Srishti Khanda Extracted Page 90
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-90
Sanskrit Original
बालभावान्मया किचिउुद्यतश्चरणः सकृत् । मनुना वार्यमाणापि मम शापमदाद्विभो ॥४९॥ प्रायो न माता सास्माकमसमा स्नेहतो यतः । देवोप्याह यमं भूयः किं करोमि महामते ॥५०॥ सौख्यात्कस्य न दुःखं स्यादथवा कर्मसंततिः। अनिवार्या भवस्यापि का कथान्येषु जंतुषु ॥५१॥ कृकवाकुस्तव पदे सक्रिमिं भक्षयिष्यति । खंजं च रुचिरं चैव पादमेतद्भविष्यति ॥५२॥ एवमुक्तः समाश्चस्तस्तपस्तीब्रं चकार ह । वैराग्यात्पुष्करे तीर्थे फलफेनानिलाशनः ॥५३॥ पितामहं समाराध्य यावद्वर्षायुतं पुनः । तपः प्रभावाद्देवेशः संतुष्टः पढ्मसंभवः॥५४॥ बब्रे सलोकपालत्वं पितृलोकं तथाक्षयम् । धर्माधर्मात्मकस्यास्य जगतस्तु परीक्षणम् ॥५५॥ एवं सलोकपालत्वमगमत्पद्यसंभवात् । पितृणामधिपत्यं च धर्माधर्मस्य चानघ॥५६॥ विवस्वानथ तज्ज्ञात्वा संज्ञायाः कर्मचेष्टितम् । त्वष्टुःसमीपमगमदाचचक्षे सरोषवान् ॥५७॥ तमुवाच ततस्त्वष्टा सांत्वपूर्वमिदं वचः। तवासहंती भगवंस्तेजस्तीब्रं तमोनुद् ॥५८॥ बडवारूपमास्थाय मत्सकाशमिहागता । निवारिता मया सा च त्वद्धयेन दिवस्पते॥५९॥ यस्मादविज्ञातमना मत्सकाशमिहागता । तस्मान्मदीयं भवनं प्रवेष्टुं न तवार्हति ॥६०॥ एवमुक्ता जगामाशु मरुदेशमनिंदिता । बडवारूपमास्थाय भूतले संप्रतिष्ठिता ॥६९॥ तस्मात्मसादं कुरु मे यद्यनुग्रहभागहम् । अपनेष्यामि ते तेजःकृत्वा यंत्रे दिवाकरम् ॥६२॥ रूपं तव करिष्यामि लोकानंदकरं प्रभो। तथेत्युक्तः स रविणा भ्रमे कृत्वा दिवाकरम् ॥६३॥ परथक्चकार तेजश्च चक्रं विष्णोः प्रकल्पयत् । त्रिशूलं चापि रुद्रस्य वञ्रमिंद्रस्य चापरम्॥६ ४॥ है । लड़कपन के कारण मैंने एक बार अपना पैर कुछ उठाया, यद्यपि सावर्णि मनु ने रोका भी तो भी माँ ने मुझे शाप दे दिया ॥४८-४९॥ प्रायः माँ हमलोगों को एक समान स्नेह नहीं करती है, इस पर सूर्य ने कहा हे महामते! मैं क्या करूँ 2॥५०॥ सुख के बाद किसको दुःख नहीं मिलता है ?। यह तो कर्मो का फल है । इसे तो भगवान् शङ्कर को भी सहना पड़ता है दूसरे जीवों को कौन कहे ?॥५१॥ तुम्हारे पैरों के क्रिमी को कृकवाकु खा जायेगा । तुम्हारा यह पैर लङ्गडा तथा मनोहर हो जायेगा ॥५२॥ इस तरह से सूर्य द्वारा कहे जाने पर आश्वस्त होकर वैराग्य युक्त यम पुष्कर तीर्थ में आकर तीव्र तपस्या; फल, फेन तथा वायु खाकर किए ॥५३॥ उन्होंने दश हजार वर्ष तक ब्रह्माजी की आराधना की उससे ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये ॥५४॥ यम ने पितृलोक के अक्षय लोकपालत्वका तथा इस धर्माधर्मात्क जगत् के परीक्षण का वरदान माँगा ॥५५॥ हे अनघ ! इस प्रकार से यम ने ब्रह्माजी से लोकपालत्व पितरों का आधिपत्य तथा धर्म एवं अधर्म के परीक्षण का अधिकार प्राप्त किया ॥५६॥ उसके बाद सूर्य ने संज्ञा की चेष्टा को जाना तो वे त्वष्टा के पास जाकर क्रोध पूर्वक सारी बातें बतलायें ॥५७॥। त्वष्टा ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा-- हे अन्धकार को दूर करने वाले भगवन् सूर्य ! आपके तीब्र तेज को नहीं सह सकने के कारण ॥५८॥ वह घोड़ी का रूप बनाकर मेरे पास आयी आपके भय से मैंने उसे ऐसा करने से रोका भी ॥५९॥ मैंने कहा-- चूकि अविज्ञात मना होकर मेरे यहाँ आयी हो अतएव तुम मेरे घर में प्रवेश नहीं कर सकती हो ॥६०॥ मेरे द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर वह शीघ्र ही मरु प्रदेश में चली गयी और वह घोड़ी का रूप धारण करके भूतल पर स्थित है ॥६१॥ अतएव यदि मैं आपकी कृपा का पात्र होऊं तो आप मेरे ऊपर कृपा करें । आपको शाणयन्त्र चर चढ़ाकर मैं आपके तेज को कम कर दूँगा ॥६२॥ हे प्रभो ! मैं आपका रूप लोक को आनन्द प्रदान करने वाला बना दूँगा सूर्य के द्वारा तथास्तु कहे जाने पर सूर्य को भ्रमि यन्त्र (शाण) पर चढ़ाकर ॥६३॥ त्वष्टा सूर्य के तेज को छाँट दिया
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