Srishti Khanda Extracted Page 88

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-88

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

पात्रेमायामभूद्दत्सः प्रह्मादि स्तुविरोचनः । दोग्धा त्रिमूर्द्धा तत्रासीन्माया येन प्रवर्तिता ॥२१॥ यक्षैश्च वसुधा दुग्धा पुरांतर्दानमीप्सुभि: । कृत्वा विश्वावसुं वत्सं मणिमंतं महीपते॥२२॥ प्रेररक्षोगणैर्दुग्धा वसा रुधिरमुल्वणम् । रौप्यनाभोऽ भवद्दोग्धा सुमाली वत्स एव च ॥२३॥ गंधर्वैश्च पुनर्दुग्धा वसुधा साप्सरोगणैः । वत्सं चित्ररथं कृत्वा गधंपदादले तथा ॥२४॥ दोग्धा वसुरुचिर्नामाथर्ववेदस्यपारगः । गिरिभिर्वसुधादुग्था रत्नानि विविधानि च॥२५॥ औषधानि च दिव्यानि दोग्धा मेरुर्महीधरः। वत्सोभूद्धिमवांस्तत्र पात्रं शैलमयं पुनः॥२६॥ वृक्षेश्र वसुधा दुग्धा क्षीरं छिन्नप्ररोहणम् । पलाशपात्रे दोग्धा तु सालः पुष्पवनाकुलः ॥२७॥ प्लक्षोभवत्ततो वत्सः सर्ववृक्षवनाधिपः । एवमन्यैश्च वसुधा तथादुग्धा यथेच्छतः ॥२८॥ आयुर्धनानि सौख्यं च पृथौ राज्यं प्रशासति। न दारिद्रय तथारोगी नाधनो न च पापकृत्॥२९॥ नोपसर्गा न चाघातः पृथौ राज्यं प्रशासति। नित्यं प्रमुदिता लोका दुःखशोकविवर्जिताः ।!३ ०॥ घनुःकोट्या च शैलेद्रानुत्सार्य स॒ महाबल: । भूमंडलं समं चक्रे लोकानां हितकाम्यया॥३ १॥ न पुरग्रामदुर्गाणि नचायुधधरा नराः । म्रियंते यत्र दुःखं च नार्थशास्त्रस्य चादरः॥३२॥ घर्मैकतानाः पुरुषाः पृथौ राज्यं प्रशासति । कथितानि च पात्राणि यत्क्षीर च यथा तव॥३३॥ येषां येन रुचिस्तत्र तेभ्यो दत्तंविजानता। यज्ञश्रद्धेषु सर्वेषु मया तुभ्यं निवेदितम् ॥३४॥ दुग्ध का दोहन किया । उस समय यम ही बछड़ा बने और अंतक दोग्धा बने । नागों ने बिल रूपी पात्र में पृथिवी का दोहन किया, उसमें तक्षक ही बछड़ा बना ॥१८-१९॥ धृतराष्ट्र नामक दोग्धा ने विष रूपी दुग्ध को दूहा । असुरों ने लौह पात्र में शत्रुओं को दुःख देना तथा माया का दोहन किया । उस समय प्रह्लाद के पुत्र विरोचन बछड़ा बने । उसमें दोग्धा त्रिमूर्धा थे उन्होंने माया का प्रवर्तन किया ॥२०-२१॥ अन्तर्धान रहने के इच्छुक यक्षों ने विश्वावसु को बछड़ा तथा मणिमान को दोग्धा बनाकर अन्तर्धान विद्या का पृथिवी से दोहन किया ॥२२॥ प्रेतों तथा ाक्षसों ने रौप्यनाभ को दोग्धा तथा सुमाली को बछड़ा बनाकर पृथिवी से वसा तथा रुधिर (रक्त) रूपी दुग्ध को दूहा॥२३॥ गन्धर्वो तथा अप्सराओं के समूह ने कमल दल के पात्र में चित्ररथ को बछड़ा बनाकर गन्थों का दोहन किया ॥२४॥ उसमें अथर्ववेद के ज्ञाता वसुरुचि ही दोग्धा थे । पर्वतों ने पृथिवी से पर्वतमय पात्र में अनेक प्रकार के रत्नों ॥२५॥ तथा दिव्य औषधियों का दोहन किया । उसमें दोहनकर्ता सुमेरु पर्वत तथा बछड़ा हिगालय को उन सबों ने बनाया ॥२६॥ वृक्षों ने पृथिवी पर कट जाने पर भी प्ररोह रूपी दुग्ध का दोहन, पुष्प तथा वन से परिपूर्ण साल वृक्ष को दोग्धा बनाकर पलाश पात्र में किया ॥२७॥ उस समय सभी वृक्षों तथा वनो के स्वामी प्लक्ष (पाकड़) बछड़ा बना । इसी तरह से दूसरों ने भी अपनी इच्छा के अनुसार पृथिवी का दोहन किया ॥२८॥ राजा पृथु के राज्य काल में सबलोग आयु, धन तथा सौख्य से युक्त थे । कोई भी रोगी, दरिद्र, निर्धन अथवा पापी नहीं था ॥२९॥ पृथु के प्रशासन काल में न तो कोई उपद्रव था और न कोई मरता था । लोग दुःख एवं शोक से रहित होकर सदा प्रसन्न रहते थे ॥३०॥ महाबलवान् पृथु अपने धनुष की नोक से पर्वतों को उखाड़कर लोगों का कल्याण करने की इच्छा से भूमण्डल को समतल बना दिया ॥३१॥ उस समय नगर, ग्राम तथा किले की आवश्यकता नहीं थी । उस समय न तो कोई आयुध धारण करता था और न तो किसीको मृत्यु का दुःख होता था । कोई भी अर्थशास्र का आदर नहीं करता था ॥३२॥ पृथु के प्रशासन काल में सभी लोग धार्मिक थे ।तुम्हें मैने यह बतलाया है कि दोग्धाओं के पात्र कौन थे और उन लोगों ने किस दुग्ध को दूहा ॥३३॥ जिन लोगों को जिसमें रुचि थी उसे पृथ्वी ने वही प्रदान

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know