Srishti Khanda Extracted Page 76
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-76
Sanskrit Original
अयोमुख:शंबरश्च॒ कपिलो वामनस्तथा। मरीचिर्मागधश्चैव हरिर्गजशिरास्तथा ॥५०॥ निद्राधरश्च केतुश्च केतुवीर्यः शतक्रतुः । इन्द्रमित्रग्रहश्चैव बञ्रनाभस्तथैव च॥५१॥ एकवस्त्रो महाबाहुर्बज्राक्षस्तारकस्तथा । असिलोमा पुलोमा च विकुर्वाणो महासुरः ॥५२॥ स्वर्भानुर्वृषपर्वा च एवमाद्या दनोस्सुता। स्वर्भानोः सुप्रभा कन्या शची चैव पुलोमजा ॥५३॥ उपदानवी मयस्यासीत्तथा मंदोदरीकुहूः। शर्मिष्ठा सुंदरी चैव चंडा च वृषपर्वणः ॥५४॥ पुलोमा कालका चैव वैश्वनरसुते उभे । बह्वपत्यो महासत्वो मारीचस्य परिग्रहः ॥५५॥ तयो: षष्टिसहस्त्राणि दानवानां पुरा भवन्। पौलोमान् कालखंजांश्च मारीचो जनयत्पुरा ॥५६॥ अवध्या ये नराणां वै हिरण्यपुरवासिनः । चतुर्मुखाल्लब्धवरा ये हता विजयेन तु ॥५७॥ विप्रचित्तिः सिंहिकायां नवपुत्रानजीजनत् । हिरण्यकशिपोर्ये वै भागिनेयास्त्रयोदश ॥५८॥ कसःशंखश्च राजेंद्र नलो वातापिरेव च । इल्वलो नमुचिश्चैव खसृमश्चांजनस्तथा ॥५९॥ नरकः कालनाभश्च परमाणुस्तथैव च । कल्पवीर्यश्च विख्यातो दनुवंशविवर्द्दनः ॥६०॥ संह्रादस्य तु दैत्यस्य निवातकवचाः कुले । अबध्याः सर्वदेवानां गंधर्वोरगरक्षसाम् ॥६ १॥ ये हताबलमाश्रित्य अर्जुनेन रणाजिरे। षट्कन्या जनयामास ताम्रा मारीचवीर्यतः ॥६२॥ शुकीं श्येनीं च भासीं च सुगृष्रीं गणिकां शुचिम्। शुकी शुकानुलूकांश्च जनयामास धर्मतः ॥६३॥ श्येनी शयेनांश्च भासीच कुररानप्यजीजनत् । गृध्री गृश्नान्सुगृध्री च पारावतविहंगमान् ॥६४॥ हंससारसकारंडपल्वान् शुचिरजीजनत्। एते ताम्रा सुताः प्रोक्ता विनतायां निशामय ॥६५॥ गरुड: पतगश्रेष्ठोऽरुणश्चेशः पतत्रिणाम् । सौदामिनी तथा कन्या येयं नभसि विश्रुता ॥६६॥ गजशिरा ॥५०॥ निद्राधर, केतु, केतुवीर्य, शतक्रतु, इन्द्रमित्रग्रह, वञ्रनाभ ॥५१।। एकवस्त्र, महाबाहु वञ्राक्ष, तारक, असिलोमा, पुलोमा, विकुर्वाण, महासुर ॥५२॥ स्वर्भानु तथा वृषपर्वा इत्यादि दनु के पुत्र थे । स्वर्भग्नु की पुत्री सुत्रमा थी और पुलोम की पुत्री शची थी ॥५३॥ मय की तीन पुत्रियाँ थी, उपदानवी, मन्दोदरी और कुहू वृषपर्वा की भी तीन पुत्रियाँ थीं, शर्मिष्ठा, सुन्दरी और चण्डा ॥५४।। वैश्वानर की दो पुत्रियाँ थी पुलोमा तथा कालका । ये दोनों अनेक सन्तानों वाली तथा महाशक्ति से सम्पन्न थीं ॥५५॥ इन दोनों से साठ हजार दानवों की उत्पत्ति हुयी । महर्षि कश्यप के ये पुत्र पौलोम तथा कालखञ्ज कहलाये ॥५६॥ ये मनुष्यों के लिए अवध्य थे तथा हिरण्यपुर में रहते थे | ये ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किये थे और ये अर्जुन के द्वारा मारे गये ॥५७॥ विप्रचित्ति के सिंहिका के गर्भ से तेरह पुत्र थे ॥५८॥ हे राजेन्द्र ! इनके नाम थे कंस, शङ्क, नल, वातापि, इल्वल, नमुचि, खसृम, अञ्जन ॥५९॥ नरक, कालनाभ, परमाणु, दनुवंश विवर्धन और विख्यात कल्पवीर्य ॥६०॥ संह्वाद दैत्य के वंश में निवातकवचों का जन्म हुआ । ये सभी देवता, गन्धर्व उरग और राक्षसों के लिए अवध्य थे ॥६१॥ इन सबों को अर्जुन ने रणाङ्गण में मारा | कश्यप महर्षि के वीर्य से ताम्रा ने छह कन्याओं को जन्म दिया ॥६२॥ उनके नाम हैं शुकी, श्येनी, भासी, सुगृधी, गृध्रिका तथा अशुचि । शुकी ने शुकों तथा उल्लुओं को उत्पन्न किया ॥६३॥ श्येनी ने श्येनों (वाज पक्षियों) को उत्पन्न किया मासी ने कुररों को जन्म दिया । ग्रृधी ने गृध्रों को तथा सुगृधी ने पारावत (कबूत्तर) पक्षियों को जना ।॥६४॥। शुची ने हंस, सारस, कारण्डव तथा प्लवों को उत्पन्न किया । ये ताम्रा के सन्तान बतलाये गये हैं अब विनता के पुत्रों को सुनो ॥६५॥ विनता के पक्षियों के स्वामी दो पुत्र हुए गरुड तथा अरुण । उसकी एक पुत्री सौदामिनी हुई जो आकाश में स्थित है ॥६६। अरुण के दो पुत्र हुए सम्पाती तथा जटायू । सम्पाती के प्रख्यात
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