Srishti Khanda Extracted Page 69

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-69

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Sanskrit Original

डड श्रीपदामहापुराण नात्र मन्युस्त्वया कार्य: सर्वः स्वं भागमर्हति। अन्यजन्मनि यैर्यादृक्कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥४६॥ | इह जन्मनि ते तादृक्युत्रिके भुंजते फलम् । परितापं माकृथास्त्वं फलं भुंक्ष पुरा कृतम्॥४७॥ श्रियं परगतां दृष्ट्वा रूपसौभाग्यशोभनाम् । रूपं च कांति सौभाग्यं रम्याण्याभरणानि च ॥४८॥ कुले महति वै जन्म वपुश्चातीव सुंदरम्। पूर्वभाग्यैस्तुलभ्यंते नरैरेतानि सुव्रते ॥४९॥ मात्मानं परिनिंदेथा मा च भाग्यानि सुव्रते। फलं चैवं विधिकृतं दातुं कस्य तु कः क्षमः ॥५०॥ नास्ति वै वलवान्कश्चिन्नमूर्खो न च पंडितः। पाडित्यं च बलं चैव जायते पूर्वकर्मणः ॥५९॥ एते देवा दिवं प्राप्ताः शोभमानाः स्थिताश्चिरम्। पुण्येन तपसा चैव क्षेत्रेषु विविधेषु च॥५२॥ यदेभिरर्जितं पुण्यं तस्यैते फलभागिनः । एवमुक्ता ततः सा तु सती भीष्म रूषान्विता ॥५३॥ विनिंदमाना पितरं क्रोधेनारुणितेक्षणा । एवमेतद्यथा तात त्वया चोक्तं ममाग्रतः ॥५४॥ सवों जनः पुण्यभागी पुण्येन लभते श्रियम् । पुण्येन लभते जन्म पुण्ये भोगाः प्रतिष्ठिताः ॥५५॥ तदयं जगतामीशः सर्वेषामुत्तमोत्तमः । स्थानान्येतानि सर्वेषां दत्तान्येतेन धीमता ॥५६॥ ये गुणास्तस्य देवस्य वक्तुं जिह्वापि वेधसः। न शक्ता ख्यापने तस्य देवस्य परमेष्ठिनः॥५७॥ भस्मास्थि च कपालानि श्मशाने वसतिस्तथा । गोनसद्याश्च ये सर्पाः सर्वे ते भूषणीकृताः ॥५८॥ भूतप्रेतागणास्तस्य पिशाचा गुह्यकास्तथा । एष धाता विधाता च एष पालयिता दिशः ॥५९॥ प्रसादेन च रुद्रस्य प्राप्तस्वर्गः पुरंदरः । यदि रुद्रेस्ति देवत्वं यदि सर्वगतःशिवः ॥६०॥ शके ७ स सस सेक्सचा तण पणत्या तुम्हारे साथ तुम्हारे पति का मैं सबसे अधिक सत्कार करूँगा । मैंने लज्जा का सारा कारण तुम्हें बतला दिया ॥४४-४५॥ इससे तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिए, सबलोग अपना भाग प्राप्त करते हैं । पूर्वजन्म में जिसने जैसा पुण्य अथवा पाप कर्म किया है ॥४६॥ हे पुत्रि ! इस जन्म में वे लोग वैसा ही फल भोगते हैं । तुम शोक मत करे पूर्वकृत कर्मो | का तुम फल भोगो ॥४७॥ हे सुब्रते ! दूसरे की सम्पत्ति को देखकर, अथवा सुन्दर सौभाग्य को देखकर, रूप, | कान्ति, सौभाग्य, मनोहर आभरण, महान वंश में जन्म, सुन्दर शरीर ये सब पूर्व जन्म के भाग्य से ही मनुष्यों को | प्राप्त होते हैं ॥४८-४२॥ हे सुव्रते ! तुम न तो अपनी निन्दा करो और न तो अपने भाग्य की निन्दा कणे । फल तो भाग्यवशात् मिलता है, कौन किसको क्या दे सकता है ?॥५०॥ न तो कोई बलवान है, न मूर्ख हैं और न पण्डित हैं, बल, पाण्डित्य इत्यादि तो पूर्वजन्म के कर्म के फल हैं ॥५१॥ ये देव अनेक क्षेत्रों में जाकर तपस्या तथा पुण्य के रूप से स्वर्ग में जाकर सुशोभित हो रहे हैं ॥५२॥ इन लोगो ने जो पुण्य कमाया उसका ये फल भोग रहे हें । इसतरह से कहे जाने पर भयङ्कर क्रोध से युक्त सती ॥५३॥ आँखें लाल करके अपने पिता की निन्दा करती हुयी कहीं-- पिताजी आपने मेरे सामने यह जो कहा है ॥५४॥ कि सभी लोग अपने पुण्य के भागी होते हैं, और पुण्य से ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं । पुण्य से जन्म प्राप्त करते हैं, पुण्य में ही भोग स्थित है ॥५५॥ भगवान् शङ्कर तो संसार के स्वामी है । सबों से उत्तमोत्तम हैं । इन्होंने ही इन सबों को समस्त स्थानों को प्रदान किया है ॥५६॥ भगवान् शिव के जिन गुणों का वर्णन न तो ब्रह्मा की जिह्वा कर सकती है और न तो ब्रह्माजी स्वयं उसका वर्णन कर सकते हें ॥५७॥ उन्होंने भस्म, अस्थि, कपाल, श्मशान में निवास, गोनस आदि सर्प को भूषण बनाया है॥५८॥ भूत, प्रेत, पिशाच तथा गुह्यक ये सबके सब उनके गण हैं । ये (भगवान् शिव) ही धाता, विधाता और दिशाओं के पालक हैं ॥५९॥ रुद्र की ही कृपा से इन्द्र ने स्वर्ग लोक को प्राप्त किया । यदि रुद्र में देवत्व है, यदि शिव सर्व हैं, सर्वव्यापक हैं तो इसी सत्य के द्वारा शिव तुम्हारे यज्ञ का विध्वंस कर दें । यदि मेरी कोई तपस्या है, जि,

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