Srishti Khanda Extracted Page 98

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-98

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Sanskrit Original

पुनर्ब्रह्मदिनांते तु जायंते ब्रह्मवादिन:। संप्राप्य तां स्मृतिं भूयो योगं सांख्यमनुत्तमम् ॥५॥ सिद्धिं प्रयांति योगेन पुनरावृत्तिदुर्ल्लभाम् । योगिनामेव देयानि तस्माच्छाद्धानि दातृभिः ॥६॥ एतेषां मानसी कन्या पत्नीहिमवतो मता । मैनाकस्तस्य दायादः क्रौचस्तस्यसुतो भवत्॥७॥ क्रौचद्वीपःस्मृतो येन चतुर्थो वृतसंयुतः। मेना तु सुषुवे तिस्त्रः कन्या योगवतीस्ततः ॥८॥ उमैकपर्णा पर्णा च तीक्रव्रतपरायणाः । रुद्रस्यैका भृगोश्चैका जैगीषव्यस्य चापरा ॥९॥ दत्ता हिमवता बालाःसर्वलोकतपोधिकाः । पितृणां लोकसंगीतं कथयामि शृणुष्व तत्॥१०॥ लोकाः सोमपथा नाम यत्र मारीचनंदनाः । वर्त्तते येन पितरो यान् देवा भावयन्त्यलम् ॥१९॥ अग्निष्वात्ता इतिख्याता यज्वानो यत्र संस्थिताः । अच्छोदा नाम तेषां कन्याभूद्रवणिनी ॥१२॥ अच्छोदं च सरस्तत्र पितृभिर्निर्मितं पुरा। अच्छोदाथ तपश्चक्रे दिव्यं वर्षसहस्रकम् ॥१३॥ आजग्मुः पितरस्तुष्टा दास्यन्तः किल ते वरम् । दिव्यरूपधराः सर्वे दिव्यमाल्यानुलेपनाः ॥१४॥ सर्वे प्रधाना बलिनः कुसुमायुधसन्निभाः। तन्मध्ये मावसुं नाम पितरं वीक्ष्य सांगना ॥१५॥ वव्रे वरार्थिनी संगं कुसुमायुधपीडिता । योगाद्धष्टा तु सा तेन व्यभिचारेण भामिनी ॥१६॥ धरान्नस्पृशते पूर्व प्रयाताथभुवस्तले । तथैवामावसुयोऽ यमिच्छांचक्रे न तां प्रति ॥१७॥ धैर्येण तस्य सा लोके अमावास्येति विश्रुता । पितृणां वल्लभा यस्माइत्तस्याक्षयकारिका॥ १८॥ अच्छोदाधोमुखी दीना लज्जिता तपसः क्षयात् । सा पितृत्रार्थयामास पुनरात्मसमृद्धये॥१९॥ किए ।।३-४॥ ब्रह्माजी के दिन के समाप्त हो जाने पर वे योग तथा संख्या विषयक सर्वोत्तम स्मृति को प्राप्त करके ब्रह्मवादी हो जाते हैं ॥५॥ वे (संसार में आगमन रूप) पुनरावृत्ति रहित सिद्धि (मुक्ति) को प्राप्त कर लेते हैं । अतएव दाताओं को चाहिए कि वे योगियों को ही श्राद्धीय दान दें ।॥६॥ पितरों की मानसी कन्या हिमवान् की पत्नी हुयी । हिमवान् का दायद (पुत्र) मैनाक था और उसका पुत्र क्रौञ्च पर्वत हुआ ॥७॥ उसी के कारण घृत से युक्त क्रौच्च द्वीप हुआ । उसके बाद योगज्ञा मेना ने तीन कन्याओं को जन्म दिया ॥८॥ उनके नाम हैं उमा, एकपर्णा तथा पर्णा । ये तीनों तीव्र ब्रत करने वाली थीं । हिमालय ने उन तीनों में से एक का विवाह रुद्र से, दूसरी का भृगु महर्षि से तथा तीसरी का जैगीषव्य महर्षि से कर दिया । ये तीनों सभी लोकों से अधिक तपस्या करने वाली थीं । मैं पितरों के लोक सङ्गीत को कहता हूँ, उसे तुम सुनो ॥९-१०॥ जहाँ पर मारीच नन्दन पितृगण रहते हैं वे सोमपथ नामक लोक हैं जिसके द्वारा पितृगण जिन देवताओं का ध्यान करते हैं ॥११॥ जहाँ पर अग्निष्वाता नामक यज्ञ करने वाले पितृगण रहते हैं, उन पितरों की अच्छोदा नाम की सुन्दरी कन्या हुयी । वहीं पर पितरों ने प्राचीन काल में अच्छोद नामकसरोवर का निर्माण कर दिया । अच्छोदा ने देवताओं के एक हजार वर्ष तक तपस्या किया ॥१३॥ वहाँ पर पितृगण उसे वरदान देने के लिए आये, वे सब दिव्य रूप धारण करके दिव्यमाला धारण किए थे ॥१४॥ वे सब प्रधान तथा बलवान् थे तथा कामदेव के समान: सुन्दर थे । उन पितरों में अमावसु नामक पितर को देखकर उसने ॥१५॥ कामार्त होकर उन्हे वर के रूप में माँगा । उस व्यभिचार के कारण वह सुन्दरी योगभ्रष्टा हो गयी ॥१६॥ जो पृथिवी पर चलती हुयी पृथिवी का स्पर्श नहीं करती थी, उसको अमावसु ने प्राप्त करना नहीं चाहा ॥१७॥ धैर्य के कारण वह लोक में अमावस्या नाम से प्रख्यात हुयी । पितरों को दी गयी वस्तुओं को अक्षय बनाने वाली होने के कारण वह पितरों को प्रिय हुयी ॥१८॥ तपस्या का क्षय हो जाने के कारण अपनी समृद्धि के लिए वह पितरों से प्रार्थना की तो लज्जित होती हुयी अच्छोदा से भविष्यत् कालिक देवताओ के कार्य को देखकर पितरों ने ॥१९-२०॥ प्रसन्न होकर

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