Srishti Khanda Extracted Page 97
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-97
Sanskrit Original
नलस्तु निषधाज्जातो नभास्तस्मादजायत । नभसः पुंडरीकोऽ भूत् क्षेमधन्वा ततः परम् ॥१५८॥ तस्य पुत्रोभवद्वीरो देवानीकः प्रतापवान् । अहीनगुस्तस्य सुतः सहतस्त्राश्वस्ततःपरः ॥१५९॥ ततश्चंद्रावलोकस्तु तारापीडस्ततोऽ भवत्। तस्यात्मजश्चनद्रगिरिश्चंद्रस्तस्य सुतो भवत् ॥१६०॥ श्रुतायुरभवत्तस्माद्धारते योनिपातितः । नलौद्वावेवविख्यातौ वंशे यस्य विशेषतः ॥१६९॥ वीरसेनसुतस्तद्वन्नैषघश्च नराधिपः । एतेविवस्वतो वंशेराजानो भूरिदक्षिणाः ॥१६२॥ इक्ष्वाकुवंशप्रभवाः प्राधान्येन प्रकीर्तिताः ॥१६३॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे आदित्यवंशकथनं नामाष्टमोध्यायः ॥८॥ --औ4--- नवा अध्याय भीष्म उवाच भगवन् श्रोतुमिच्छामि पितृणां वंशमुत्तमम्। रवेश्च श्राद्धदेवस्य सोमस्य च विशेषतः ॥९॥ पुलस्त्य उवाच हंत ते कथयिष्यामि पितृणां वंशमुत्तमम् ।स्वर्गेपितृगणाः सप्त त्रयस्तेषाममूर्तयः ॥२॥ मूर्तिमंतोऽ थचत्वारः सर्वेषाममितौजसाम् । अमूर्त्तयःपितृगणा वैराजस्य प्रजापतेः ॥३॥ यजन्ति यान् देवगणा वैराजा इति विश्रुताः। ये वै ते योगविभ्रष्टाः प्रापुर्लोकान्सनातनान् ॥४॥ किया ॥१५६॥ श्रीराम के पुत्र इक्ष्वाकु वंश वर्न कुश हुए । कुश के पुत्र अतिथि हुए और उनके पुत्र निषध हुए।॥१५७॥। निषध के पुत्र नल हुए और नल के पुत्र नभस् हुए । नभस के पुत्र पुण्डरीक हुए और उनके पुत्र क्षेमधन्वा हुए ॥१५८॥ उनके पुत्र प्रतापी वीर देवानीक हुए । देवानकी के पुत्र अहीनगु हुए । अहीनगु के पुत्र सहस्राश्च हुए ॥१५९॥ उनके पुत्र चन्द्रावलोक हुए उनके पुत्र तारापीड हुए । तारापीड के पुत्र चन्द्रगिरि हुए और उनके पुत्र चन्द्र हुए ॥१६०॥ उनके पुत्र श्रुतायु हुए जो महाभारत युद्ध में मारे गये । उनके वंश में दो नल विख्यात हुए पहला वीरसेन का पुत्र और दूसरा निषधाधिप नल ये सभी सूर्य के वंश में बहुत अधिक दक्षिणा देने वाले राजा हुए ॥१६२॥ इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न होने वाले प्रधान प्रधान राजाओं का वर्णन किया गया ॥१६३॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के सूर्यवंश वर्णन नामक आठवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।८।। ऋ पितृवंश का वर्णन, माया के व्यभिचार के कारण मत्स्ययोनिज सत्यवती का भूलोक में आना, पितृश्राद्ध विधि, अनुपनीततथा विधुरों की साधारण श्राद्धविधि, शूद्र का अमन्त्रक श्राद्ध तथा आभ्युदयिक श्राद्ध का वर्णन भीष्मजी ने कहा-- भगवन् मैं पितरों के वंश को सुनना चाहता हुँ, विशेषत: रवि, श्राद्धदेव और सोम के वंश को सुनना चाहता हूँ । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- अच्छा तो अब मैं तुम्हें पितरों के वंश को बतलाऊंगा । स्वर्ग में रहने वाले पितृगण सात हैं; उनमें तीन अमूर्त हैं ॥२॥ सभी पितरों में चार मूर्तिमान् हैं । वैराज प्रजापति के सन्तान के पितृगण अमूर्त हैं, जिन सबों की पूजा वैराज नामक देवगण करते हैं । जो योगभ्रष्ट होकर सनातन लोकों को प्राप्त
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