Srishti Khanda Extracted Page 93
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-93
Sanskrit Original
a ६८ श्रीपद्ममहापुराण बिशिष्टाकारवान्मुंडी सकमंडलुपुस्तकः । वेणुदंडकृतावेश: पवित्रकखनित्रकः ॥९५॥ द्विजरूपः शिखी ब्रह्मनिगदन् कर्णकुंडली। वटुभिश्चार्थिभिर्युक्तः समित्पुष्पकुशोदकैः ॥९६॥ कालेन्विष्यंस्ततस्तस्मिन्नाजुहाव स तामिलाम् । बहिर्वनस्यांतरितः किल पादपमंडपे॥९७॥ स संभ्रममकस्माच्च सोपालंभमिवाभवत् । त्यक्तृवाग्निहोत्रशुश्रुषां क्व गता मंदिरान्मम ॥९८॥ इयं विहारबेला ते अतिक्रामति सांप्रतम् । एह्योहि पृथुसुश्रोणि संभ्रांता केन हेतुना ॥९९॥ इयं सायंतनी वेला विहारस्येह वर्त्तते । कृत्वोपलेपनं पुष्पैरलंकुरु गृहं मम ॥१००॥ साब्रवीद्विस्मृताहं च सर्वमेव तपोधन । आत्मानं त्वां च भत्तारं कुलं च वदमेनघ ॥१०१॥ बुधः प्रोवाच तां तन्वीमिला त्वं वरवर्णिनि। अहं च कामुको नाम बहुविद्यो बुधः स्मृतः ॥१० २॥ तेजस्विनः कुले जातः पिता मे ब्राह्मणाधिपः । इति सा तस्य वचनात्प्रविष्टा बुध मंदिरम् ॥१० ३॥ रत्नस्तंभसमाकीर्ण दिव्यमायाविनिर्मितम् । इलाकृतार्थमात्मानं मेने तद्भवनेस्थिता ॥१०४॥ अहो वृत्तमहोरूपमहोधनमहोकुलम् । मम चास्य च भर्त्तुर्ग अहो लावण्यमुत्तमम् ॥१०५॥ रेमे च सा तेन सममतिकालमिला वने । सर्वभोगमये गेहे यथेंद्रभवने तथा ॥१०६॥ अथान्विष्यंतो राजानं भ्रातरस्तस्य मानवाः । इक्ष्वाकुप्रमुखा जग्मुस्तदाशरवणांतिकम् ॥१०७॥ ततस्ते ददृशुः सर्वे बडवामग्रतःस्थिताम् । रत्रपर्यतकिरणदीपमानामनुत्तमाम् ॥१०८॥ संप्राप्य प्रत्यभिज्ञानात्सर्वे विस्मयमागताः । अयं चंद्रप्रभो नाम वाजी तस्य महात्मनः ॥१०९॥ अगमद्बडवारूपमुत्तमं केन हेतुना । ततस्तु मैत्रावरुणिं पप्रछुः स्वपुरोहितम् ॥११०॥ उन्होंने कमण्डलु तथा पुस्तक धारण किए हुए विशिष्ट आकार वाले मुण्डी का रूप बनाया । वे दण्ड, पवित्रक तथा खनती धारण किये थे ॥९५॥ ब्राह्मण शिखाधारी ब्रह्मचारी होकर वेदपाठ करते हुए कानों में कुण्डल धारण किए हुए, ब्रह्मचारियों के साथ समिधा, कुश तथा जल प्राप्त करने के लिए ॥९६॥ समयानुसार उस इला को खोजकर उससे वन के बाहर वृक्ष मण्डप में छिपकर ॥९७॥ शीघ्रता से उपालम्भ पूर्वक कहने लगे-- अरे अग्निहोत्र की सेवा को त्याग कर तुम मेरे घर से कहाँ चली गयी ? ॥९८॥ अरे ! यह तुम्हारे बिहार करने की बेला बीत रही है । अरे सुन्दर श्रोणी-प्रदेश वाली आओ-आओ तुम भूल कैसे गयी हो ॥९९॥ यह तुम्हारे विहार करने की सायंकाल की बेला है । मेरे घर को लिप कर तुम उसे पुष्पों से सजा दो ॥१००॥ इला ने कहा-- हे तपोधन ! मैं सब कुछ भूल गयी हुँ । हे अनघ ! अपने को तथा आप पति देव को भी मैं भूल गयी हूँ । आप बतलायें की मेरा वंश कौन :2॥॥१०१॥ बुध ने कहा-- हे सुन्दरी ! तुम्हारा नाम इला है । मैं तेरा कामुक हूँ । अनेक विद्याओं के ज्ञाता मेरा नाम बुध है ॥१०२॥ मेरा जन्म तेजस्वी वंश में हुआ है । मेरे पिता ब्राह्मणों के स्वामी सोम हैं । इस तरह से बुध की वाणी को सुनकर इला बुध के गृह में चली गयी ॥१०३॥ वह गृह रत्नों के स्तम्भों से परिपूर्ण तथा दिव्य माया से विनिर्मित था । उस गृह में रहती हुयी इला अपने को कृत-कृत्य मानने लगी ॥१०४॥ मेरा तथा मेरे इस पति का वृत्त (आचरण) रूप, धन, वंश तथा उत्तम लावण्य प्रशंसनीय है ॥१०५॥ वह इला उस बुध के साथ उस वन में बहुत समय तक रमण करती रही । वह भवन इन्द्र के भवन के समान सभी भोग की सामग्रियों से सम्पन्न था॥१०६॥ मनु के पुत्र तथा इल के भाई राजा इल का अन्वेषण करते हुए इक्ष्वाकु इत्यादि शरवण वन के सन्निकट गये ॥१०७॥। उसके बाद उन सबों ने अपने सामने खड़ी घोड़ी को देखा चारो ओर लगे रत्नों से वह देदीप्यमान उत्तम घोड़ी थी ।।१०८॥ उसको पहचान कर वे सब आश्चर्य चकित हो गये । वे जान गये कि यह तो महाराज इल
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