Srishti Khanda Extracted Page 77
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-77
Sanskrit Original
श्रीपद्ममहापुणण संपातिश्च जटायुश्च अरुणस्य सुतावुभौ । संपातिपुत्रो वभ्रुश्च शीघ्रगश्चातिविश्रुतः ॥६७॥ जटायोः कर्णिकारश्च शतगामी च विश्रुतौ। तेषामसंख्यमभवत्पक्षिणां पुत्रपौत्रकम् ॥६८॥ सुरसायां सहस्त्रं तु सर्पाणामभवत्पुरा । सहस्रशिरसां कद्रूःसहस्रं प्राप सुव्रता ॥६९॥ प्रधानास्तेषु विख्याताष्षड्विशतिररिंदम । शेषवासुकिकर्कोटशंखैरावतकंबलाः ॥७०॥ धनजयमहानीलपद्याश्वतरतक्षकाः : ॥७१॥ शंखपालमहाशंखपुष्पदंष्टशुभानना: । शङ्खरोमा च नहुषो रमणः पणिनस्तथा॥७२॥ कपिलो दुर्मुखश्चापि पतंजलिमुखास्तथा । एषामनंतमभवत्सर्वेषां पुत्रपौत्रकम् ॥७३॥ प्रायशो यत्पुरादग्धं जनमेजयमंदिरे । रक्षोगणं क्रोधवशा सुनामानमजीजनत् ॥७४॥ दंष्ट्रिणां नियुतं तेषां भीमसे नादागातक्षयम्। दंष्ट्रिगोमायुकाकादीन् महिषीर्गोवराङ्गनाः ॥७५॥ सुरभिर्जनयामास ककश्यपात्त्रितयं पुरा । मुनिर्मुनीनांचगणं गणमप्सरसां तथा ॥७६॥ तथाकिन्नरगंधवर्निरिष्टा जनयद्वहून् । तृणवृक्षलतागुल्ममिरा सर्वमजीजनत् ॥७७॥ खसा तु यक्षरक्षांसि जनयामास कोटिशः। एते कश्यपदायादाःशतशोऽथ सहस्त्रशः ॥७८॥ एष मन्वंतरे भीष्म सर्ग: स्वारोचिषे स्मृतः । ततस्त्वेकोनपंचाशन्मरुतः कश्यपादिति: ॥ जनयामास धर्मज्ञ सर्वानमरबल्ल्भान् ॥७९॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे षष्ठोध्यायः ॥६॥ i पुत्र शीघ्रग और वव्रु थे ॥६७॥ जटायू के भी दो पुत्र विख्यात थे कणिकार और शतगामी । इन सों के असंख्य पक्षी पुत्र और पौत्र रूप से उत्पन्न हुए ॥६८॥ सुरसा के पुत्र एक हजार सर्प हुए । कट्रु के भी हजार शिरों वाले एक हजार सर्प पुत्र हुए ॥६९॥ हे अरिन्दम ! उन सबों में छब्बीस प्रधान रूप से विख्यात हुए । वे हैं शेष, वासुकि, कर्कोटक, शंख, ऐरावत, कम्बल ॥७०॥ धनञ्जय, महानील, पद्म, अश्वतर, तक्षक, एलापुत्र, महापद्म, धृतराष्ट्र, बलाहक ॥७१॥ शंखपाल, महाशंख, पुष्टदंष्ट, शुभानन, शंखरोमा, नहुष, रमणा, पणिन ॥७१-७२॥ कपिल, दुर्मुख तथा पतञ्जलि । इन सबों के अनन्त पुत्र पौत्र हुए ॥७३॥ इन सबों में से बहुत से पहले जनमेजय के यज्ञ में जल गये । क्रोधवशा ने सुनामा नामक राक्षसों के गण को उत्पन्न किया ॥७४॥ इनके दाँत बड़े-बड़े थे । क्रुद्ध होकर भीमसेन ने इनमें से दस लाख को तो मार दिया । सुरभि ने कश्यप महर्षि के वीर्य से दाँत वाल गोमायु (शृगाल) कौए आदि, भैंस, गौ तथा सुन्दरी ख्ियों को जन्म दिया । मुनि ने मुनि समूह तथा अप्सराओं के गण को जन्म दिया।७६॥ अरिष्टा ने बहुत से किन्नरों तथा गन्धर्वो को जन्म दिया । इरा ने तृण, वृक्ष, लता तथा गुल्म इत्यादि सबों को उत्पन्न किया ॥७७॥ खसा ने करोड़ों यक्षों एवं राक्षसों को उत्पन्न किया । ये सभी सैकड़ों तथा हजारों कश्यप महर्षि की सन्ताने हैं ॥७८॥ हे भीष्म ! यह स्वारोचिष मन्वन्तर का सर्ग है । उसके बाद उनचास मरुतों को कश्यप ऋष के अंश से दिति ने उत्पन्न किया । हे धर्मज्ञ ! सभी मरुद्रण देवताओं के प्रिय हैं ॥७९॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के छठे अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ६।। ञि
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