Srishti Khanda Extracted Page 87
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-87
Sanskrit Original
अनुनीतोपि न ददावशुद्धात्माऽ भयं ततः । शापेन मारयित्वैनमराजक भयार्दिताः ॥६॥ ममंथुर्ब्राह्मणास्तस्य बलाद्देहमकल्मषाः । तत्कायान्मथ्यमानात्तु जनिता म्लेच्छजातयः॥७॥ शरीरे मातुरंशेन कृष्णांजनसमप्रभाः । पितुरंशस्यसंगेन धार्मिको धर्मकारकः ॥८॥ उत्पन्नो दक्षिणाद्धस्तात्सथनुः स शरोगदी । दिव्यतेजोमयः पुत्रस्सरत्नकवचांगदः ॥९॥ पृथुरेवाभवन्नाम्ना स च विष्णुरजायत । स विप्रैरभिषिक्तः संस्तपः कृत्वासुदुष्करम् ॥१०॥ विष्णोर्वरेण सर्वस्य प्रभुत्वमगमत्प्रभुः । निःस्वाध्यायवषद्कारं निर्द्धर्म वीक्ष्य भूतलम्॥१९॥ वेद्धमेवोद्यतः कोपाच्छरेणामितविक्रमः । ततो गोरूपमास्थाय भूःपलायितुमुद्यता ॥९२॥ पृष्ठेत्वन्वगमत्तस्याः पृथु सेषुशरासनः । ततः स्थित्वैकदेशे तु किंकरोमीति चाब्रवीत् ॥१३॥ पृथुरप्यवदद्वाव्यमीष्सितं देहि सुव्रते । सर्वस्य जगतः शीघ्रं स्थावरस्य चरस्य च॥९४॥ तथेति च ब्रवीद्भूमिर्दुदोह स नराधिपः । स्वके पाणौ पृथुर्वत्सं कृत्वा स्वायंभुवं मनुम् ॥९५॥ तदन्नमभवदुग्धं॑ प्रजा जीवंति येन तु। ततस्तु ऋषिभिर्दुग्धा वत्सः सोमस्तदाभवत् ॥१६॥ दोग्धा वाचस्पतिर भूत्पात्रं वेदस्तपोरसः । देवैश्च वसुधा दुग्धा मरुद्दोग्धा तदाभवत् ॥९७॥ इंद्रो वत्सः समभवत्क्षीरमूज्जस्वलं बलं । देवानां कांचनं पात्रं पितृणां राजतं तथा ॥१८॥ अंतकश्चाभवद्दोग्धा यमो वत्सः स्वधा रसः । बिलं च पात्रं नागानां तक्षको वत्सकोऽ भवत् ॥१९॥ विषं क्षीरं ततो दोग्धा धृतराष्ट्रोभवत्पुनः । असुरैरपि दुग्धेयं आयसे शत्नुपीडनम्॥२०॥ संसार का कल्याण करने के लिए महर्षियों ने ॥५॥ राजा से अनुनय विनय किया, किन्तु राजा ने प्रजा को अभयदान नहीं दिया । उसके बाद महर्षियों ने उसे शाप देकर मार डाला, किन्तु वे अराजकता के भय से भयभीत हो गये॥६॥ तदनन्तर निष्पाप ऋषियों ने उस राजा के शरीर का बलपूर्वक मन्थन किया । सर्वप्रथम मन्थन किए जाने वाले उस शरीर से म्लेच्छ जातियाँ उत्पन्न हुयी ॥७॥ वे वेन की माता के अंश से उत्पन्न हुयी थीं । उन सबो के शरीर की कान्ति काले अंजन के समान काली थी । पिता के अंश से वेन के दाहिने हाथ से दिव्य तेज से युक्त पुत्र उत्पन्न हुआ। वह धनुष् बाण और गदा धारण किए हुए था । वह रत्नजटित कवच तथा अङ्गद (विजाइठ) धारण किए था ॥९॥ वे पृथु के नाम से प्रख्यात भगवान् विष्णु ही अवतीर्ण हुए थे । जब उनको ब्राह्मणों ने राजा के पद पर अभिषिक्त किया तो उन्होंने कठोर तपस्या की ॥१०॥ वे भगवान् विष्णु से वरदान प्राप्त करके सम्पूर्ण एथिवी के स्वामी हो गये। उन्होंने देखा कि प्रथिवी स्वाध्याय तथा वषट्कार (यज्ञादि) से रहित हो गयी है ॥११॥ अमित पराक्रम सम्पन्न उन्होंने अपने बाणों से पृथिवी को बेध देना चाहा । उस समय भूमि गौ का रूप धारण करके भागने के लिए तैयार हो गयी॥१२॥ पृथु भी धनुष पर बाण चढाये हुए उसके पीछे दौड़ने लगे । उसके बाद एक स्थान पर खड़ी होकर भूमि ने पूछा-- में आपकी किस आज्ञा का पालन करूँ ॥१३॥ पृथु ने भी कहा-- हे सुब्रते ! तुम चराचरात्मक सम्पूर्ण जगत् के अभिलषित अर्था को शीघ्र प्रदान करो ॥१४॥ इस पर भूमि ने कहा-- बहुत अच्छा । इसके बाद राजा पृथु ने स्वायम्भुव मनु को बछड़ा बनाकर अपने हाथ पर पृथिवी के दुग्ध को दूहा ॥१५।। वह अन्न के रूप में परिणत हो गया । उसी से सारी प्रजायें जीवित रहती हैं । उसके बाद ऋषियों ने पृथिवी का दोहन किया । उस समय सोम बछड़ा बने थे ॥१६॥ दोहन करने वाले बृहस्पति थे । वेद ही दुग्ध पात्र बना और तपस्या ही दुग्ध था । देवताओं ने भी पृथिवी का दोहन किया उस समय दूहने वाले मरुद् देवता थे ॥१७॥ इन्द्र ही बछड़ा बने । उन सबों ने उर्जा तथा बल रूपी दुग्ध का दोहन किया । देवताओं का पात्र सुवर्ण का था । पितरों ने रजतपात्र में पृथिवी के स्वधा रूपी
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