Srishti Khanda Extracted Page 71
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-71
Sanskrit Original
श्रीपद्यमहापुरण शुलासिपड्िशधरैः परशुप्रासहस्तकैः । वञ्रक्रकचकोदंडकालदंडास्रपाणिभिः ॥७७॥ गणेश्वरैः सुदुर्जषैर्वृतः सूर्योग्रहेरिव । देवदेवमहादेव नष्टो यज्ञो दिवं गतः ॥७८॥ मृगरूपधरो भूत्वा भयभीतस्तु शंकर | नम:शद्भाभदेवाय सगणय सनंदिने ॥७९॥ वृषासनाय सोमाय क्रतुकालांतकाय च । नमोदिक्चर्मवस्त्राय नमस्ते तीव्रतेजसे ॥८ ०॥ ब्रह्मणे ब्रह्मदेहाय ब्रह्मण्यायामिताय च । गिरीशाय सुरेशाय ईशानाय नमो नम: ॥८ १॥ रुद्राय प्रतिवज्राय शिवाय क्रथनाय च । सुरासुराधिपतये यतीनां पतये नमः ॥८ २॥ धूग्रोमाय विरूपाय यज्वने घोररूपिणे । विरूपाक्षाशुभाक्षाय सहस्राक्षाय वै नम: ॥८३॥ मुंडाय चंडमुण्डाय वरखट्वाङ्गधारिणे । कव्यरूपाय हव्याय सर्वसंहारिणे नमः ॥८३॥ भक्तानुकंपिनेत्यर्थ रुद्रजाप्यस्तुतायच । विरूपाय सुरूपाय रूपाणां शतकारिणे ॥८४॥ पंचास्याय शुभास्याय चंद्रास्याय नमो नमः । वरदाय वराहाय कूर्माय च मृगाय च॥८५॥ लोलालकशिखंडाय कमंडलुधराय च । विश्वनाम्रेय विश्वाय विश्वेशाय नमो नमः ॥८६॥ त्रिनेत्र त्राणमस्माकं त्रिपुरघ्न विधीयतां । वाङ्मनः कायभावैस्तु प्रपन्नस्य महेश्वर ॥८७॥ एवस्तुतस्तदा देवोदक्षेणापन्नदेहिना । दिव्येनानेन स्तोत्रेण भ्रृशमाराधितस्तदा ॥८८॥ समग्रं ते यज्ञफलं मया दत्तं प्रजापते । सर्वकामप्रसिद्यर्थं फलं प्राप्स्यस्यनुत्तमम् ॥८९॥ कान्ति वाले, चित्र-विचित्र वस्त्र धारण करने वाले, घोर भयङ्कर ध्वनि करने वाले ॥७५॥ मृग,बाध तथा सिंह के समान बोलने वाले, तरक्षु के चमड़े को धारण करने वाले, सर्पो को हार, कङ्गन और यज्ञोपवीत बनाने वाले ॥७६॥ त्रिशूल, कृपाण, पट्टिस को धारण करने वाले, हाथ में फरसा तथा प्रास लेने वाले, अपने हाथ में वज्र, क्रकच (आरी) को, दण्ड (धनुष) तथा कालदण्ड नामक अखों को धारण करने वाले ॥७७॥ ग्रहों से घिरे हुए सूर्य के समान अत्यन्त दुद्ध्षगणों तथा गणेश्वरों से घिरा हुआ, नष्ट होकर यज्ञ भयभीत तथा मृग का रूप धारण करके स्वर्ग लोक में चला गया । शङ्क के समान कान्ति वाले, गणों था नंदी से युक्त देव शिव को नमस्कार है ॥७९॥ वृष पर बैठने वाले सोमस्वरूप, क्रतु तथा काल को विनष्ट करने वाले, दिगम्बर, चर्माम्बर तथा तीन्र तेज से युक्त आपको नमस्कार है ॥८०॥ ब्राह्मण, ब्रह्म शरीरक, ब्रह्मण्य (ब्राह्मणों के भक्त) तथा अमेय, गिरीश, सुरेश तथा ईशान को बारम्बार नमस्कार है ॥८ १॥ रुद्र, दूसरे वज्र के समान, शिव क्रथन स्वरूप देवों तथा असुरों के स्वामी तथा यतियों के स्वामी आपको नमस्कार है ॥८२॥ हे धूम्र, उग्र, विरूप, यज्वा, घोर रूप वाले, विरूपाक्ष, अशुभाक्ष, तथा सहस्राक्ष आपको नमस्कार है ॥८३॥ हे मुण्ड, चण्डमुण्ड, श्रेष्ठ खट्वाङ्ग धारण करने वाले कव्य तथा हव्य स्वरूप एवं सबों का संहार करने वाले भगवन् शिव आपको नमस्कार हैं ॥८३॥ भक्तों पर अत्यधिक अनुकम्पा करने वाले तथा रुद्र जप्य के द्वारा जिनकी स्तुति की जाती हैं, विरूप, सुरूप तथा सैकड़ों रूपों को धारण करने वाले आपको नमस्कार है ॥८४॥ पञ्चास्य (पाँच मुख वाले) शुभास्य (सुन्दर मुख वाले) तथा चन्द्रास्य (चन्द्रमा के समान आह्वादक मुख वाले) आपको बारम्बार नमस्कार है । वर देने वाले वरार्ह, कूर्मरूप धारी तथा मृगरूपधारी शिव को नमस्कार है ॥८५॥ चंचल केश तथा शिखण्डक वाले, कमण्डलु धारण करने वाले, सभी नामों वाले, विश्व स्वरूप एवं विश्वेश आपको नमस्कार है ॥८६॥ हे त्रिनेत्र ! हे त्रिपुरघ्न आप हमारी रक्षा कीजिये । हे महेश्वर ! मैं वाणी, मन तथा शरीर से आपके शरण में आया हूँ ॥८७॥ इस तरह से शरणागत दक्ष के द्वारा स्तुति किए जाने पर इस दिव्य स्तोत्र के द्वार अत्यधिक आराधित ॥८८॥ शङ्करजी ने कहा-- हे प्रजापते ! में आपको यज्ञ का समग्र फल प्रदान करता हुँ ।
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