Srishti Khanda Extracted Page 84

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-84

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Sanskrit Original

गतेंतरेचाक्षुषनामधेये वैवस्वताख्ये च पुनःप्रवृते । प्रजापति: सोस्यचराचरस्य बभूव सूर्यान्वयज:सचिह्न: ॥८ ०॥ पुलस्त्य उवाच मन्वंतराणि सर्वाणि मनूनां चरितानि यत् । प्रमाणं चैव कल्पस्य तत्सृष्टि च समासतः ॥८ १॥ एकचित्त: प्रसन्नात्मा शृणु कौरवनंदन। यामा नाम पुरा देवा आसन्स्वायंभुवांतरे ॥८२॥ सप्तैव ऋष्यः पूर्वं ये मरीच्यादयः स्मृताः। आग्नीध्रश्चाग्रिबाहु्च विभुः सवन एव च ॥८३॥ ज्योतिष्मान् ् युतिमान्भव्यो मेघा मेधातिथिर्वसुः । स्वायंभुवस्यास्य मनोर्दशैते वंशर्द्धनाः ॥८ ४॥ प्रतिसर्गममीकृत्वा जग्मुस्ते परमंपदम्। एवं स्वायंभुवं प्रोक्तं स्वारोचिषमतः परम् ॥८५॥ स्वारोचिषस्य तनयाश्चत्वारो देववर्चसः । नभोसृभस्यप्रत्रृति्भावनः कीर्तिवर्धनः ॥८६॥ दत्तोत्रि््चवनस्तंभः प्राणः कश्यप एव च । अर्वा बृहस्पतिश्चैव सप्तसप्तर्षयोभवन् ॥८ ७॥ तदादेवाश्च तुषिताः स्मृताः स्वारोचिषेंतरे । हवींद्रः सुकृतो मूर्तिरापोज्योतिरथः स्मृतः॥८८॥ वसिष्ठस्य सुताः पञ्ज ये प्रजापतयस्तदा । द्वितीयमेतत्कथितं मन्वंतरमतःपरम् ॥८९॥ अन्यश्चैव प्रवक्ष्यामि तथा मन्वंतरं शुभम् । मनुर्नामौत्तमिस्तत्र दशपुत्रानजीजनत् ॥९०॥ इषं ऊर्जस्तनूजश्च शुचिः शक्रस्तथैव च । मधुश्च माधवश्चैव नभस्यतोथ नभस्तथा ॥९१॥ सहः सहस्य एतेषामुत्तमःकीर्तिवर््दनः । भावनस्तत्र देवाः स्युरूर्जाः सप्तर्षयः स्मृताः ॥९२॥ कौकभिण्डिः कुतुण्डश्च दाल्भ्यः शंख प्रवाहित: । मितिश्च॒ संमितिश्चैव सप्तैते योगवर्धनाः ॥९३॥ मन्वंतरं चतुर्थं तु तामसं नाम विश्रुतं । कविःपृथुस्तथैवाग्निरकपिः कविरेव च ॥९४॥ जा का अभिषेक किया गया । चाक्षुष मन्वन्तर के बीत जाने पर वैवस्त मनु को इन सबों ने पृथिवी का राजा वनादा।७९॥ जब चाक्षुष मन्वन्तर वीतकर वैवस्वत मन्वन्तर प्रारम्भ हुआ तो सूर्य वंश में उत्पन्न होने वाले अपने चिह्द के साथ सम्पूर्ण जगत् के स्वामी प्रजापति हुए ॥८०॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- हे कौरव नंदन सभी मन्दन्तरों, मनुओं के चरित, कल्प का प्रमाण और उस कल्प की सृष्टि को प्रसंत्रता पूर्वक एकाग्रचित्त होकर संक्षेप में सुनो । पहले स्वायम्भुव मन्वन्तर में याम नामक देवता थे ॥८१-८३॥ उस मन्वन्तर के मरीचि आदि सप्तर्षि थे । स्वायम्भुव मनु के दश पुत्र थे आग्नीघ्र, अग्निबाहु, विभु, सवन, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, भव्य, मेधा, मेधातिथि तथा वसु ॥८३-८४॥ ये सब प्रतिसर्ग (प्रलय) हो जाने पर परंपद चले गये । इसतरह मैंने स्वायम्भुव मन्वन्तर का वर्णन किवा । अब इसके बाद स्वारोचिष् मन्वन्तर हुआ ॥८५॥ स्वारोचिष् मनु के देवता के समान कान्ति वाले चार पुत्र हुए । नभ, नभस्य, प्रसृति और भावन । ये स्वारोचिष् मनु की कीर्ति को बढाने वाले थे ॥८६॥ दत्तात्रेय, अत्रि, च्यवन, स्तम्ब, प्राण, कश्यप और वृहस्पति ये स्वारोचिष् मन्वन्तर के सप्तर्षि हुए ॥८७॥ स्वारोचिष् मन्वन्तर में तुषित नामक देवताओं का गण था । हवीन्द्र, सुकृत, मूर्ति, आप तथा ज्योतिरथ ये वसिष्ठ के पाँच पुत्र ही इस मन्वन्तर के प्रजापति थे । यह मैंने द्वितीय मन्वन्तर का वर्णन किया इसके बाद ॥८९॥ मैं तीसरे मन्वन्तर का वर्णन करूँगा । इस मन्वन्तर के मनु औतमि हुए उनके दश पुत्र हुए ॥९०॥ ईष, ऊर्ज, तनूज, शुचि, शुक्र, मधु, माधव, नभस्य, नभ एवं सह । इनसवों में सहस्य सबसे छोटा थे । उस मन्वन्तर में भानुसंज्ञक देवता थे और ऊर्ज संडुक सप्तर्षि थे ॥९ १-९२॥ कौकिभिण्डि, कुतुण्ड, दाल्म्य, शंख प्रवाहित, मित एवं सम्मित, ये सात योगवर्द्धन सप्तर्षि वे ॥९३।। चौथा मन्वन्तर तामस मन्वन्तर के नाम से प्रख्यात है । इस मन्वन्तर के सप्तर्षियों के नाम थे

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