Srishti Khanda Extracted Page 74

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-74

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

मरुत्वत्यां मरुत्वंतो वसोस्तु वसवस्तथा । भानोस्तु भानवोजाता मूहूर्ताया मुहूर्तजा:॥१८॥ लंबायां घोषनामानो नागवीथीतु जामिजा । परथिवीतलसंभूतमरुघत्यामजायत ॥१९॥ संकल्पायास्तु संकल्पा वसुसृष्टिनिधारय । ज्योतिष्मंतश्च ये देवा व्यापकाः सर्वतो दिशम् ॥२०॥ वसवस्ते समाख्यातास्तेषां नामानि मे श्ृणु। आपो ध्चुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलो नलः ॥२९॥ ् रत्यूषश्चप्रभासश्च वसवोष्टौ प्रकीर्तिताः । आपस्य पुत्राश्चत्वारः श्रांतो वैतण्ड एव च ॥२२॥ अपि शांतो मुनिर्वभुर्यज्ञरक्षाधिकारिणः। ध्रुवस्य कालः पुत्रस्तु वर्चाः सोमादजायत॥२३॥ द्रविणो हव्यवाहश्च धरपुत्राविमौ स्मृतौ । कल्पांतस्थस्ततःप्राणे रमणः शिशिरोपि च ॥२४॥ मनोहरो धवश्चाथ शिवो वाथ हरेः सुताः । शिवोमनोजवं पुत्रमविज्ञातगतिप्रदम् ॥२५॥ अवाप चानलः पुत्रानम्निप्रायगुणांस्ततः । तत्र शाखो विशाखश्च निगमेषु स्वयंभुवः ॥२६॥ अपत्यंकृत्तिकानां च कार्तिकेयस्ततः स्मृतः । प्रत्यूषस्य ऋभुःपुत्रो मुनिर्नामाथ देवलः ॥२७॥ विश्वकर्मा प्रभासस्य पुत्रः शिल्पी प्रजापतिः । प्रसादभवनोद्यानप्रतिमाभूषणादिषु ॥२८॥ तटाकारामकूपेषु त्रिदशानां च वरद्ध॑किः । अजैकपादहिर्बुध्न्यो विरूपाक्षोथ रैवतः ॥२९॥ हरश्च बहुरूपश्च त््यंबकश्च॒ सुरेश्वरः। सावित्रश्च जयंतश्च पिनाकी चापराजितः ॥३०॥ एते रुद्रास्समाख्याता एकादशगणेश्वराः । एतेषां मानसानां तु त्रिशूलवरधारिणाम् ॥३१॥ कोट्यश्चतुरशीतिस्तु तत्पुत्राश्चाक्षया मताः । दिक्षु सर्वासु ये रक्षां प्रकुर्वनति गणेश्वराः ॥३२॥ एते वै पुत्रपौत्राश्च सुरभीगर्भसंभवाः । कश्यपस्य प्रवक्ष्यामि पुत्रपौत्रादिपत्मिषु ॥३३॥ विश्वेदेव, विश्वा के पुत्र है, साध्या ने साध्यगणों को जन्म दिया ॥१७॥ मरुत्वती ने मरुत्वानों को उत्पन्न किया, और वसुगण वसु के पुत्र हैं । भानु नामक पत्नी के पुत्र भानुगण (आदित्यगण) हैं और मूहुर्ता के पुत्र मुहूर्त हैं ॥१८॥ लम्बा के पुत्रों का नाम घोष है और जामि के पुत्र नागवीथी हैं । पृथिवी पर उत्पन्न होने वाले सभी प्राणी अरुन्धती के पुत्र हैं ॥१९॥ सङ्कल्पा के पुत्र सङ्कल्प है, अब वसुओं की सृष्टि को सुनो । सभी दिशाओं में व्याप्त ज्योति सम्पन्न जितने देवता हैं ॥२०॥ वे वसुगण कहलाते हैं । उन वसुओं का नाम सुनो । आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल ॥२१॥ प्रत्यूष तथा प्रभास ये आठ वसु कहे गये हैं । आप के चार पुत्र हैं श्रान्त, वैतण्ड ॥२२॥ शान्त तथा बभरुमुनि ये यज्ञ की रक्षा के अधिकारी हैं । ध्रुव के पुत्र काल हैं, सोम के पुत्र वर्चा हें ॥२३॥ धर के ये दो पुत्र बतलाये गये है द्रविण और हव्यवाह । अनिल के तीन पुत्र हुए प्राण, रमण और शिशिर ॥२४॥ हरि के मनोहर, धव, तथा शिव नामक पुत्र हैं । शिव के पुत्र मन के समान बेगवान तथा अविज्ञात गति को प्रदान करने वाले हैं॥२५॥ अनल ने अग्नि के समान गुणों वाले अनेक पुत्रों को प्राप्त किया । उनमें शाख, विशाख, निगमेषु तथा स्वयम्भु प्रधान हैं ॥२६॥ कृतिकाओं के गर्भ से अनल के कार्तिकेय नामक पुत्र हुए । प्रत्यूष के ऋभु नाम वाले देवल मुनि पुत्र हुए ॥२७॥ प्रभास के पुत्र विश्वकर्मा हैं । ये देवताओं के शिल्पी प्रजापति हैं । देवताओं के प्रासाद, भवन, उद्यान, प्रतिमा, भूषण, तड़ाग, उद्यान तथा कूप बनाने वाले वर्धकी (बढई) का काम करते हैं । अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, सुरेश्वर, त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी तथा अपराजित ॥३०॥ ये गणों के स्वामी एकादश रुद्र हैं । ये ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं, श्रेष्ठ त्रिशूल को धारण करते है ॥३ १॥ इनके चौरासी करोड़ पुत्र हैं जो अक्षय हैं । ये गणेश्वर सभी दिशाओं में रहकर रक्षा करने का काम करते हैं ॥३२॥ ये सभी पुत्र पौत्र, सुरभि के गर्भ से उत्पन्न हुए हें । अब मैं कश्यप महर्षि की पत्नियों में उत्पन्न होने वाले पुत्र-पौत्रो का वर्णन

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know