Srishti Khanda Extracted Page 82

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-82

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Sanskrit Original

निद्राभरसमाक्रांता दिवा परशिराः क्वचित् । ततस्तदंतरं लब्ध्वा प्रविश्यांतःशचीपतिः ॥५६॥ बञ्रेण सप्तधा चक्रे तं गर्भ त्रिदशाधिपः । ततः सप्त च ते जाताः कुमाराः सूर्यवर्चसः ॥५७॥ रुदंतस्सप्त ते बाला निषिद्धा दानवारिणा। भूयोपि रुदमानांस्तानेकैकान्सप्तथा हरिः॥५८॥ चिच्छेद वञ्रहस्तो वै पुनस्तूदरसंस्थितान् । एवमेकोनपंचाशद्धूत्वा ते रुरुदुर्भूशम्॥५९॥ इंद्रो निवारयामास मारुदध्वं पुनःपुनः। ततः स चिंतयामास वितर्कमिति वृत्रहा ॥६०॥ कर्मणः कस्य माहात्स्यात्पुनः संजीवितास्त्वमी । विदित्वा पुण्ययोगेन पौर्णमासीफलंत्विदम् ॥६१॥ नूनमेतत्परिणतमथवा ब्रह्मपूजनात् । वञ्रेणाभिहताःसंतो न विनाशमुपाययुः ॥६२॥ एकोप्यनेकतामाप यस्मादुदरगोपनम् । अवध्या नूनमेते वै तस्माद्देवा भवंत्विति॥६३॥ यस्मान्मारुद इत्युक्ता रुदंतो गर्भसंभवाः । मरुतो नाम ते नाम्ना भवंतु सुखभागिनः ॥६४॥ ततः प्रसाद्यदेवेशः क्षमस्वेति दितिं पुनः । अर्थशास्त्रं समास्थायमयैतदुष्कृतं कृतम् ॥६५॥ कृत्वा मरुहणंदेवैः समानममराधिपः। दितिं विमानमारोप्य ससुतामगमद्दिवम् ॥६६॥ यज्ञभागभुजः सर्वे मरुतस्ते ततो भवन्। न जग्मुरैक्यमसुरैरतस्ते सुरवल्लभाः ॥६७॥ भीष्म उवाच आदिसर्गस्त्वया ब्रह्मन्कथितो विस्तरेण मे। प्रतिसर्गश्च यो येषामधिपांस्तान्वदस्व मे ॥६८॥ पुलस्त्य उवाच यदाभिषिक्तः सकलेपि राज्ये, पृथुर्धरित्र्यामधिपो बभूव । तथौषधीनाधिपं चकार, यज्ञब्रतानां तपसा च सोमभ् ॥६९॥ शिर करके सो गयी । इसके बाद उस कमीं को देखकर इन्द्र दिति के उदर में प्रवेश कर गये ॥५६॥ उन्होंने वज्र से उस गर्भ को सात टुकड़ों में काट दिया । उसके कारण वे सूर्य के समान देदीप्यमान सात बालक हो गये ॥५७॥ वे सभी वालक रोने लगे तो इन्द्र ने कहा मत रोओ, फिर भी वे रोते रहे तो इन्द्र ने फिर सातों के सात-सात टुकड़े कर दिए । इसतरह से वे सभी उनचास होकर अत्यधिक रोने लगे ॥५८-५९॥ इन्द्र ने उन सबों को बार-बार रोका कि मत रोओ, फिर भी वे रोते रहे । इन्द्र ने सोचा ॥६०॥ किस कर्म के कारण ये फिर भी जीवित हैं ? और इन्द्र ने जाना कि यह पूर्णमासीव्रत का फल है । उसी के पुण्य से ये जीवित हैं ॥६१। अथवा ब्रह्माजी की पूजा करने के कारण जीवित हैं । मैंने इन सबों को वज्र से मारा फिर भी ये मरे नहीं ॥६२॥ चूकि यह एक ही गर्भ अनेक हो गये हैं, अतएव ये अबध्य हैं । अतएव ये देवता ! हो जायँ ॥६३॥ इन सभी रोने वाले बालकों को इन्द्र ने मारुद कहा-- अतएव इन सबों का नाम मारुत हो जाय और ये सुख भोगें ॥६४॥ उसके बाद इन्द्र ने दिति को स्तुति से प्रसन्न करके कहा कि क्षमा करो । मैंने अर्थशास्त्र को अपना कर इस पाप को किया है ॥६५॥ इसके बाद इन्द्र ने मरुद्गण को देवताओं के समान बना दिया और उन सबों के साथ दिति को विमान पर बैठाकर स्वर्गलोक में आ गये ॥६६॥ उसी समय से मरुद्गण यज्ञभाग के भोक्ता बन गये । वे असुरों के साथ मिले नहीं इसलिए वे देवताओं के प्रिय हैं ॥६७॥ भीष्मजी ने कहा- हे ब्रह्मन् ! आपने मुझे आदि सर्ग को बतलाया अब आप जिन राजाओं का प्रतिसर्ग है उसे मुझे बतलाएँ ॥६८॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा जब महाराज पृथु का राज्याभिषेक हुआ तब वे पृथिवी के सम्पूर्ण राज्यों के स्वामी हो गये । उसी समय ब्रह्माजी ने सोम (चन्द्रमा) को सभी औषधियों, यज्ञो, व्रतों तथा तपस्याओं का स्वामी बना दिया ॥६९॥ नक्षत्र, तारे, द्विज, वृक्ष, गुल्म तथा लताओं के स्वामी हिरण्यगर्भ को

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