Srishti Khanda Extracted Page 67
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-67
Sanskrit Original
डरे श्रीपद्ममहापुराण यादसां च पतिर्देवो वरुणो लोकभावनः । गौर्य्या पत्न्या सहायातः प्रचेता मंडपेत्विह ॥१४॥ सर्वयक्षाधिपो देवः पुत्रोविश्रवसो मुनेः । पत्न्या त्विह समायातः सह देव्या धनाधिपः ॥९५॥ मुखं यः सर्वदेवानां जंतूनामुदरे स्थितः । वेदा यदर्थमुत्पन्नास्सोयं यज्ञमुपागतः ॥१६॥ निऋती राक्षसेन्द्रोऽसौ दिकपतित्वे नियोजितः । स॒ च त्विहागतस्तात पत्या सार्द्ध क्रताविह॥१७॥ आयुःप्रदो जगत्यस्मिन्बह्मणा निर्मितः पुरा । प्राणोपानो व्यान उदानस्समानाह्वयस्तथा॥१८॥ एकोनपंचाशत्केन गणेन परिवारितः। यज्ञे प्रजापतिश्चासौ वायुर्देव: समागतः ॥९९॥ द्वादशात्मा ग्रहाध्यक्षः चक्षुषी जगतस्विह । पाति वै भुवनं सर्व देवानां यः परायणः ॥२०॥ आयुषश्च वनानां च दिवसानां पति हि यः । संज्ञापतिरिहायातो भास्करो लोकपावनः ॥२९॥ अत्रिवंशसमुद्धतो द्विजराजो महायशाः । नयनानंदजननो लोकनाथो धरातले ॥२२॥ ओषधीनां पतिश्चापि वीरुधामपि सर्वशः। उडुनाथः सपत्नीक इहायातः शशी तव ॥२३॥ वसवोष्टौ समायाता अश्विनौ च समागतौ । वृक्षो वनस्पतिश्चापि गन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥२४॥ विद्याधरा भूतसंघा बेताला यक्षराक्षसाः । पिशाचाश्चोग्रकर्माणस्तथान्ये जीवहारका: ॥२५॥ नद्यो नदाः समुद्राश्च द्वीपाश्च सह पर्वतैः। ग्राम्यारण्याश्ष पशवो यदिङ्गं यच्चनेङ्गति॥२६॥ कश्यपो भगवानत्रिर्वसिष्टश्चापरैःसह । पुलस्त्यः पुलहश्चैव सनकाद्या महर्षयः ॥२७॥ पुण्या राजर्षयश्चैव प्रथिव्या ये च पार्थिवाः। वर्णाश्चाश्रमिणश्चैव सर्वे ये कर्मकारिणः॥२८॥ किमत्र बहुनोक्तेन ब्राह्मीसृष्टिरिहागता । भगिन्यो भागिनेयाश्च भगिनीपतयस्त्विमे ॥२९॥ स्वभार्यासहिताःसर्वे सपुत्रास्सहबांधवाः । त्वया समर्चिताःसर्वे दानमानपरिग्रहैः॥ ३ ०॥ लोक कल्याण कर्ता, वरुण तथा अपनी पत्नी गौरी के साथ प्रचेता इस मण्डप में दिखयी देते हैं ॥१४।। समस्त. यक्ष के स्वामी तथा विश्रवा मुनि के पुत्र कुबेर भी अपनी पत्नी के साथ यहाँ पर पधारे हुए हैं ॥१५॥ जो सभी देवताओं के मुख हैं जो सभी जीवों के उदर में जाठरानल रूप से रहते हैं, जिनके लिए वेदों की उत्पत्ति हुयी वे अग्नि देव भी यहाँ यज्ञ में आये हें ॥१६॥ राक्षसों के स्वामी निऋति जो दिक्पाल हैं वे भी इस यज्ञ में अपनी पत्नी के साथ दिखायी देते हैं ॥१७॥ जिन्हें प्राचीन काल में संसारियों को आयु प्रदान करने वाले रूप से ब्रह्माजी ने बनाया वे प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान एवं उनचास मरुद्गणों के साथ प्रजापति वायुदेव भी यहाँ आये हुए हैं। १८-१९॥ जो द्वादश शरीरात्मक, ग्रहों के स्वामी, संसारियो के नेत्र स्वरूप, सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करने वाले, देवताओं के आश्रयभूत, आयु वन तथा दिवस के स्वामी संसार को पवित्र करने वाले संज्ञा देवी के पति भगवान् सूर्य भी आये हैं ॥२०-२१॥ अत्रि वंश में उत्पन्न, महा यशस्वी द्विजराज, आँखों को आनन्द प्रदान करने वाले, लोक स्वामी, पृथिवी पर ओषधियों एवं वृक्षों के स्वामी, ताराओं के स्वामी चन्द्रमा भी आपके इस यज्ञ में पत्नी के साथ पधारे हैं॥२२-२३॥ आठो वसु दोनों अश्विनीकुमार, वृक्ष, वनस्पति, गन्धर्व, अप्सराओं का समूह ॥२४॥ विद्याधर, भूतों का समूह, बेताल, यक्ष, राक्षस, उग्र कर्म करने वाले पिशाच गण, तथा दूसरे प्राणाहार करने वाले ॥२५॥ नदियाँ, नद, समुद्र, द्वीप, पर्वत, ग्राम्यपशु, अरण्य पशु, जो अपने नेत्रों को खोलते हैं, तथा जो अपने नेत्रों को नहीं खोलते॥२६॥ महर्षि कश्यप, भगवान् अत्रि, वसिष्ठ महर्षि, पुलस्त्य, पुलह, सनकादिक महर्षि ॥२७॥ महान् राजर्षि गण तथा पृथिवी पर विद्यमान जो राजागण हैं वे, अपने वर्ण एवं आश्रमों का पालन करने वाले तथा जितने भी कर्म करने वाले हैं, वे सब ॥२८॥ अधिक क्या कहना है ब्रह्माजी की सारी सृष्टि, मेरी सभी बहनें तथा उनके पुत्र ES
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