Srishti Khanda Extracted Page 70

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-70

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Sanskrit Original

सत्येन तेन ते यज्ञं विध्वंसयतु शंकर: । यद्यस्ति मे तपः किंचित्कश्चिद्धर्मोथवा कृतः ॥६१॥ फलेन तस्य धर्मस्य यज्ञस्ते नाशमर्हति। प्रियाहं यादि देवस्य यदि मां तारयिष्यति ॥६२॥ तेन सत्येन ते गर्वः समाप्तिमभिगच्छतु। इत्युक्त्वा योगमास्थाय स्वदेहस्थेन तेजसा ॥६३॥ निर्ददाह तदात्मानं स देवासुरपन्नगैः । किं किमेतदिति प्रोक्ते गंधर्वगणगुह्यकैः ॥६४॥ गंगाकूले तदा मुक्तो देहो वै क्रुद्धया तया । सौनकं नामतत्तीर्थ गंगायाःपश्चिमे तटे॥६५॥ रत्वा रुद्रस्तु तद्वार्ता पत्या नाशं सुदुःखितः । हंतुं यज्ञं धीरभवत् देवानामिह पश्यताम् ॥६६॥ गणकोटिःसमादिष्टा ग्रहा वै नायकास्तथा । भूतप्रेतपिशाचाश्च दक्षयज्ञविनाशने ॥६७॥ तैर्गत्वा विबुधा स्सर्वे यज्ञे निर्जित्य नाशिताः । हते यज्ञे तदा दक्षोनिरुत्साहो निरुद्यमः ॥६८॥ उपगम्याब्रवीत्त्रस्तो देवदेवं पिनाकिनम् । न ज्ञातोसि मया देव देवानां प्रभुरीश्वरः ॥६९॥ त्वमस्य जगतोधीशः सुरास्सर्वे त्वया जिताः । कृपां कुरु महेशान गणान्सर्वान्निवर्त्तय।;७ ०॥ गणैर्नानाविैर्घोरैर्नानाभूषण भूषितैः । नानावदनदंतौष्ठैर्नानाप्रहरणोद्यतैः ॥७१॥ नानानागेंद्रसंदष्टजटाभारोपशोभितैः । सुदूढोन्द्वतदर्पाढ्यैघोरैर्घोरनिघातिभिः ॥\७२॥ कामरूपैरकांतैश्च सवकामसमन्वितैः । अनिवार्यबलैश्चोग्रैयोगिभिर्योगगामिभिः ॥७३॥ व्यालोलके सरजटैर्दष््रोत्कटहसन्मुखैः । करींद्रकरटाटोपपाटवैः सिंहदेहिभिः ॥७४॥ केचित्परमदाघ्राणधूर्णद्दीपसमप्रभैः । विचित्रचित्रवसनैद्वीरधीररवादिभिः ॥७५॥ मृगव्याघ्रसिंहरुतैस्तरक्ष्वजिनधारिभिः । भुजंगहारवलयकृतयज्ञोपवीतकैः ॥७६॥ अथवा मैंने कोई धर्म किया है ॥६०-६१॥ उस धर्म के फल रूप से तुम्हारे यज्ञ का नाश हो जाय । यदि मैं शिव की प्रिया हूँ, यदि वे मेरा उद्धार करेंगे ॥६२॥ तो उसी सत्य से तुम्हारे गर्व का नाश हो जाय । इसतरह से कहकर योग को अपनाकर, अपने शरीर में विद्यमान तेज के द्वार ॥६३॥ सती ने अपने शरीर को भस्म कर दिया । उस समय, देवता, असुर, पन्नग, गन्धर्व तथा गुह्यकों ने कहा यह क्या हो गया ॥६४।। उस समय सती ने क्रुद्ध होकर गङ्गा तट में अपने शरीर का त्याग कर दिया । वह गङ्गा के पश्चिम तट पर सौनक नामक तीर्थ विद्यमान है ॥६५॥ उस समाचार को सुनकर तथा अपनी पत्नी का नाश हो जाने से रुद्र अत्यन्त दुःखी हुए । देवताओं के समक्ष ही उन्होंने यज्ञ को विध्वस्त करने का निश्चय किया ॥६६॥ उन्होंने करोड़ों गणों, वेनायक ग्रहों, भूतों, प्रेतों तथा पिशाचों को दक्ष के यज्ञ को विध्वस्त करने का आदेश दिया ॥६७॥ उन सबों ने जाकर देवताओं को जीतकर यज्ञ को विध्वस्त कर दिया । यज्ञ का विध्वंस हो जाने पर दक्ष उद्योग रहित और उत्साह रहित हो गये ॥६८॥ वे भयभीत होकर भगवान् शङ्कर के पास जाकर कहे हे देव ! मैंने नही जाना था कि आप देवताओं के स्वामी और ईश्वर है॥६९॥ इस जगत् के स्वामी हैं, आपने सभी देवताओं को परास्त कर दिया । हे महेश ! आप कृपा करें, अपने गणों को रोकें ॥७०॥ हे शङ्कर ! अनेक प्रकार के भयङ्कर तथा अनेक प्रकार के भूषणों से भूषित, अनेक प्रकार के मुख, दाँत तथा ओष्ठ वाले, अनेक प्रकार के आयुधों को धारण करने वाले ॥७१॥ अनेक सर्पराजों से बंधे जटाओं से सुशोभित सुदृढ तथा उद्धत गर्व (अभिमान) से युक्त, भयङ्कर तथा घोर प्रहार करने वाले ॥७२॥ अपनी इच्छा के अनुसार शरीर धारण करने वाले, कान्ति रहित, सभी कामनाओं से युक्त, दुर्द्धथ बल से सम्पन्न उग्र, योगी तथा योग पथ पर चलने वाले ॥७३॥ चञ्जल केसरों से युक्त जटा वाले, उत्कट दाँत वाले और हँसते हुए मुख वाले, गजराजों. की गालों को फाड डालने वाले सिंह के शरीर वाले ॥७४॥ कुछ दूसरों के मद को सूंघकर बूझते हुए दीप के समान

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