Srishti Khanda Extracted Page 91

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-91

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

दैत्यदानवसंहर्त सहस्त्रकिरणात्मकम्। रूपं चाप्रतिमं चक्रे त्वष्टा पद्मामृते महत् ॥६५॥ न शशाक च तदद्वष्ट पादरूपं रवेः पुनः । अद्यापि च ततः पादौ न कश्चित्कारयेत्क्वचित् ॥६६॥ यःकरोति स पापिष्ठो गतिमाप्रोति निदितम्। कुष्ठरोगमवाप्रोति लोकेस्मिन्दुः खसंज्ञितम् ॥६ ७॥ तस्मान्नधर्मकमार्थी चित्रेष्वायतनेषु च। न क्वचित्कारयेत्पादौ देवदेवस्य धीमतः ॥६८॥ ततः स भगवान् गत्वा भूर्लोकममराधिपः। कामयामास कामार्तो मुख एव दिवाकरः ॥६९॥ अश्वरूपेण महता तेजसा च समन्वितः । संज्ञा च मनसा क्षोभमगमद्भयविह्ृला॥७०॥ नासापुटाभ्यामुत्सृष्टं परोयमिति शंकया । तस्याथ रेतसो जातावश्विनाविति नः श्रुतम् ॥७९॥ दस्रौ श्रुतित्वात्संजातौ नासत्यो नासिकाग्रतः । ज्ञात्वा चिराच्चतं देवं सतोषमगमत्परम् ॥७ २॥ विमानेनागमत्स्वर्गे पत्न्या सह मुदान्वितः । सावण्योंपि मनुर्मेरावद्यापि तपते तपः ॥७३॥ शनिस्तपोबलाच्चापि ग्रहाणां समतां गतः। यमुना तपती चैव पुनर्नद्यौ बभूवतुः ॥७४॥ विष्ठिर्घोरात्मिका तद्दतकालत्वेन व्यवस्थिता। मनोवैंवस्वतस्यापि दश पुत्रा महाबलाः ॥७५॥ इलस्तुप्रथमस्तेषां पुत्रष्ट्या समकल्पितः । इक्ष्वाकुः कुशनाभश्च अरिष्टो धृष्ट एव च ॥७६॥ नरिष्यंतः करूषश्च शर्यातिश्च महाबलः । पृषध्रश्चाथ नाभागः सर्वे ते दिव्यमानुषाः ॥७७॥ अभिषिच्य मनुः पूर्वमिलंपुत्रं सधार्मिकम् । जगाम तपसे भूयः पुष्करं स तपोवनम् ॥७८॥ अथाजगाम सिध्यर्थं तस्य ब्रह्मा वरप्रदः । वरं वरय भद्रं ते मानवेय यथेप्सितम्॥७९॥ और उस तेज से विश्वकर्मा ने विष्णु के चक्र का, शङ्कर के त्रिशूल का तथा इन्द्र के वज्र का निर्माण किया ॥६४॥ त्वष्टा ने सूर्य के पैरों से रहित रूप को अप्रतिम बना दिया जो हजारों किरणमय दैत्यों और दानवों का संहार करने वाला था ॥६५॥ फिर कोई सूर्य के चरण के रूप को नहीं देख सका इसीलिए कोई भी तथा कहीं सूर्य के चरणों को न बनाये ॥६६॥ जो सूर्य को पैरो से युक्त बनाता है वह अत्यन्त पापमयी निंदित गति को प्राप्त करता है । वह इस लोक में दुःखप्रद कुष्ठ रोग का रोगी होता है ॥६७॥ अतएव धर्म और काम को चाहने वाले को चाहिए कि वह चित्रों तथा घरों में बुद्धिमान सूर्य के चरणों को नहीं बनवाये ॥६८॥ उसके बाद देवताओं के स्वामी सूर्य भूलोक में जाकर कामार्त होकर सुख पर ही संज्ञा को प्राप्त करना चाहे ॥६९॥ वे उस समय अत्यधिक तेजस्वी घोड़े का रूप बनाये थे उनको देखकर भय से विह्वल बनी हुयी संज्ञा भी क्षुब्ध हो गयी ॥७०॥ यह कोई सूर्य से भिन्न है क्या ? इस शङ्का से संज्ञा ने सूर्य के वीर्य को अपनी नाकों से त्याग दिया, उसी से दोनों अश्विनीकुमारों का जन्म हुआ ऐसा मैने सुना है ॥७१॥ वे दोनों कान से उत्पन्न होने कारण दस्र कहलाये तथा नासिका के अग्रभाग से उत्पन्न होने के कारण नासत्य कहलाये । दीर्घ काल के बाद जब इस बात का पता चला कि ये भगवान् सूर्य ही हैं तो संज्ञा को अत्यन्त सन्तोष हुआ ॥७२॥ इसके बाद भगवान् सूर्य विमान से अपनी पत्नी के साथ स्वर्गलोक आये । सावर्णि मनु भी आज भी सुमेरु पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं ॥७३॥ छाया के पुत्र शनि भी अपनी तपस्या के बल से ग्रहों के समान हो गये । यमुना तथा तपती ये दोनों नदी हो गयीं ॥७४॥ विष्टि का रूप भयङ्कर था अतएव वह काल रूप से व्यवस्थित हो गयी । वैवस्वत मनु के भी महाबलवान दश पुत्र हुए ॥७५॥ उन सबों में बड़े इल थे । वे पुत्रेष्टि याग से पैदा हुए थे, इक्ष्वाकु, कुशनाभ, अरिष्ट, धृष्ट ।।७६॥ नरिष्यन्त, करूष, महाबलवान् शर्याति, पृषध्र तथा नाभाग ये सभी मनु पुत्र दिव्य मनुष्य थे ॥७७॥ मनु अपने बड़े पुत्र इल को राज्याभिषिक्त करके पुष्कर के तपोवन में तपस्या करने के लिए चले गये ॥७८॥ उसके बाद ब्रह्माजी उन्हें वर प्रदान करने के लिए आये । उन्होंने कहा

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know