Srishti Khanda Extracted Page 80

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-80

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Sanskrit Original

यः कुर्याद्विधिनानेन पौर्णमास्यां स्त्रियोपि वा । सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्रोति ब्रह्मसाम्यताम् ॥२७॥ इह लोके वरान्पुत्रान्सौभाग्यं श्रुवमश्नुते । यो ब्रह्मा स स्मृतो विष्णुरानंदात्मा महेश्वरः ॥२८॥ सुखार्थी कामरूपेण स्मरेहेवं पितामहम् । एवं श्रुत्वा चकारासौ दितिः सर्वमशेषतः ॥२९॥ कश्यपो ब्रतमाहात्म्यादागत्य परया मुदा । चकार कर्कशां भूयो रूपलावण्यसंयुताम्॥३ ०॥ वरैराछंदयामास सा तु वव्रे वरंवरम्। पुत्रं शक्रवधार्थाय समर्थं च महौजसम् ॥३९॥ वरयामि महात्मानं सर्वामरनिषूदनम् । उवाच कश्यपो वाक्यमिंद्रहंतारमूर्जितम् ॥३२॥ प्रदास्याम्यहमेतेन किन्त्वेतत् क्रियतां शुभे। आपस्तवीं तु कृत्वेष्टिं पुत्रीयाद्यसुस्तानि ॥३३॥ विधास्यामि ततो गर्भ स्पृष्ट्वाहंस्तनौ शुभे। भविष्यति शुभो गर्भो देवि शक्रनिषूदनः॥३४॥ आपस्तवीं ततश्चक्रे पुत्रेष्टिं द्रविणाधिकाम्। इंद्रशत्रो भवस्वेति जुहाव च हविस्त्वरन् ॥३५॥ देवाश्च मुमुर्हुदैत्या विमुखाश्चैव दानवाः । दित्यां गर्भमथाधत्त कश्यपः प्राह तां पुनः ॥३६॥ मुखं ते च्रदंप्रतिमं स्तनौ बिल्वफलोपमौ । अधरौ विद्रुमाकारौ वर्णश्चातीव शोभनः ॥३७॥ त्वां दृष्ट्वाहं विशालाक्षि विस्मरामि स्विकां तनुम् । तदेवं गर्भःसुश्रोणि हस्तेनोप्तस्तनौ तव ॥३८॥ त्वया यत्नो विधातव्यो ह्यास्मिन्ग्भे वरानने । संवत्सरशतंत्वेकमस्मिन्नेव तपोवने ॥३९॥ संध्यायां नैव भोक्तव्यं गर्भिण्या वरवणिनि। न स्थातव्यं न गंतव्यं वृक्षमूलेषु सर्वदा ॥४०॥ नोपस्करेषु निविशेन्मुसलोलूखलादिषु । जलं च नावगाहेत शून्यागारं च वर्जयेत्॥४१॥ करे ।।२५-२६॥ जो कोई पुरुष अथवा स्री इस विधि से पौर्णमासीव्रत को करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर ब्रह्माजी के समान हो जाता है ॥२७॥ वह इस लोकमें श्रेष्ठ पुत्रों तथा सौभाग्य को निश्चित रूप से प्राप्त करता है। ब्रह्मा, विष्णु तथा आनन्द स्वरूप महेश्वर इन तीनों में अभेद बतलाया गया है ॥२८॥ सुख चाहने वाला व्यक्ति ब्रह्माजी का स्मरण काम रूप से करे । इस तरह से सुनकर दिति ने पौर्णमासी व्रत की सारी विधियों को सम्पन्न किया॥२९॥ ब्रत की महिमा के कारण कश्यप महर्षि अत्यधिक प्रसन्नता पूर्वक, व्रत करने के कारण कर्कश बनी हुयी दिति को रूप तथा लावण्य से सम्पन्न बना दिए ॥३०॥ उन्होंने दिति से वरदान माँगने के लिए कहा तो उसने इन्द्र का वध करने के लिए समर्थ तथा ओजस्वी पुत्र का वरदान .माँगा ॥३१॥ दिति ने कहा-- हे महात्मन् ! में सभी देवताओं को मारने वाले पुत्र को प्राप्त करना चाहती हूँ । महर्षि कश्यप ने कहा मैं तुम्हें इन्द्र को मारने वाले पुत्र को प्रदान करूँगा, किन्तु तुम्हें भी इन सब. कार्यो को करना होगा । हे सुन्दरि ! आज पुत्र प्रदान करने वाली आपस्तवी इष्टि को करके ॥३३॥ तुम्हारे स्तनों का स्पर्श करके मैं तुम्हारे गर्भ का आधान करूँगा । हे देवि ! वह गर्भ इन्द्र को मारने वाला होगा ॥३४।। उसके बाद महर्षि कश्यप ने अधिक धन से पूरा होने वाली आपस्तवी इष्टि को किया। उन्होने तुम इन्द्र को मारने वाला होओ, इस मन्त्र से हविष्य का होम किया ॥३५॥ उससे दैत्यो के विरोधी देवता मूर्छित हो गये । इसके बाद कश्यप महर्षि ने दिति के गर्भ का आधान किया । उन्होंने कहा ॥३६॥ तुम्हारा मुख चन्द्रमा के समान है तथा तुम्हारे स्तन विल्वफल के समान हैं ।तुम्हारे ओठ मूंगे के समान लाल हें और तुम्हारा वर्ण अत्यन्त मनोहर है ॥३७॥ हे देवि ! तुमको देखकर तो मैं अपने शरीर को भी भूल जाता हुँ ।हे सुन्दरी ! तुम्हारे शरीर में मैंने हाथ से स्पर्श करके गर्भ का आधान कर दिया है ॥३८॥ हे वरानने ! इस गर्भ के विषय में तुम्हें सावधानी करनी होगी । इसी तपोवन में सौ वर्षों तक तुम्हे रहना होगा ॥३९॥ गर्भिणी को संध्या के समय भोजन नहीं करना चाहिए । वृक्ष की जड़ में न तो रुकना चाहिये और न वहाँ जाना चाहिए ॥४०॥ उसे मूसल अथवा

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