Srishti Khanda Extracted Page 68

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-68

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

आमंत्रणा मंत्रितानां सर्वेषां मानना कृता । एक एवात्रभगवान्पतिर्में न समागतः ॥३१॥ विना तेन त्विदं सर्व शून्यवत््तिभाति मे। मन्ये चाहं तु भवता पतिर्मे न निमंत्रित: ॥३२॥ पुलस्त्य उवाच विस्मृतस्ते भवेन्नूनं सर्व शंसतु मे भवान्। तस्यास्तदुक्तं वचनं श्रुत्वा दक्षःप्रजापति ॥३३॥ पतिस्नेहसमायुक्तां प्राणेभ्योपि गरीयसीम् । अंकमारोप्य तां बालां साध्वीं पतिपरायणाम्॥३४॥ पतिव्रतां महाभागां पतिप्रियहितैषिणीम् । प्राह गंभीरभावेन शृणु वत्से यथातथम्॥३५॥ येनाद्य कारणेनेह पतिस्ते न निमंत्रित: । कपालपात्रधृक्चर्मी भस्मावृततनुस्तथा ॥३६॥ शूली मुण्डी च नग्नश्च शमशाने रमते सदा। विभूत्याङ्गानि सर्वाणि परिमार््टि च नित्यशः ॥३७॥ व्याघ्रचर्मपरीधानो हस्तिचर्मपरिच्छदः । कपालमालां शिरसि खट्वागं च करे स्थितम् ॥३८॥ कट्यां वै गोनसं बध्वा लिंगेऽस्थ्नां वलयं तथा। पन्नगानां तु राजानमुपवीतं च वासुकिम् ॥३९॥ कृत्वा भ्रमति चानेन रूपेण सततं क्षितौ। नग्ना गणाः पिशाचाश्च भूतसंघा ह्यनेकशः ॥४०॥ त्रिनेत्रश्न त्रिशूली च गीतत्ृत्यरतस्सदा। कुत्सितानि तथान्यानि सदा तेकुरुते पतिः ॥४९॥ त्रपाकरोभवेन्महां देवानां संनिधिःकथं । कीदूक्च वसनं तस्य केतनं प्रतिनार्हति ॥४२॥ एतैदोषिर्मया वत्से लोकानां चैव लज्जया । नाह्वानं तु कृतं तस्य कारणेन मया सुते ॥४३॥ यज्ञस्यास्य समाप्तौ तु पूजां कृत्वा त्वया सह । आनीय तव भत्तरिं त्वयासह त्रिलोचनम् ॥४४॥ त्रैलोक्यस्याधिकां पूजां करिष्यामि च सत्कृतैः। एतत्ते सर्वमाख्यातं त्रपायाः कारणं महत् ॥४५॥ एवं पति भी ॥२९॥ अपनी पत्नियों, पुत्रों तथा बान्थवो साथ यहाँ आये हैं, और उन सबों को आपने दान, मान तथा परिग्रह के द्वारा सम्मान किया है ॥३०॥ आपने उन सबों का आमन्त्रण तथा विचारों के द्वारा सम्मान किया है, केवल मेरे पति ही यहाँ नहीं आये हैं ॥३१॥ उनके बिना मुझको यह सब कुछ शून्य के समान प्रतीत होता है । लगता है कि आपने मुझे तथा मेरे पति को निमन्त्रित नहीं किया है ॥३२॥ लगता है आप भूल गये, इन सारी बातों को आप मुझे बतलायें । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- सती की बातों को सुनकर दक्षप्रजापति ने ॥३३॥ पति के प्रेम से युक्त तथा अपने प्राणों से भी प्रिय, पतिभक्ता सती को अपनी गोद में बैठाया ॥३४॥ पतिव्रता, महाभागा तथा पति का कल्याण चाहने वली सती से उन्होंने गम्भीर वाणी में कहा-- हे वत्से ! तुम्हें वास्तविक स्थिति मैं बतलाता हूँ॥३५॥ जिस कारण में मैने तुम्हारे पति को नहीं निमन्त्रित किया है उसे सुनो । वे कपाल पात्र को धारण करते हैं, चमड़ा ओढते हैं, शरीर में चिता का भस्म लपेटते हैं ॥३६॥ त्रिशूल और मुण्डों की माला को धारण करते हैं, नङ्गे रहते हें तथा श्मशान में निवास करते हैं । सदा वे भस्म को अपने अङ्घों में मलते है ॥३७॥ व्याघ्र के चर्म को पहनते हैं और हाथी के चमड़े को ओढते हैं । शिर पर कपालों की माला धारण करते हैं और हाथ में खट्वाङ्ग धारण करते हैं ॥३८॥ वे कमर में गोनस बाँधकर अपने लिङ्ग में हड्डी का कंकण लगाते हैं । वे सपो के राजा वासुकि का यज्ञोपवीत धारण करते हैं ॥३९॥ वे इसी रूप में सदा पृथिवी पर घूमते रहते हैं उनके गणों में बहुत से पिशाच तथा भूतों का समुदाय रहता है ॥४०॥ वे तीन नेत्र वाले त्रिशूल धारण करने वाले, नृत्यगीत परायण हैं । तुम्हारे पति सदा निन्दित कर्म करते रहते हैं ॥४१॥ यह देवताओं के सन्निकट मेरे लिए अत्यधिक लज्जास्पद है । उनका वस्र और घर कैसा है ॥४२॥ हे वत्से ! इन्हीं दोषों तथा लोकलज्जा के कारण ही मैंने तुम्हारे पति को नहीं निमन्त्रित किया ।।४३॥ इस यज्ञ के समाप्त हो जाने पर तुम्हारे साथ उनका पूजन करके, तुम्हारे पति को बुलाकर

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know