Srishti Khanda Extracted Page 99
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-99
Sanskrit Original
्ड श्रीपद्ममहापुराण विलज्जमाना पितृभिरिदमुक्ता तपस्विनी । भविष्यमथ चालोक्य देवकार्यं च ते तदा॥२०॥ इदमूचुर्महाभागाः प्रसादशुभया गिरा। दिवि दिव्यशरीरेण यत्किचित्क्रियते बुधैः॥२९॥ तेनैव तत्कर्मफलं भुज्यते वरवर्णिनि । सद्यः फलंति कर्माणि देवत्वे प्रेत्य मानुषे॥२२॥ तस्मात्त्वं सुकृतं कृत्वा प्राप्स्यसे प्रेत्य यत्फलम् । अष्टाविंशे भवित्री त्वं द्रापरे मत्स्ययोनिजा ॥२३॥ व्यतिक्रमात्पितृणां तु कष्टं कुलमवाप्स्यसि । तस्माद्राज्ञो वसोःकन्या त्वमवश्यं भविष्यसि ॥२४॥ कन्यात्वे देवलोकांस्ताऱयुनः प्राप्स्यसि दुर्ल्लभान्। पराशरस्य वीर्येण पुत्रमेकमवाप्स्यसि ॥२५॥ द्वीपे तु बदरीप्रायो बादरायणमप्युत। स वेदमेकं बहुधा विभजिष्यति ते सुतः ॥२६॥ पौरवस्यात्मजौ द्वौ तु समुद्रांशस्य शंतनोः। विचित्रवीर्यस्तनयस्तथा चित्रांगदो नृप:॥२७॥ इमावुत्पाद्य तनयौ क्षेत्रजौ तस्य धीमतः। प्रौष्ठपद्यष्टका भूयः पितृलोके भविष्यसि ॥२८॥ नाम्रा सत्यवती लोके पितृलोके तथाष्टका। आयुरारोग्यदा नित्यं सर्वकामफलप्रदा॥२९॥ भविष्यसि परेलोके नदीत्वं च गमिष्यसि । पुण्यतोया सरिच्छ्रेष्ठा लोकेष्वच्छोदनामिका ॥३०॥ इत्युक्ता सा गणै स्तैस्तु तत्रैवांतरधीयत । साप्यापचारित्रफलं मया यदुदित पुरा ॥३९॥ विभ्राजो नाम ये चान्ये दिवि संति सुवर्चसः । लोका बर्हिषदो यत्र पितरः संति सुव्रताः ॥३२॥ यत्र बर्हिषि युक्तानि विमानानि सहस्त्रशः । सङ्कल्पपादपा यत्र तिष्ठंति फलदायिनः॥३३॥ यदभ्युदयशालासु मोदन्ते श्राद्धदायिनः । ये दानवासुरगणा गंधर्वाप्सरसांगणाः ॥३४॥ यक्षरक्षोगणास्ते च यजन्ति दिवि देवताः । पुलस्त्य पुत्राः शतशस्तपोयोगबलान्विताः ॥३५॥ महात्मानो महाभागा भक्तानामभयङ्कराः । एतेषां पीवरी कन्या मानसी दिवि विश्रुता॥३६॥ पितरों ने कहा विज्ञ पुरुष स्वर्ग लोक में दिव्य शरीर के द्वारा जो कुछ भी कर्म करते है, हे सुन्दरी ! उसी शरीर से वे उस कर्म का फल प्राप्त करते हैं । मनुष्य के मरकर देवत्व को प्राप्त कर लेने पर कर्मो का फल वे सद्य: प्राप्त करते हैं ॥२१-२२॥ अतएव तुम पुण्य करके जिस फल को प्राप्त करोगी, उसके कारण तुम अठाइसवें द्वापर में मत्स्य की योनि से उत्पन्न होओगी ॥२३॥ पितरों के व्यतिक्रम के कारण तुम इस कष्टप्रद वंश को प्राप्त करेगी । उसके कारण वसु राजा की कन्या अवश्य होओगी ॥२४॥ कन्या रहने पर ही तुम दुर्लभ देवलोकों को प्राप्त करोगी। महर्षि पराशर के वीर्य से तुम एक पुत्र को प्राप्त करोगी ॥२५॥ बदरी प्रधान द्वीप में बादरायण नामक वह तुम्हारा पुत्र होगा । तुम्हारा वह पुत्र एक ही वेद के अनेक विभागों को करने वाला होगा ॥२६॥ पुरुवंश में उत्पन्न समुद्र के अंशभूत शन्तनु के दो पुत्र विचित्र वीर्य तथा चित्रांगद को उत्पन्न करोगी ॥२७॥ राजा शन्तनु के क्षेत्रज उन दोनों पुत्र को उत्पन्न करके तुम पुनः पितृलोक में प्रौष्ठपदी तथा अष्टका हो जाओगी ॥२८॥ तुम्हारा लोक में सत्यवती तथा पितृलोक में अष्टका नाम होगा । तुम सदा आयु, आरोग्य तथा सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली होओगी ॥२९॥ लोक में अच्छेदा नाम वाली तुम अपने पुण्य के कारण परलोक में श्रेष्ठ नही होओगी ॥३ ०॥ पितरों द्वारा इस तरह कहे जाने पर वह वहीं अन्तर्धान हो गयी और चरित्र भ्रष्ट होने के कारण पूर्वोक्त फल को प्राप्त की ॥३ १॥ स्वर्गलोक में जो विभ्राज नामक देदीप्यमान लोक हैं, वहाँ पर सुन्दर ब्रत वाले वर्हिषद नामक पितृगण रहते हैं ॥३२॥ वहाँ पर मयूरों से युक्त हजारों विमान हैं, और सङ्कल्प मात्र से फल प्रदान करने वाले वृक्ष हैं ॥३३॥ जिसकी अभ्युदय शालाओं में श्राद्ध करने वाले आनन्दानुभव करते हैं दानव, असुर, गन्धर्व तथा अप्सराओं के जो जो गण हे॥३४॥ यक्ष तथा राक्षस गण हैं, वे भी स्वर्गलोक में देवताओं का पूजन करते है । वहाँ पर तपस्या तथा योग के
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