Srishti Khanda Extracted Page 102
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-102
Sanskrit Original
पितृग्रीणाति यो भक्तद्या ते पुनः प्रीणयंति तम् । यच्छंति पितरः पुष्टिं स्वांगारोग्यं प्रजाफलम् ॥६७॥ देवकार्यादपि पुनः पितृकार्यं विशिष्यते । देवताभ्यः पितृणां तु पूर्वमाप्यायनं स्मृतम् ॥६८॥ शीप्रप्रसादास्त्वक्रोधा निस्संगा:स्थिरसौहृदाः । शांतात्मानः शौचपराः सततं प्रियवादिनः ॥६९॥ भक्तानुरक्ताः सुखदाः पितरः पर्वदेवताः । हविष्मताधिपत्ये श्राद्धदेवः स्मृतो रविः ॥७०॥ एतद्धि सर्वमाख्यातं पितृवंशानुकीर्त्तनम् । पुण्यंपवित्रमारोग्यं कीर्तनीयं नृभिः सदा ॥७९॥ भीष्म उवाच श्रुत्वैतदखिलं भूयः परा भक्तिरूपस्थिता । श्राद्धकालं विधिं चैव श्राद्धमेव तथैव च॥७२॥ श्राद्धेषु भोजनीया ये श्राद्धवर्ज्या द्विजातयः । कस्मिनवासरभागे तु पितृभ्यः श्राद्धमारभेत् ॥७३॥ अन्नं दत्तं कथं याति श्राद्धे वै ब्रह्मवित्तम। विधिना केन कर्तव्यं कथं प्रीणाति तान् पितृन् ॥७४॥ पुलस्त्य उवाच कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन च । पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन् ॥७५॥ नित्यं नैमित्तिक काम्यं त्रिविधं श्राद्धमुच्यते। नित्यं तावत्प्रवक्ष्यामि अर्ध्यावाहनवर्जितम् ॥७६॥ अदैवतं विजानीयात्पार्वणं पर्वसु स्मृतम् । पार्वणं त्रिविधं प्रोक्तं शृणु यत्नान्महीपते ॥७७॥ पार्वणे ये नियोज्यास्तु तानूश्रुणुष्व नराधिप । पंचाग्नि: स्नातकश्चैव त्रिसौपर्णः षडंगवित् ॥७८॥ श्रोत्रियः श्रोत्रियसुतो विधिवाक्यविशारदः । सर्वज्ञो वेदवान्मंत्री ज्ञानवंशकुलान्वितः ॥७९॥ त्रिणाचिकेतास्त्रिमधुः श्रुतेष्वन्येषु संस्थितः । पुराणवेत्ता ब्रह्मज्ञः स्वाध्यायी जपतत्परः ॥८ ०॥ श्राद्ध में इन सब वस्तुओं का उपयोग न करें ॥६४-६६॥ जो भक्तिपूर्वक पितरों को प्रसन्न करता है पितृगण उसको भी सुखी बना देते हें । पितृगण, अङ्गों की पुष्टि, आरोग्य तथा प्रजारूपी फल को प्रदान करते हैं ॥६७॥ पितृकार्य देवकार्य से भी श्रेष्ठ हैं । इसीलिए पितरों की तृप्ति देवताओं से पहले बतलायी गयी है ॥६८॥ पितृगण शीघ्र प्रसन्न होने वाले, क्रोध रहित, स्थिर सौहार्द वाले, शान्त, पवित्र तथा सदा प्रिय बोलने वाले होते हैं ॥६८-६९॥ भक्तों से प्रेम करने वाले, सुख देने वाले पितृगण पर्वो के देवता हैं । हविष्मान पितरों के अधिपति सूर्य ही श्राद्ध के देवता हैं॥७०॥ इसतरह से मैंने पितरों के पवित्र वंश का वर्णन किया मनुष्यों को चाहिए कि वे इस पुण्य, पवित्र, अरोग्य प्रदान करने वाले आख्यान का सदा कीर्तन किया करें ॥७१॥ भीष्मजी ने कहा-- इन सारी बातों को सुनकर मुझमें अत्यन्त भक्ति उत्पन्न हो गयी है । अब आप मुझे श्राद्ध का काल, श्राद्ध की विधि तथा श्राद्ध के स्वरूप को बतलायें । यह भी बतलायें कि श्राद्ध में किन ब्राह्मणों का भोजन कराना चाहिए तथा किन ब्राह्मणों को श्राद्ध में त्याग कर देना चाहिए । दिन के किस भाग में श्राद्ध प्रारम्भ करना चाहिए ॥७३॥ श्राद्ध में दिया हुआ अन्न पितरों को कैसे प्राप्त होता है ? श्राद्ध को किस विधि से करना चाहिये ? श्राद्ध किस प्रकार पितरों को प्रसन्न करता है ॥७४॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- अन्न तथा जल आदि से प्रतिदिन श्राद्ध करना चाहिए, अथवा दूध, मूल, फल के द्वारा पितरं को प्रसन्न करते हुए श्राद्ध करे ॥७५॥ श्राद्ध तीन प्रकार का होता है नित्य, नैमित्तिक तथा काम्य । जो श्राद्ध पर्व पर किए जाते हैं वे पार्वण श्राद्ध कहलाते हैं । पार्वण श्राद्ध तीन प्रकार का होता है । हे राजन् ! इसे सावधानी पूर्वक सुनो ॥७७॥ पार्वण में जिन ब्राह्मणों को आमन्त्रित करना चाहिए उन सबों को तुम सुनो । पञ्चाग्नि का सेवन करने वाले, स्नातक, त्रिसौपर्ण, वेदांगों के ज्ञाता ॥७८॥ श्रोत्रिय (वेदज्ञ) श्रोत्रिय का पुत्र, वेदों के विधिवाक्यों को जानने वाले, सर्वज्ञ, वेदाध्ययन करने वाले, मन्त्र का जप करने वाले, सद्वंश तथा सत्कुल वाले ज्ञानी ॥७९॥
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