Srishti Khanda Extracted Page 75
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-75
Sanskrit Original
कि श्रीपद्ममहापुराण a अदितिर्दितिर्दनुश्चैव अरिष्टा सुरसा तथा । सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा॥३४॥ कब्र खसा मुनिस्तद्दत्तासु पुत्रान्निबोध मे । तुषिता नाम ये देवाश्चाक्षुषस्यांतरे मनोः॥३५॥ वैवस्वतेंतरे चैव आदित्या द्वादश स्मृता: । इन्द्रो धाता भगस्त्वष्टा मित्रोऽथ वरुणोऽर्यमा ॥३६॥ विवस्वान्सविता पूषा अंशुमान्विष्णुरेव च । एते सहस्रकिरणा आदित्यादाद्वश स्मृताः ॥३७॥ मारीचात्कश्यपाज्जाताः पुत्रास्तेऽदितिनंदनाः । कृशाश्वस्य ऋषेःपुत्रा देवप्रहरणाःस्मृताः॥३८॥ एते देवणास्तात प्रतिमन्वंतरेषु च । उत्पद्यते विलीयंते कल्पे कल्पे तथैव च ॥३९॥ दितिः पुत्र्यं लेभे कश्यपादिति नःश्रुतम्। हिरण्यकशिपुं चैव हिरण्याक्षं तथैव च॥४०॥ हिरण्यकशिपोस्तद्वज्जातं पुत्रचतुष्टयम् । प्रह्मादश्चानुह्णादश्च संहादो हाद एव च॥४९॥ प्रह्मादपुत्रा आयुष्मान् शिविर्वाष्कलिरेव च । विरोचनश्चतुर्थस्तु स॒ बलिं पुत्रमाप्तवान् ॥४२॥ बलेःपुत्रशतं त्वासीद्वाणज्येष्ठं ततो नृप । धृतराष्ट्रस्तथासूर्य्यो विवस्वानंशुतापनः ॥४३॥ 'नेकुम्भनामागुर्वक्षः कुक्षिभौमोथ भीषणः। एवमन्ये तु बहवो बाणोज्येष्ठो गुणाधिकः ॥४४॥ बाणस्सहस्रबाहुस्तु सर्वास्त्रिगुणसंयुतः । तपसा तोषितो यस्य पुरे वसति शूलधृत् ॥४५॥ महाकालत्वमगमत्साक्ष्ये यस्य पिनाकिनः । हिरण्याक्षस्य पुत्रोभूदंधको नाम नामतः ॥४६॥ भूतसंतापनश्चैव महानागस्तथैव च । एतेभ्यःपुत्रपौत्राणां कोटयः सप्तसप्ततिः ॥४७॥ महाबला महाकाया नानारूपा महौजसः। दनुःपुत्रशतं लेभे कश्यपाद्दरदर्पितम् ॥४८॥ विप्रचित्तिः प्रधानोभूदेषां मध्ये महाबल: । द्विरष्टमूर्दा शकुनिस्तथा शंकुशिरोधरः ॥४९॥ करूँगा ॥३३॥ अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता, ताम्रा क्रोधवशा, इरा ॥३४॥ कद्रु, खसा तथा मुनि ये कश्यप महर्षि की पत्नियों के नाम हैं । इन पत्नियों में उत्पन्न होने वाले पुत्रों का नाम सुनो । चाक्षुष मन्वन्तर में जो तुषित नामक देवता हुए ॥३५॥ वे ही वैवस्वत मन्वन्तर में द्वादश आदित्य कहलाये । इन्द्र, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण, अर्यमा ॥३६॥ विवस्वान् सविता, पूषा, अंशुमान् तथा विष्णु, ये सभी हजारों किरण वाले द्वादशादित्य कहे गये हैं ॥३७॥ ये मरीचि महर्षि के पुत्र कश्यप महर्षि की आदिति नामक पत्नी के गर्भ से उत्पन्न हैं। कृशाश्व नामक ऋषि से जो पुत्र पैदा हुए वे देव प्रहरण कहलाते हैं ॥३८॥ ये देवगण सभी मन्वन्तरों तथा प्रत्येक कल्पों में उत्पन्न होते हैं तथा विलीन होते हैं ॥३९॥ हमने सुना है कि दिति ने कश्यप महर्षि से दो पुत्रों को प्राप्त किया । उनके नाम हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष हैं ॥४०॥ हिरण्यकशिपु के उनके ही समान चार पुत्र हुए प्रह्लाद, अनुह्णाद, संहाद और हाद ॥४१॥ प्रह्णाद के भी चार पुत्र हुए आयुष्मान्, शिवि, वाष्कलि और विरोचन । विरोचन के पुत्र बलि हुए ॥४२॥ बलि के सौ पुत्र हुए उन सबों में बड़े बाण थे । बलि के धृतराष्ट्र, सूर्य, विवस्वान्, अंशुतापन, निकुम्भ, आगुः, वक्षःकुक्षि, भौम, भीषण इसतरह दूसरे भी पुत्र थे, उन सबों में सबसे गुणवान् बाण था॥४४॥। उसकी एक हजार भुजाएँ थी तथा सभी प्रकार के अखों में वह निपुण था । उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर शङ्करजी उसकी नगरी में निवास करते थे ॥४५॥ वह शङ्करजी के साथ रहने के कारण महाकालत्व की पदवी प्राप्त किए था । हिरण्याक्ष के पुत्र अन्धक ॥४६॥ भूतसंतापन, तथा महानाग थे । इन पुत्रों के पुत्रों की संख्या सतहत्तर करोड़ थी ॥४७॥ वे सभी महाबलवान्, महाकाय (विशाल शरीर वाले) अनेक रूप वाले, तथा महाओजस्वी थे दनु से कश्यप महर्षि को वरदान से दृप्त बने हुए सौ पुत्र हुए ॥४८॥। इन सबों में महाबली विप्रचित्ति प्रधान था । द्विरष्टमूर्धा (सोलह शिरों वाला) शकुनि, शङ्कुशिरा, ॥४९॥ अयोमुख, शम्बर, कपिल, वामन, मरीचि, मागध, हरि,
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