Srishti Khanda Extracted Page 95
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-95
Sanskrit Original
टे श्रीपद्ममहापुराण नरिष्यंतस्यपुत्रोभूच्छुको नाम महाबलः । नाभागादंबरीषस्तु धृष्टस्य तु सुतत्रयम् ॥१२६॥ धृष्टकेतुः स्वधर्माथो रणधृष्टश्च वीर्यवान्। आनतों नाम शयतिःसुकन्या चैव दारिका ॥९२७॥ आनर्तस्याभवत्पुत्रो रोचमानः प्रतापवान् । आनतों नाम देशोभून्नगरी च कुशस्थली॥१२८॥ रोचमानस्य रेवोभू्रेवाद्रैवत एव च। ककुझी चापरं नाम ज्येष्ठः पुत्रशतस्य च ॥१२९॥ रेवती तस्य सा कन्या भार्या रामस्य विश्रुता। करूषाच्चैव कारूषा बहवः प्रथिता भुवि ॥१३०॥ पृषध्रो गोवधाच्छूद्रो गुरुशापादजायत। इक्ष्वाकुपुत्रा नाम्नाथ विकुक्षिनिमिदंडकाः ॥१३९॥ श्रेष्ठाः पुत्रशतस्यासन्पंचाशच्चाथ तत्सुताः । मेरोरुत्तरतस्ते तु जाताः पार्थिवसत्तमाः ॥१३२॥ चत्वारिंशत्तथाष्टान्ये शतमध्ये च येऽभवन्। मेरोर्दक्षिणतश्चैव राजानस्ते प्रकीर्तिताः॥१३३॥ ज्येष्ठात्ककुत्स्थनामाभूत्सुतस्तस्य सुयोधनः । तस्य पुत्रः पृथुर्नाम विश्वस्तस्य पृथोः सुतः ॥९३४॥ आर्द्रस्तस्य च पुत्रोभूद्युवनाश्वस्ततो भवत् । युवनाश्वस्य पुत्रोभूच्छावस्तो नाम वीर्यवान् ॥१३५॥ निर्मिता येन शावस्ती ह्यंगदेशे नराधिप। शावस्ताद्वृहदश्वोभूत्कुवलाश्वस्ततोऽ भवत् ॥१३६॥ धुंधुमारत्वमगमद्धंधुं हत्वाऽसुरं पुरा । तस्य पुत्रासत्रयो जाता दृढाश्वोघृणिरेवच ॥१३७॥ कपिलाश्वश्च विख्यातो धौधुमारिः प्रतापवान् । दृढाश्वस्य प्रमोदस्तु हर्यश्वस्तस्य चात्मजः ॥१३८॥ हर्यश्वस्य निकुंभोभूत्संहताश्वस्ततो भवत् । अकृताश्वो रणाश्वश्च संहताश्वसुतावुभौ ॥१३९॥ युवनाश्वोरणाश्वस्य मांधाता च ततोभवत् । मांधातुः पुरुकुत्सोभूद्धर्मसेतुश्च पार्थिवः ॥१४०॥' मुचुकुन्दश्च विख्यातश्शक्रमित्रः प्रतापवान् । पुरुकुत्सस्य पुत्रोभूहुस्सहो नर्मदापतिः ॥१४१॥ बाद सुद्युम्न दिव्य फलों का भोग करने के लिए इलावृत वर्ष में चले गये । ज्येष्ठ भाई इक्ष्वाकु मध्य देश को प्राप्त किए।।१२५॥ नरिष्यन्त के पुत्र महाबलवान् शुक हुए । नाभाग के पुत्र अम्बरीष हुए, धृष्ट के तीन पुत्र हुए ॥१२६॥ धृष्टकेतु, स्वधर्मनिष्ठ तथा पराक्रमी रणधृष्ट । शर्याति के पुत्र का नाम आनर्त था और पुत्री का नाम सुकन्या था । आनर्त के प्रतापी पुत्र रोचमान हुए । उनके देश का नाम आनर्त था और राजधानी उनकी कुशस्थली हुयी ॥१२७-१२८॥ रोचमान के पुत्र रेव हुए और रेव के पुत्र रैवत हुए । रेवत का दूसरा नाम ककुदी भी था । रैवत के सौ पुत्र में सबसे बड़े थे ॥१२९॥ रैवत की पुत्री का नाम रेवती था वह बलरामजी की पत्नी हुयी । करुष के बहुत पुत्र थे जो संसार में कारूष के नाम से विख्यात हुए ॥१३०॥ गौ का वध करने के कारण पृषध्र वसिष्ठ के शाप से शूद्र हो गये । इक्ष्वाकु के तीन पुत्रश्रेष्ठ थे विकुक्षि, निमि और दण्डक ॥१३१॥ ये तीनों इक्ष्वाकु के सौ पुत्रों में श्रेष्ठ थे और उन सौ में से पचास पुत्र जो थे वे सब सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में राजा हुए ॥१३२॥ सौ में से जो दूसरे अड़तालिस थे वे सुमेरु की दक्षिण दिशा के राजा हुए ॥१३३॥ इक्ष्वाकु के ज्येष्ठ पुत्र के पुत्र ककुत्स्थ हुए । ककुत्स्थ के पुत्र सुयोधन हुए । सुयोधन के पुत्र पृथु हुए । पृथु के पुत्र विश्व हुए ॥१३४॥ विश्व के पुत्र आर्द्र हुए । आर्द्र के पुत्र युवनाश्व हुए । युवनाश्च के प्रतापी पुत्र शावस्त हुए ॥१३५॥ हे नराधिप ! उन्होंने अङ्ग देश में शावस्ती नाम की नगरी को बसाया । शावस्त के पुत्र बृहदश्व हुए और उनके पुत्र कुवलाश्व हुए ॥१३६॥ कुवलाश्व धुन्धु नामक दैत्य को मारकर धुन्धुमार के नाम से प्रख्यात हुए । धुन्धुमार के तीन प्रख्यात पुत्र हुए, दृढाश्व, धृणि ॥१३७॥ तथा विख्यात कपिलाश्व । कपिलाश्च धुन्धुमार के प्रतापी पुत्र थे । दृढाश्व के पुत्र प्रमोद हुए और उनके पुत्र हर्यश्च हुए॥१३८॥ हर्यश्व के पुत्र निकुंभ और उनके पुत्र संहताश्व हुए । संहताश्च के दो पुत्र हुए अकृताश्व तथा रणाश्व।।१३९॥ रणाश्व के पुत्र युवनाश्व हुए और युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए । मान्धाता के तीन पुत्र थे पुरुकुत्स, धर्मसेतु ॥१४०॥
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