Srishti Khanda Extracted Page 66

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-66

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Sanskrit Original

पाँचवाँ अध्याय भीष्य उवाच कथं सती दक्षसुता देहं त्यक्तवती शुभा। दक्षयज्ञस्तुरुद्रेण विध्वस्तः केन हेतुना ॥९॥ एतन्मे कौतुकं ब्रह्मन्कथं देवो महेश्वरः । जगामाथ क्रोधवशं त्रिपुरारिर्महायशाः ॥२॥ पुलस्त्य उवाच गंगाद्वारे पुरा भीष्म दक्षो यज्ञमथारभत् । तत्र देवासुरगणाः पितरोऽथ महर्षयः॥३॥ समाजम्पुर्मुदा युक्ताः सर्वे देवाः सवासवाः । नागा यक्षाः सुपर्णाश्च वीरुदोषधयस्तथा ॥४॥ कश्यपो भगवानत्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः। प्रचेतसोगिराश्रैव वसिष्ठश्च महातपाः ॥५॥ तत्र वेदीं समां कृत्वा चातुहोत्रे न्यवेशयत् । होता वसिष्ठस्तत्रासीदंगिराध्वर्युसत्तमः ॥६॥ बृहस्पतिरथोद्नाता ब्रह्मा वै नारदस्तथा। यज्ञकर्मप्रवृत्तौ तु हूयमानेषु चाम्निषु ॥७॥ आगता वसवःसर्वे आदित्या द्वादशैव तु । अश्विनौ मरुतश्चैव मनवश्च चतुर्दश॥८॥ एवं यज्ञे प्रवृत्ते तु हूयमानेषु चाग्निषु । विभूतिं तां परां तत्र भक्ष्यभोज्यकृतां शुभाम् ॥९॥ आलोक्य सर्वा भूमिं समंताद्दशयोजनम्। महावेदी कृता तत्र सर्वैस्तत्र समन्वितैः ॥१०॥ सर्वान् देवान् शक्रमुख्यान्य्ञे दृष्ट्वा सती शुभा। तदा सानुनयं वाक्यं प्रजापतिमभाषत ॥९९१॥ सत्युवाच ऐरावतं समारूढो देवराजः शतक्रतुः । पत्या शच्या सहायातः कृतावासः शतक्रतुः ॥१२॥ पापानां यो यमयिता धर्मेणाधर्मिणां प्रभुः। पत्याधूम्रोर्णया सार्द्धमिहायातः स दूश्यते ॥१३॥ दक्षयज्ञविध्वंस भीष्मजी ने कहा-- दक्षपुत्री, कल्याणकारिणी सती ने अपना शरीरत्याग क्यों किया ? और किसलिए रुद्र ने दक्ष के यज्ञ को विध्वस्त कर दिया 2॥१॥ मुझको यह कोतूहल है कि महायशस्वी त्रिपुरारि भगवान् शङ्कर क्यों क्रुद्ध हुए ॥२॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- हे भीष्म ! प्राचीन काल में दक्ष ने हरिद्वार में यज्ञ करना प्रारम्भ किया! उस यज्ञ में देवता, असुर, पितृगण, महर्षिगण ॥३॥ इन्द्र के साथ सभी देवता, नाग, यक्ष, पक्षी, वीरुध तथा ओषधियाँ सब के सब प्रसन्नता पूर्वक आये ॥४॥ कश्यप, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह क्रतु, प्रचेता, अङ्गिरा तथा महातपस्वी वसिष्ठ भी उस यज्ञ में आये ॥५॥ वहाँ पर समतल वेदी बनाकर चातुहोंत्र विधि से यज्ञ प्रारम्भ हुआ । उस यज्ञ में होता वसिष्ठ महर्षि थे, अध्वर्यु का कार्य महर्षि अङ्गिरा करते थे ॥६॥ उसमें बृहस्पति उद्गाता तथा नारदजी ब्रह्मा थे । यज्ञ का कार्य प्रारम्भ हुआ और अग्नियों में आहुतियाँ दी जा रही थीं ॥७॥ उस समय वसुगण, द्रादशादित्य, दोनों अश्विनीकुमार, मरुद्गण और चौदहो मनु आये ॥८॥ इस तरह से यज्ञ प्रारम्भ होने तथा अग्नियो में आहुति दिये जाते समय वहाँ पर भक्ष्य एवं भोज्य सामग्रियों के अत्यधिक ऐश्वर्य को तथा हर ओर से समतल भूमि को देखकर दश योजन विस्तृत महावेदी का निर्माण सबों ने मिलकर किया ॥९-१०॥ उस यज्ञ में इन्द्र इत्यादि सभी देवताओं को देखकर सती ने, अनुनय पूर्वक अपने पिता दक्ष प्रजापति से पूछा ॥११॥ सती ने कहा-- ऐरावत हाथी पर चढ़कर देवराज इन्द्र अपनी पत्नी के साथ यहाँ आये हैं और रह रहे हैं ॥१२॥ जो पापियों का नियमन धर्मपूर्वक करते हैं, वे यमराज अपनी पत्नी धूप्रोर्णा के साथ यहाँ आये हुए दिखायी देते हैं ॥१३॥ जलचरों के स्वामी

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