Srishti Khanda Extracted Page 103

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-103

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Sanskrit Original

ब्रह्मभक्त: पितृपरः सूर्यभक्तोऽथ वैष्णव: । ब्राह्मणो योगनिष्ठात्मा विजितात्मा सुशीलवान् ॥८ १॥ एते तोष्या: प्रयत्मेन वर्जनीयानिमान् शृणु । पतितस्तत्सुतः क्लीबः पिशुनो व्यंगरोगितः ॥८२॥ सर्वे ते श्राद्धकाले तु त्याज्या वै धर्मदर्शिभिः । पूर्वेदयुरपरेद्युर्वां विनीतांश्च निमंत्रयेत् ॥८३॥ निमंत्रितांश्च पितर उपतिष्ठंति तान् द्विजान् । वायुभूतानि गच्छंति तथासीनानुपासते ॥८ ४॥ दक्षिणं जानु चालभ्य वामं पात्य निमंत्रयेत् । अक्रोधनैः शौचपरैः सुस्नातैर्ब्रह्मवादिभिः ॥८ ५॥ भवितव्यं भवद्धिस्तु मया च ् द्धकर्मणि। पितृयज्ञं विनिर्वर्त्यतर्पणाख्यं तु योभ्निमान् ॥८६॥ पिडान्वा हार्यकं कुर्याच्छाद्धमिंदुक्षये तथा । गोमयेनानुलिप्ते तु दक्षिणा प्लवनस्थले ॥८७॥ श्राद्धं समारभेद्धक्त्या गोष्ठे वा जलसन्निधौ । आग्निमान्निर्वपेत्पित्र्यं चरुं वा सक्तु मुष्टिभिः ॥८८॥ पितृभ्यो निर्वपामीति सर्व दक्षिणतो न्यसेत् । अभिघार्य ततः कुर्यान्निर्वापत्रयमग्रतः ॥८ ९॥ तेवितस्त्यायताः कार्याश्चतुरङ्गलुविस्तृताः । दर्वीत्रयं च कुर्वीत खादिरं रजतान्वितम् ॥९०॥ रत्निमात्रं परिश्लक्ष्णं हस्ताकाराग्रमुत्तमम् । उदपात्राणि कांस्यस्य मे क्षणं च समित्कुशम् ॥९९॥ तिलपात्राणि सद्वासो गंधधूपानुलेपनम् । आहरेदपसव्यं च सर्व दक्षिणतः शनैः ॥९२॥ एवमासाद्य तत्सर्व भवनस्योत्तरेतरे । गोमयेनानुलिप्तायां गोमूत्रेण च मंडलम् ॥९३॥ साक्षताभिः सपुष्पाभिरद्धिः सव्यापसव्यवत्। विप्राणां क्षालयेत्पादावभिवंद्य पुनः पुनः ॥९४॥ त्रिणाचिकेत, त्रिमधु, अन्य शास्रों को भी जानने वाले, पुराणों के ज्ञाता, ब्रह्मज्ञानी, स्वाध्याय करने वाले, जप करने वाले ॥८०॥ ब्राह्मण भक्त, पिता की सेवा करने वाले, सूर्य का भक्त, वैष्णव, ब्रह्मवेत्ता, योगों को जानने वाले, जितेन्द्रिय, सुशील ॥८१॥ श्राद्ध में ऐसे ब्राह्मणों को प्रयत्न पूर्वक सन्तुष्ट करना चाहिए । अब श्राद्ध में वर्जनीय (नहीं भोजन कराने योग्य) ब्राह्मणों को सुनो । पतित, पतित का पुत्र, नपुंसक, कृपण, रोग से अत्यन्त पीडित ब्राह्मणों को श्राद्ध के समय विल्कुल त्याग देना चाहिए । श्राद्ध से एक दिन या दो दिन पहले ब्राह्मणों को निमन्त्रित करना चाहिए॥८ २-८ ३॥ निमन्त्रित ब्राह्मणों के शरीर में पितरों का आवेश हो जाता है । वे वायु बनकर उन ब्राह्मणों के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और उन ब्राह्मणों के बैठ जाने पर वे भी बैठ जाते हैं ॥८४॥। दाहिना घुटना पकड़कर तथा वायाँ पृथिवी पर गिराकर ब्राह्मणों को निमन्त्रित करना चाहिए । यह ब्राह्मणों से प्रार्थना करे कि आपलोग मेरे द्वारा किए जाने वाले इस श्राद्धमें क्रोध रहित, पवित्र, सुस्नात तथा ब्रह्मवादी बनें ।।८५।। अग्निहोत्री तर्पण नामक पितृकार्य को पूरा करके तथा आहार्यक पिण्डों का निर्माण करके अमावस्या के दिन श्राद्ध करे । श्राद्ध के स्थान को दक्षिण की ओर नीचा होना चाहिए । उस स्थान को गोबर से लिप दे ॥८६-८७॥ श्राद्ध गोशाल अथवा जलाशय के सन्निकट प्रारम्भ करना चाहिए । अग्निहोत्री पुरुष चरु अथवा सत्तू के द्वारा श्राद्ध करे । वह चरु बनाकर कहे कि इससे मैं पितरों का श्राद्ध करूंगा और उसे दक्षिण दिशा में रख दे । उसके बाद उसमें मधु, घी तथा तिल मिला दे । फिर अपने सामने तीन वेदियों को बनाये ॥८९॥ उन वेदियों को चार अङ्गुल चौड़ी तथा एक वित्ता लम्बा होना चाहिए । उसके बाद चाँदी से युक्त तीन खैर की लकड़ी के तीन करछूल को बनावे ।।९०।। उसको एक हाथ लम्बा चिकना और आगे की ओर हाथ के आकार का होना चाहिए । उसके बाद दक्षिण दिशा में जलपात्र, कांस्यपात्र, प्रोक्षण, समिधा, कुश ॥९१॥ उत्तम वस्र, चन्दन, धूप, अनुलेपन को अपसव्य होकर रखना चाहिए । इन सारी वस्तुओं को एकत्रित करके घर के उत्तर दिशा में गोबर से लिपी हुयी भूमि पर गोमूत्र से मण्डल बनाये ॥९३॥ इसके बाद अक्षत एवं पुष्प से युक्त जल से क्रमश: सव्य एवं अपसव्य होते हुए ब्राह्मणों का पैर धोए । उनको बार-बार प्रणाम करके॥९४॥

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