Srishti Khanda Extracted Page 81

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-81

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Sanskrit Original

वल्मीकेषु न तिष्ठेत न चोद्विग्रमना भवेत् । न नखेन लिखेद्धृभौ नांगारे न च भस्मनि ॥४२॥ न शयालुःसदा तिष्ठेद्व्यायामं च विवर्जयेत् । न तुषांगारभस्मास्थिकपालेषु समाविशेत् ॥४३॥ वर्जयेत्कलहं लोके गात्राभ्यंगं तथैव च। न मुक्तकेशी तिष्ठेत नाशुचिः स्यात्क्थंचन॥४४॥ न शयोतोत्तरशिराः च चैवाधःशिराः क्वचित् । न वस्त्रहीना नोषद्विम्रा न॒चार्द्रचरणा सती ॥४५॥ नामंगल्यां वदेद्ठाचं न च हास्याधिकाभवेत् । कुर्याच्च गुरुभिर्नित्यं पूजां मांगल्यतत्परा ॥४६॥ सरवौषधीभिः सृष्टेन वारिणा स्नानमाचरेत्। कृतरक्षा तु शुश्रूषा वाचा पूजनतत्परा ॥४७॥ तिष्ठेत्प्रसज्नवदना भर्तृप्रियहिते रता । न गर्हयेच्चभर्तारं सर्वावस्थमपि क्वचित् ॥४८॥ कृशाहं दुर्बला चैव वार्डक्यं मम च गतम् । स्तनौ मे चलितौ स्थानान्मुखं च वलिभंगुरम् ॥४९॥ एवंविधा त्वया चाहंकृतेति न वदेत्क्वचित् । स्वस्त्यस्तु ते गमिष्यामि तथेत्युक्तस्तया पुनः ॥५०॥ पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवांतरधीयत । ततः सा भर्तृवाचोक्तविधिना समतिष्ठत ॥५९॥ अथ ज्ञात्वा तथेंद्रोपि दितेः पार्श्वमुपागतः । विहाय देवसदनं तां शुश्रुषुरवस्थितः ॥५२॥ दितेश्छिद्रांतरप्रेप्सरभवत्पाकशासनः । विपरीतांतरव्यग्रः प्रसन्नवदनो बहिः ॥५३॥ अजानन्निव तत्त्कार्यमात्मनश्शुभमाचरन्। ततो वर्षशतांते सा न्यूने तु दिवसैस्त्रिभिः ॥५४॥ मेने कृतार्थमात्मानं प्रीत्या विस्मितमानसा । अकृत्वा पादयोः शौचं शयाना मुक्तमूर्धजा॥५५॥ ओखली आदि के ऊपर नहीं बैठना चाहिए । गर्भिणी जल के भीतर प्रवेश न करे और न कभी अकेले घर में रहे॥४१॥ उसको कभी भी बल्मीकों पर नहीं खड़ा होना चाहिए और न तो कभी उद्विग्न मन वाली होना चाहिए । उसे पृथिवी पर या आग के अङ्गारे पर या राख पर नख से नहीं लिखना चाहिए ॥४२॥ हमेशा सोते नहीं रहना चाहिए और न व्यायाम करना चाहिए । उसे भूसी की आग, भस्म, हड्डी तथा खोपड़ी पर नहीं बैठना चाहिए ॥४३॥ वह किसी से कभी झगड़ा न करे तथा अपने शरीर की मालिश भी न कराये । वह कभी बालों को खोलकर न रखे और कभी भी अपवित्र न रहे ॥४४॥ गर्भिणी कभी भी उत्तर दिशा में अथवा नीचे की ओर शिर करके न सोये । वह कभी नंगी न रहे, उद्विग्न (उदास) न होए और अपने पैरों को गीला न रखे ॥४५॥ कभी भी वह अमङ्गलमय बातों को न करे और न अधिक हँसे । अपने मङ्गल को चाहने वाली उसे गुरुजनों की पूजा करनी चाहिए ॥४६॥ सर्वीषधि मिश्रित जल से गर्भिणी स्नान करे । वह रक्षा, सुश्रुषा तथा वाणी द्वारा पूजन करती रहे ॥४७॥ पति का कल्याण चाहने वाली वह सदा प्रसन्न रहे वह कभी भी किसी भी अवस्था में अपने पति की निन्दा न करे ॥४८॥ वह कभी भी अपने पति से यह न कहे कि तुमने मुझे दुबली-पतली बना दिया । मेरी बुढापा आ गयी, मेरे स्तन ढीले हो गये और मेरे मुख पर झूरियाँ आ गयीं । यह कहकर कश्यप महर्षि ने कहा-- तुम्हारा कल्याण हो अब मैं जाऊंगा । यह कहकर महर्षि चले गये ॥४९-५०॥ वे सबों को देखते ही देखते वहाँ से अन्तर्धान हो गये । उसके बाद दिति महर्षि के द्वारा उपदिष्ट प्रकार से रहने लगी ॥५१॥ उसके बाद इन सारी बातों को जानकर इन्द्र भी दिति के पास आये । वे अपने देवगृह को छोड़कर तपोवन में रहकर दिति की सेवा करने लगे । वे हमेशा देखते रहते थे कि दिति से नियम-पालन में कोई गल्ती हो । इन्द्र ऊपर से तो प्रसन्न रहते थे; किन्तु वे भीतर से व्याकुल थे ॥५३॥ वे ऐसे रहते थे जैसे वे इस कार्य को जानते ही न हों और अपना कल्याण करते थे । उसके बाद सौ वर्ष पूरा होने में तीन दिन कम थे । दिति को लगता था कि मैं अब कृत-कृत्य हो गयी और आनन्दातिरेक के कारण वह अपने को भी भूल गयी । वह अपने पैरों को शुद्ध किये बिना ही बालों को खोलकर लेट गयी ॥५४-५५॥ दिन में दूसरी ओर

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