Srishti Khanda Extracted Page 101

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-101

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Sanskrit Original

एषाष्टकाभवत्पश्चाृह्णमलोकं गता सती । त्रय एते गणाः प्रोक्ता श्चतुर्थं तु वदाम्यहम् ॥५२॥ लोकाःसुमनसो नाम ब्रह्मलोको परिस्थिताः। सोमपा नाम पितरो यत्र तिष्ठंति शाश्वतम् ॥५३॥ धर्ममूर्तिधराः सर्वे परतो ब्रह्मणः स्मृताः । उत्पन्नाः प्रलयान्ते तु ब्रह्मत्वं प्राप्य योगिनः ॥५४॥ कृत्वा सृष्ट्यादिकं सर्वे मानसे सांप्रतं स्थिताः । नर्मदा नाम तेषां तु कन्या तोयवहा सरित् ॥५५॥ भूतानि पुनती यातु पश्चिमोदधिगामिनी । तेभ्यः सर्वत्र मनुजाः प्रजासर्गे च निर्मितम् ॥५६॥ ज्ञात्वा श्राद्धानि कुर्वति धर्मभावेन सर्वदा । सर्वदा तेभ्य एवास्य प्रसादाद्योगसंततिः॥५७॥ पितृणामादिसगें तु श्राद्धमेव विनिर्मितम् । सर्वेषां राजतं पात्रमथवाराजतान्वितम् ॥५८॥ दत्तं स्वधां पुरोधाय पितृन्प्रीणाति सर्वदा । आग्नीघ्र सोमपाभ्यां तु कार्यमाप्यायनं बुधैः ॥५९॥ अम्मयभावे तु विप्रस्य पाणौ वाथ जलेपि वा। अजाकर्णे श्वकर्णे वा गोष्ठे वाथ शिवांतिके ॥६०॥ पितृणाममलं स्थानं दक्षिणा दिक् प्रशस्यते । प्राचीनावीतमुदकं तिलसंत्यागमेव च॥६९॥ खड्गिनामामिषं चैवमन्नं श्यामाकशालयः । यवनीवारमुत्रेक्षुशुक्लपुष्पफलानि च॥६२॥ वल्लभानि प्रशस्तानि पितृणामिह सर्वदा । दर्भा माष षष्टिकान्नं गोक्षीरं मधुसर्पिषी॥६३॥ शस्त्राणि च प्रवक्ष्यामि श्राद्धे वर्ज्यानि यानि च । मसूरशणनिष्पावा राजमाषाः कुलुत्थकाः ॥६४॥ पद्मविल्वार्कधूत्तरपारिभद्राटरूषकाः । न देयाः पितृकार्येषु पयश्चाजाविकं तथा ॥६५॥ कोद्रवो दारवरटकपित्थं मधुकातसी । एतान्यपि न देयानि पितृभ्यः श्रियमिच्छता ॥६६॥ नाम से विख्यात है, वह नहुष की पत्नी तथा ययाति की माता थी ॥५१॥ यही बाद में ब्रह्मलोक में जाकर अष्टका हो गयी । इस तरह से मैंने पितरों के तीन गणों को बतलाया अब चौथे गण को बतला रहा हूँ ॥५२॥ ब्रह्मलोक के ऊपर सुमनस नामक लोक हैं । वहाँ पर सदा सोमय नामक पितृगण रहते हैं ॥५३॥ वे धर्ममय शरीर वाले तथा ब्रह्माजी से भी श्रेष्ठ हैं । वहाँ पर प्रलय के अन्त में ब्रह्मत्व को प्राप्त करके योगिगण उत्पन्न हुए ॥५४। वे सब सृष्टि आदि करके इस समय मन में स्थित हैं । उनकी मानसी कन्या का नाम नर्मदा है । जो सदा जल प्रवाहित होते रहने वाली नदी स्वरूपा है ॥५५॥ जीवों को पवित्र बनाती हुयी वह पश्चिम समुद्र में जाकर मिल जाती है । उन सोमप नामक पितरों से ही प्रजासर्ग की सृष्टि हुयी है ॥५६॥ इस बात को जानकर लोग धर्म की भावना से श्राद्ध करते हैं। उन पितरों की ही कृपा से योग का विस्तार होता है ॥५७॥ इस तरह से पितरों के आदि सर्ग में इस प्रकार से श्राद्ध का निर्माण हुआ । श्राद्ध में सभी पात्रों को चाँदी का होना चाहिए अथवा उन्हें चाँदी युक्त होना चाहिए ॥५८॥ पितरों के उद्देश्य से स्वधा शब्द का उच्चारण किया हुआ । पुरोहित को दान पितरों को तृप्त कर देता है । अग्निहोत्री तथा सोमप ब्राह्मणों से ही अग्निहोत्र के द्वारा पितरों को तृप्त करना चाहिए ॥५९॥ अग्नि के अभाव में ब्राह्मण के हाथ पर अथवा जल में अजा (बकरी) के कान में अथवा घोड़े के कान में अथवा शिवजी के सन्निकट पितरों के लिए दान करे॥६०॥ पितरों के लिए दक्षिण दिशा प्रशस्त मानी गयी है । यज्ञोपवीत को अपसव्य करके तिल तथा जल से श्राद्ध एवं तर्पण करे ॥६१॥ गैंडे का मास, अन्न, सांवा, अगहनी का चावल, यव, नीवार, मूंग, ईख, उजले पुष्प तथा फल ये पितरों को प्रिय तथा श्राद्ध में प्रशस्त होते हैं । कुश, उड़द, साठी'का चालव, मधु, गोदुग्ध, शहद तथा गोधृत पितरों को प्रिय हें ॥६२-६३॥ अब मैं ऐसे पदार्थों को बतलाता हूँ जो श्राद्ध में बिलकूल वर्जित है मसूर, शण, निष्पावा (मटर) राजमाष (काली उड़द) कुलथी, कमल, विल्व, मदार, धत्तूर, परिभद्रट, रूषक, भेड़ अथवा बकरी के दूध कोदो, उदार, वरट, कैंथ, महुआ, अतसी (तिसी या अलसी) कल्याण चाहने वाले को चाहिये कि वे

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