Srishti Khanda Extracted Page 78

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-78

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Sanskrit Original

सातवो अध्याय भीष्म उवाच दितेःपुत्राः कथं जाता मरुतो देवबल्लभाः । देवैर्जग्मुश्च सापत्मैः कस्मात्सख्यमनुत्तमम् ॥१॥ पुलस्त्य उवाच पुरा देवासुरे युद्धे हतेषु हरिणा सुरैः। पुत्रपौत्रेषु शोकार्ता गता भूलोकमुत्तमम् ॥२॥ पुष्करेषु महातीर्थे सरस्वत्यास्तटे शुभे । भर्त्तुराराधनपरा तप उग्रं चचार ह॥३॥ दितिवैं दैत्यमाता तु ऋषिकार्येण सुब्रता। फलाहारा तपस्तेपे कृच्छ्चांद्रायणादिभिः ॥४॥ यावद्वर्षशतं साग्रं जराशोकसमाकुला। ततः सा तपसा तप्ता वसिष्ठादीनपृछत ॥५॥ कथयंतु भवन्तो मे पुत्रशोकविनाशनम् । व्रतं सौभाग्यफलदमिहलोके परत्र च ॥६॥ ऊचु वसिष्ठप्रमुखा ज्येष्ठस्य पूर्णिमाब्रतम्। यस्य प्रसादादभवत्सुतशोकविवर्जिता ॥७॥ भीष्म उवाच श्रोतुमिच्छाम्यहं ब्रह्मन् ज्येष्ठस्य पूर्णिमाब्रतम् । सुतानेकोपंचाशद्येन लेभे पुनर्दितिः ॥८॥ पुलस्त्य उवाच यद्दसिष्ठादिभिः पूर्व दित्यै संकथितं व्रतम् । विस्तरेण तदेवेदं मत्सकाशान्निशामय ॥९॥ ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे पौर्णमास्यां यतब्रता। स्थापयेदव्रणं कुंभं सिततण्डुलपूरितम्॥१०॥ नानाफलयुतं तद्ठदिक्षुदंडसमन्वितम् । सितवस्त्रयुगच्छन्नं सितचंदनचर्चितम् ॥१ १॥ नानाभक्ष्यसमोपेतं सहिरण्यं तु शक्तितः । ताम्रपात्रं गुडोपेतं तस्योपरिनिवेशयेत् ॥१२॥ ज्येष्ठपूणिमाब्रत, मरुद्गणों की उत्पत्ति, विभिन्न समुदाय के राजाओं तथा मन्वन्तरों का वर्णन भीष्मजी ने कहा-- दिति के पुत्र मरुद्रण देवताओं के प्रिय कैसे हो गये । दैत्यों के शत्रु देवता उनके श्रेष्ठ मित्र कैसे हो गये ?2॥१॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- प्राचीनकाल में देवासुर संग्राम में इन्द्र तथा देवताओं के द्वारा अपने पुत्रों तथा पात्रों के मार दिए जाने पर दिति शोकार्त हो गयी और वह भूलोक के महातीर्थ पुष्कर में सरस्वती नदी के तट पर चली गयी । अपने पति की आराधना करने वाली दिति उग्र तपस्या करने लगी ॥३॥ सुव्रता दैत्यो की माता दिति ऋषि के कार्य से फलाहार करती हुयी, कृच्छु चान्द्रायण इत्यादि का अनुष्ठान करती हुयी तथा जरा एवं शोक से व्याकुल बनी हुयी सौ से अधिक वर्षों तक तपस्या की । उसके बाद तपस्या से सन्तप्त वह वसिष्ठ आदि महर्षियों से पूछी ॥४-५॥ आपलोग मुझे उस ब्रत को बतलाइये जो इस लोक में तथा परलोक में सौभाग्य देने वाला तथा पुत्रशोक को विनष्ट करने वाला हो ॥६॥ उसके बाद वसिष्ठ आदि महर्षियों ने ज्येष्ठ की पूर्णिमा का ब्रत बतलाया । उसकी ही कृपा से दिति पुत्रशोक से रहित हो गयी ॥७॥ भीष्मजी ने कहा-- हे ब्रह्मन् ! में ज्येष्ठ की पूर्णिमा के व्रत को जानना चाहता हूँ; जिसके फलस्वरूप दिति ने उनचास पुत्रों को प्राप्त किया ॥८॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- प्राचीन काल में वसिष्ठ आदि ने जिस व्रत को दिति को बतलाया उसे में तुम्हें विस्तार के साथ बतलाता हूँ सुनो ॥९॥ ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को नियम पूर्वक उजले चावल से भरे हुए व्रणरहित कलश की स्थापना करे॥१०॥ उस कलश को अनेक प्रकार के फलों से युक्त तथा ईख दण्ड से युक्त होना चाहिए । उसे दो उजले वस्रों से ढँका हुआ तथा उजले चन्दन से लिप्त होना चाहिए ॥११॥ अनेक प्रकार के भक्ष्य पदार्थो से तथा अपनी

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