कि लेपभागभुजः पितरः तृप्यन्तु अर्थात् इससे लेपभाग भोजी पितृगण तृप्त हों । इसके बाद फिर ् रत्यवनेजन करे ।। १०४।। उसके बाद जल युक्त पिण्डों को नमस्कार करके उनकी धूप दीप इत्यादि से पूजन करे । इसी तरह से सभी पितरों को आवाहन करके श्राद्ध कल्प के मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए ॥१०५॥ आहवनीय एक-एक अग्नि के प्रतिनिधि भूत एक-एक ब्राह्मण की एक-एक कलछूल दे देना चाहिए । उसके बाद विज्ञ पुरुष पिण्डों पर पितरों के लिए कुश रखे ॥१०६॥ उसके बाद पिण्डों आदि का विसर्जन कर देना चाहिए । उसके बाद सभी पिण्डों से थोड़ा-थोड़ा अंश निकाले ॥१०७॥ और उसी अंश को पहने ब्राह्मणों को खिलाकर उन
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