Srishti Khanda Extracted Page 73
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-73
Sanskrit Original
यथा ससर्ज चैवासो तथैव शृणु कौरव। यदा तु सृजतस्तस्य देवर्षिगणपन्नगान्॥३॥ न वृद्धिमगमल्लोकस्तदा मैथुनयोगतः । दक्षः पुत्रसहस्राणि तदासिक्ऋयामजीजनत् ॥४॥ तांस्तु दृष्ट्वा महाभगान् सिसृक्षून्विविधाःप्रजाः। नारदःप्राह हर्यश्चान् दक्षपुत्रान् समागतान् ॥५॥ भुवःप्रमाणं सर्व तु ज्ञात्वोर्ध्वमध एव वा। ततः सृष्टि विशेषेण कुरुध्वमृषिसत्तमाः ॥६॥ ते तु तद्कचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतो दिशम्। अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रादिवसिंधवः ॥७॥ हर्यश्वेषु प्रणष्टेषु पुनर्दक्षःप्रजापतिः । वीरिण्यामेव पुत्राणां सहस््रमसृजत्प्रभुः ॥८॥ शबलाश्चा नाम ते च समेताः सृष्टिकर्मणि । नारदोनुगतान्प्राह पुनस्तान्पूर्ववन्मुनिः ॥९॥ भुवःप्रमाणं सर्व तु ज्ञात्वा भ्रातृनथो पुनः । आगत्य च पुनः सृष्टिं करिष्यथ विशेषतः ॥१०॥ तेऽपि तेनैव मार्गेण जम्मुभ्रात्रनुगास्तदा । ततःप्रभृति न भ्रातुःकनीयान्मार्गमिच्छति॥११॥ अन्वेष्टा दुःखमाप्नोति तेन तत्परिवर्जयेत् । ततस्तेष्वपि नष्टेषु षष्टिं कन्याः प्रजापतिः ॥९२॥ वीरिण्यां जनयामास दक्षःप्राचेतसस्तदा। प्रादात्स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश॥१३॥ विंशतिं सप्तसोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने । द्वे चैव भृगुपुत्राय द्वेकृशाश्चाय धीमते ॥१४॥ द्वे चैवांगिरसे प्रादात्तासां नामानि विस्तरात् । शृणु त्वं देवमातृणां प्रजाविस्तरमादितः ॥१५॥ अरुंधती वसुर्जामिलम्बा भानुर्मरुत्वती संकल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिनी ॥१६॥ घर्मपत्न्य: समाख्यातास्तासां पुत्रान्निबोध मे। विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्यासाध्यानजीजनत् ॥१७॥ सुनो । जब देवताओं, ऋषियों तथा सर्पो की सृष्टि से ब्रह्माजी की सृष्टि की वृद्धि नहीं हुयी तो दक्ष ने मैथुन के द्वारा अपनी पत्नी अशिक्नी के गर्भ से हजारों पुत्रों को उत्पन्न किया ॥३-४॥ उन सबों को अनेक प्रकार की प्रजाओं की सृष्टि करने के इच्छुक देखकर आये हुए दक्ष के हर्यश्च नामक पुत्रों से नारदजी ने कहा ॥५॥ हे श्रेष्ठ ऋषियों ! पृथिवी के ऊपर, नीचे के सम्पूर्ण विस्तार को जानकर के ही आपलोग सृष्टि करें ॥६॥ नारदजी की बाणी को सुनकर वे (हर्यश्व) पृथिवी के प्रमाण का पता लगाने के लिए विभिन्न दिशाओं में चले गये और वे सब आज तक उसी प्रकार नहीं लौटे जिस तरह समुद्र में मिल जाने के बाद नदियाँ नहीं लौटती हैं ॥७॥ हर्यश्वों के विनष्ट हो जाने पर दक्ष प्रजापति ने वीरिणी के गर्भ से हजारों पुत्रो को उत्पन्न किया ॥८। उन शबलश्वों को भी सृष्टि कर्म में व्यापृत देखकर नारद मुनि ने अपना अनुसरण करने वाले उन सबों से भी पहले के ही समान कहा ॥९॥ उन्होंने कहा कि पहले तुमलोग पृथिवी के सम्पूर्ण प्रमाण का पता लगा लो; फिर आकर विशेष रूप से सृष्टि करना ॥१०॥ इसके बाद अपने भाइयों का अनुसरण करने वाले वे शबलाश्व भी उसी मार्ग से चले गये । उसी समय से छोटा भाई बड़े भाई के मार्ग का अनुसरण नही करता है ॥११॥ उनका अनुसरण करने वाला दु:ख प्राप्त करता है । अतएव उसका परित्याग कर देना चाहिए । उसके बाद उन सबों के भी नष्ट हो जाने पर दक्ष प्रजापति ने ॥१२॥ वीरिणी के गर्भ से साठ कन्याओं तथा प्रचेताओं को उत्पन्न किया । उनमें से दक्ष ने सत्रह कन्याओं का विवाह धर्म से कर दिया और तेरह कन्याओं का विवाह कश्यप महर्षि से किया ॥१३॥ सत्ताइस कन्याओं को उन्होंने चन्द्रमा को दिया तथा चार कन्याओं को अरिष्टनेमि को दिया; उन्होंने अपनी दो पुत्रियों का विवाह भृगु महर्षि के पुत्र से किया और तथा दो का विवाह कृशाश्व से किया ॥१४॥ उसके बाद दो पुत्रियों का विवाह उन्होंने अङ्गिरा महर्षि से किया । उन सबों का विस्तार से वर्णन सुनो । देव माताओं की प्रजाओं का विस्तार आदि मुझसे सुनो ॥१५॥ अरुन्धती, वसु, जामि, लम्बा, भानु, मरुत्वती, सङ्कल्पा, मुहूर्ता साध्या तथा विश्वा ये धर्म की दश पत्नियाँ हैं ॥१६।। अब इनके पुत्रों का नाम सुनो
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