Srishti Khanda Extracted Page 94
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-94
Sanskrit Original
किमेतदित्यभूच्चित्रं वद योगविदांवर। वसिष्ठो ब्रवीत्सर्व दृष्ट्वा तं ध्यानचक्षुषा ॥१११९॥ समयः शंभुदयिताकृतःशरवणे पुरा । यः पुमान्प्रविशेच्चात्र स नारीत्वमवाप्स्यति ॥१९२॥ अयमश्चोषि नारीत्वमगाद्राज्ञा सहैव तु। इलः पुरुषतामेति यथासौ धनदोपमः ॥११३॥ तथैव यत्न: कर्त्तव्य आराध्य च पिनाकिनम् । ततस्ते मानवा जग्मुर्यत्र देवो महेश्वरः ॥१९४॥ ु ष्टवुर्विविधैः स्तोत्रैः पार्वतीपरमेश्वरौ। तावूचतुरलं चैष समयः किंनु सांप्रतम् ॥११५॥ इक्ष्वाकोरश्चरमेधेन यत्फलंस्यात्तदावयोः । दत्वा किंपुरुषो वीरः स भविष्यत्यसंशयम् ॥९९६॥ तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे जग्मुर्वैवस्वतात्मजाः । इष्ट्वाश्वमेधेन तत इलाकिंपुरुषो भवत्॥९९७॥ मासमेकंपुमान् वीरः स्त्रीवं मासमभूत् पुनः । बुधस्य भवने तिष्ठन्निलो गर्भधरो भवत् ॥११८॥ अजीजनत्पुत्रमेकमनेक गुणसंयुतम् । बुध उत्पाद्य तं पूरु सस्वर्गमगमत्पुनः ॥११९॥ इलस्य नाम्ना तद्वर्षमिलावृतमभूत्तदा । सोमार्कवंशजो राजा इलोभूद्रंशवर्द्नः ॥९२०॥ एवं पुरूरवाः पूरोरभवद्वंशवर्द्वनः । इक्ष्वाकुरर्कवंशस्य तथैवोक्तो नरेश्वरः ॥१२१॥ इलः किंपुरुषत्वे चसुद्युप्न इति चोच्यते । पुनः पुत्रत्रयमभूत्सूद्युप्नस्यापराजितम् ॥९१२२॥ उत्कलोऽथ गयस्तद्दद्धरिताश्वश्च वीर्यवान् । उत्कलस्योत्कला नाम गयस्य तु गया पुरी ॥९२३॥ हरिताश्वस्य दिग्याम्या संज्ञाता कुरुभिः सह । प्रतिष्ठानेभिषिच्याथ सपुरूरवसं सुतम् ॥१२४॥ जगामेलावृतं भोक्तुं दिव्यं वर्षफलाशनः । इक्ष्वाकुर्ज्येष्ठदायादो मध्यदेशमवाप्तवान्॥९२५॥ का चन्द्रप्रभा नामक अश्व है ॥१०९॥ यह किस कारण से घोड़ी हो गया इसके बाद उन सबों ने अपने पुरोहित वसिष्ठ से इसके विषय में पूछा ॥११०॥ हे योगियों में श्रेष्ठ ! यह बतलाइयें कि यह आश्चर्य कैसे हुआ ? महर्षि वसिष्ठ भी अपने ध्यानमय नेत्र से देखकर सारी बात बतला दिए ॥१११॥ उन्होंने कहा-- कि प्राचीन काल में पार्वतीजी को प्रसन्न करने के लिए शङ्करजी ने शरवण के विषय में यह प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई भी पुरुष इस वन में प्रवेश करेगा वह नारी हो जायेगा ॥११२॥ यह अश्व भी राजा के ही साथ नारित्व को प्राप्त कर लिया । इल जिस तरह से पुरुषत्व को प्राप्त कर सकें वैसा आप लोग उपाय करें । आप लोग भगवान् शङ्कर की आराधना करें । उसके बाद वे सभी मनु पुत्र वहाँ गये जहाँ भगवान् शङ्कर थे ॥११३-११४॥ उन सबों ने पार्वती तथा शङ्करजी की अनेक स्तोत्रों से स्तुति की । उन दोनों ने कहा कि प्रतिज्ञा के कारण क्या किया जा सकता है ?॥११५॥ इक्ष्वाकु आदि अश्वमेध यज्ञ करके उसका फल हम दोनों को समर्पित कर दें तो इला किन्नरत्व को प्राप्त कर लेगी ॥११६॥ ठीक है ऐसा ही होगा; यह कहकर वे वैवस्वत मनु के पुत्र लौट आये । उन लोगों ने अश्वमेध यज्ञ किया, उसके फलस्वरूप इला किम् पुरुष (किन्नर) हो गयी ॥११७॥ अब इल एक मास पुरुष रहते थे और एक मास स्री । जब इल बुध के घर में रहते थे तो उस समय उन्होंने गर्भधारण किया ॥११८॥ उसने अनेक गुणों से सम्पन्न एक पुत्र को जन्म दिया। बुध उस पुरु को उत्पन्न करके स्वर्ग चले गये ॥११९॥ वह वर्ष इल के नाम से इलावर्त वर्ष हो गया । वहाँ का राजा सूर्य तथा चन्द्र वंश का हुआ ॥१२०॥ इस तरह पुरुरवा पुरु के वंश को बढाने वाले हुए । इक्ष्वाकु सूर्यवंश के राजा हुए, यह मैं पहले कह चुका हूँ ॥१२१॥ जब इल किमपुरुष थे उस समय वे सुद्युम्न भी कहलाते थे । उसके बाद सुद्युम्न के कभी नहीं पराजित होने वाले तीन पुत्र हुए ॥१२२॥ उनके नाम उत्कल, गय तथा हरिताश्च थे । उत्कल की पुरी का नाम उत्कला (उड़ीसा) था, गय की राजाधानी गया हुयी और हरिताश्च कुरुक्षेत्र से लेकर दक्षिण दिशा के राजा हुए । उन्होंने (सुद्युम्न) पुरुरवा को प्रतिष्ठान पुरी का राजा बनाया ॥१२३-१२४॥ उसके
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know