Srishti Khanda Extracted Page 64

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-64

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Sanskrit Original

गते देवे तदा विष्णौ ब्रह्मा लोकपितामहः । भूयश्चकार वै सृष्टिं लोकानां प्रभव:प्रभुः॥९९३॥ तं दृष्ट्वा नारदःप्राह वाक्यं वाक्यविदांवरः । सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ˆ ॥ सर्वव्यापी भुवः स्पर्शादध्यतिष्ठद्दशांगुलम् ॥१ १ ४॥ यद्धूतं यच्च वै भाव्यं सर्वमेव भवान्यतः। ततो विश्वमिदं तात त्वत्तो भूतं भविष्यति ॥११५॥ त्वत्तो यज्ञः सर्वहुतः पृषदाज्यं पशुर्द्विधा । ऋचस्त्वत्तोथ सामानि त्वत्त एवाभिजज्ञिरे ॥१९६॥ त्वत्तो यज्ञास्त्वजायन्त त्वत्तो श्वाश्चैव दंतिनः । गावस्त्वत्तः समुद्धूताः त्वत्तो जाताऽवयो मृगा:॥११७॥ त्वन्मुखाद्वाहणा जातास्त्वत्तः क्षत्रमजायत। वैश्यास्तवोरुजाः शूद्रा स्तवपद्भ्यां समुद्रताः॥ ९ ९८॥ अक्ष्णोः सूर्योनिलः श्रोत्राच्चन्द्रमा मनसस्तव । प्राणोतः सुषिराज्जातो मुखादग्निरजायत ॥९ ९ ९॥ नाभितो गगनं द्यौश्च शिरसः समवर्त्तत। दिशः श्रोत्रात्क्षिति:पद्भ्यां त्वत्तः सर्वमभूदिदम् ॥९२०॥ न्यग्रोधः सुमहानल्पे यथाबीजे व्यवस्थितः । ससर्ज्ज विश्वमखिलं बीजभूते तथा त्वयि ॥१२१॥ वीजांकुरसमुद्धूतो न्यग्रोधः समुपस्थितः । विस्तारं च यथा याति त्वत्तः सृष्टौ तथा जगत् ॥९२२॥ यथाहि कदली नान्यतत्वकपत्रेभ्योऽभिदृश्यते । एवं विश्वमिदं नान्यत्त्वत्स्थमीश्वर दृश्यते ॥९२३॥ ह्लादिनी त्वयि शक्तिस्सा त्वय्येका सहभाविनी । ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते॥९२४॥ पृथग्भूतैकभूताय सर्वभूताय ते नमः । व्यक्तं प्रधानं पुरुषो विराट् सम्राट् तथा भवान् ॥१२५॥ सर्वस्मिन्सर्वभूतस्त्वं सर्वःसर्वस्वरूपधूक् । सर्व त्वत्तःसमुद्धूतं नमःसर्वात्मने ततः ॥१२६॥ कह रहे हैं वह में सब कुछ करूंगा । इसके बाद श्रीभगवान् अन्तर्धान हो गये और ब्रह्माजी उन्हें जान न सके॥११२॥ भगवान् विष्णु के चले जाने पर लोक पितामह ब्रह्माजी ने पुनः सृष्टि की; क्योंकि वे लोकों की उत्पत्ति स्थान हैं ॥११३॥ ब्रह्माजी को देखकर वाक्यज्ञो में श्रेष्ठ नारदजी ने ब्रह्माजी की स्तुति करते हुए कहा । अनन्तशिरों, अनन्त नेत्रों तथा अनन्त चरणों वाले सर्वव्यापक पुरुष सम्पूर्ण पृथिवी को व्याप्त करके उसके बाहर अनन्त प्रदेश तक स्थित हुआ ॥११४॥ उसी से सम्पूर्ण भूत एवं भविष्यत् पदार्थो की उत्पत्ति हुयी । इसीलिए हे तात ! आप से ही भूत एवं भविष्यत् पदार्थ उत्पन्न हैं ॥११५॥ आप से ही यज्ञ, अग्नि, हविष्य, घी, दो प्रकार के (ग्राम्य एवं अरण्य) पशुओं की उत्पत्ति हुयीं । आपसे ऋचाओं एवं सामों की उत्पत्ति हुयी ॥११६॥ आपसे ही यज्ञों की उत्पत्ति हुयी और आप से अश्व तथा दोनों ओर दाँतों वाले पशु उत्पन्न हुए । आप से ही गायें, भेंड और मृग उत्पन्न हुए।।११७।। आपके मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुए, आप से ही क्षत्रिय हुए और आपके ऊरू भाग से वैश्य हुए तथा आपके दोनों पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए ॥११८॥ आपकी आँखों से सूर्य मन से चन्द्रमा आपके अन्तश्छिद्र से प्राण हुआ तथा मुख से अग्नि की उत्पत्ति हुयी ॥११९॥ आपकी नाभि से अन्तरिक्ष हुआ और शिर से चुलोक हुआ । कानों से दिशाओं की उत्पत्ति हुयी, आपके पैरों से पृथिवी की उत्पत्ति हुयी । आप से ही यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ॥१२०॥ जिस तरह छोटे से बीज में विशाल वट वृक्ष विद्यमान रहता है उसी तरह बीज स्वरूप आप से ही सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि हुयी है ॥१२१॥ बीज से उत्पन्न होने वाला अङ्कुर जिसतरह वट वृक्ष होकर विस्तार को प्राप्त करता है, उसीतरह आपके द्वारा की जाने वाली इस सृष्टि से विस्तीर्ण सम्पूर्ण जगत् विद्यमान है ॥१२२॥ जिस तरह से केले के स्तम्भ में छिलका और पत्तों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखता है; उसी तरह हे स्वामिन् ! आप से भिन्न यह जगत् कुछ भी नहीं है ॥१२३॥ आपके साथ रहने वाली केवल ह्लादिनी शक्ति है । आप प्राकृतिक गुणों से रहित हैं । अतएव आपमें आह्लाद और ताप से मिश्रित शक्ति नहीं हैं ॥१ २४॥ आप पृथक् स्वरूप, एक स्वरूप तथा सर्व स्वरूप है । आप को नमस्कार है । आप ही, व्यक्त (महदादि), प्रधान (प्रकृति) विराट् पुरुष तथा सम्राट् (मुक्त जीव)

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