Srishti Khanda Extracted Page 89
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-89
Sanskrit Original
दुहितृत्वं गता यस्मात्पृथोः पृथ्वी महामते। तस्यानुसारयोगाच्च पृथ्वी विश्रुता बुधै: ॥३५॥ भीष्म उवाच आदित्यवंशमखिलं वद ब्रह्मन्यथाक्रमम् । सोमवंश च तत्त्वज्ञ यथावद्क्तुमर्हसि ॥३६॥ पुलस्त्य उवाच विवस्वान् कश्यपात्पूर्वमदित्यामभवत्पुरा। तस्य पत्नी त्रयं तद्वत्संज्ञा राज्ञी प्रभा तथा ॥३७॥ रैवतस्य सुता राज्ञी रेवतं सुषुवे सुतम्। प्रभा प्रभातं सुषुवे त्वाष्ट्रं संज्ञां तथा मनुम् ॥३८॥ यमश्च यमुना चैव यमलौ च बभूवतुः । ततस्तेजोमयं रूपमसहंती विवस्वतः॥३९॥ नारीमुत्पादयामास स्वशरीराद निंदिताम्। त्वाष्ट्री स्वरूपरूपेण नाम्ना छायेति भामिनी॥४०॥ किं करोमीति पुरतः संस्थितां तामभाषत । छाये त्वं भज भर्तारं मदीयं तं वरानने ॥४१॥ अपत्यानि मदीयानि मातृस्नेहेन पालय। तथेत्युक्तवा च सा देवमगात्कामाय सुव्रता ॥४२॥ कामयामास देवोऽपि संज्ञेयमिति चादरात्। जनयामास सावणिमनुं मनुस्वरूपिणम् ॥४३॥ सवर्णत्वाच्च सावर्णेर्मनोवैवस्वतस्य तु । ततः सुतां च तपतीं त्वाष्ट्री चैव क्रमेण तु॥४४॥ छायायां जनयामास संज्ञेयमिति भास्करः । छायास्वपुत्रेत्वधिकं स्नेहं चक्रे मनौ तदा ॥४५॥ नच क्षमे मनुः पूर्वस्तद्यमः क्रोधमूर्छितः । संतर्जयामास तदा पादमुत्क्षिप्य दक्षिणम् ॥४६॥ शशाप च यमं छाया भवतु क्रिमिसंयुतः । पादोऽयमेको भविता पूयशोणितविस्रवः ॥४७॥ निवेदयामास पितुर्यमः शापेन धर्षितः । निःकारणमहं शप्तो भात्रा देव सकोपया ॥४८॥ किया। सभी यज्ञों तथा सभी श्राद्धों के अवसर पर यह प्रसङ्ग सुनाने योग्य है ॥३४॥ चूकि पृथ्वी पृथु की पुत्री हुयी इसीलिए विद्वज्जन इसे पृथ्वी कहते हैं ॥३५॥ भीष्मजी ने कहा-- हे त्राह्मन् ! आप मुझे क्रमश: आदित्य (सूर्य) वंश का वर्णन सुनायें । तत्त्वज्ञ आप मुझे सोमवंश को भी यथोचित प्रकार से सुनायें ॥३६।। पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- अदिति के गर्भ से कश्यप महर्षि के पुत्र विवस्वान् (सूर्य) हुए । सूर्य की तीन पत्मियाँ थी, संज्ञा, राज्ञी तथा प्रभा ॥३७॥। रेवत की पुत्री राज्ञी थी । उसने रेवत नामक पुत्र को जन्म दिया । प्रभा ने प्रभात को उत्पन्न किया तथा संज्ञा ने त्वष्टा एवं मनु को जन्म दिया ॥३८॥ यम और यमुना दोनों सूर्य के जुडवी सन्तान थे । उसके बाद सूर्य के तेजोमय रूप को नहीं सह सकने के कारण संज्ञा ने अपने शरीर से अपने ही समान सुन्दरी नारी को उत्पन्न किया । उसका रूप संज्ञा के ही समान था । उसका नाम छाया हुआ ॥४०॥ जब उसने संज्ञा के सामने खड़ी होकर कहा कि में आपकी कौन सी सेवा करूँ तो संज्ञा ने कहा-- छाये ! तुम मेरे पति की पत्नी बन जाओ ॥४१॥ मेरे बच्चों को तुम माँ के ही समान स्नेहपूर्वक पालना । छाया ने कहा ठीक है । और सुन्दर व्रत वाली वह कामिनी होकर सूर्य के पास गयी ॥४२॥ सूर्य ने उसको संज्ञा ही समझकर उसका आदर किया । उसने मनु के ही समान मनु को उत्पन्न किया ॥४३॥ मनु का वर्ण वैवस्वत मनु के ही समन होने के कारण उस मनु का नाम सावर्णि मनु हुआ । उसके बाद छाया के गर्भ से तपती तथा त्वाष्ट्री नाम की कन्याये उत्पन्न हुयीं । सूर्य ने छाया को संज्ञा जानकर उन सन्तानों को उत्पन्न किया । छाया अपने पुत्र सावणि मनु को अधिक स्नेह करती थी । उसके बाद क्रोधित होकर यम ने कहा कि मैं इसको नहीं बर्दास्त कर सकता हूँ । यम ने अपना दाहिना पैर उठाकर धमकाया ॥४६॥ यह देखकर छाया ने शाप दिया कि तुम्हारे इस पैर में कीड़े पड़ जायँ । इससे पीव बहने लग जायेगा ॥४७॥ उस शाप के कारण भयभीत यम ने उसे अपने पिता सूर्य को बतलाया कि हे देव ! बिना किसी कारण के माँ ने मुझे क्रोध करके शाप दे दिया
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