Srishti Khanda Extracted Page 62

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-62

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Sanskrit Original

श्रिया युक्तं च त्रैलोक्यं विष्णुना प्रतिपालितं । देवास्तु ते तदा प्रोक्ता ब्रह्मणा लोकधारिणा ॥८ २॥ भवतां रक्षणार्थाय मया विष्णुर्नियोजितः । उमापतिश्च देवेशो योगक्षेमं करिष्यतः ॥८३॥ उपास्यमानौ सततं युष्मत्सेमकरौ यतः । ततःक्षेम्यौ सदा चैतौ भविष्येते वरप्रदौ ॥८ ४॥ एवमुक्त्वा तु भगवान् जगामगतिमात्मनः । अदर्शनं गते देवे सर्वलोकपितामहे ॥८ ५॥ देवलोकं गते शक्रे स्वं लोकं हरिशंकरौ। प्राप्तौ तु तत्क्षणाद्ेवौ स्थानं कैलासमेव च ॥८६॥ ततस्तु देवराजेन पालितं भुवनत्रयम् । एवं लक्ष्मीर्महाभागा उत्पन्ना क्षीरसागरात् ॥८७॥ पुनः ख्यात्यां समुत्पन्ना भृगोरेषा सनातनी। श्रिया सह समुत्पन्ना भृगुणा च महर्षिणा ॥८८॥ स्वनाम्ना नगरी चैव कृतापूर्वसारित्तटे । नर्मदायां महाराज ब्रह्मणा चानुमोदिता ॥८९॥ लक्ष्मीः पुरं स्वप्रत्रे स्वंसहकुञ्जिकयाऽप्य च । आगतादेवलोकं साऽयाचतागत्य वै पुनः ॥९०॥ लोभान्नदतं तु पुरं प्रार्थयाना यदा पुनः । भृगोःसकाशान्नावाप तदा चैवाह केशवम् ॥९९॥ परिभूता तु पित्राहं गृहीतं नगरं मम । तस्य हस्तात्त्वमाक्षिप्य पुरंतच्चानय स्वयम् ॥९२॥ तं गत्वा पुंडरीकाक्षो दिवश्चक्रगदाधरः । भृगुं सानुनयं प्राह कन्यायै पुरमर्पय ॥९३॥ कुञ्जिकातालिकेचोभे दीयेतां च प्रसादतः । भृगुस्तं कुपितःप्राह नार्पयिष्याम्यहं पुरम् ॥९४॥ न लक्ष्म्यास्तत्पुरं देव मया चेदं स्वयं कृतम्। भगवन्नैव दास्यामि त्यजाक्षेपं तु केशव ॥९५॥ तं प्राह देवोभूयोपि ललक्ष्म्यास्तत्पुरमर्पय । सर्वथा तु त्वया त्याज्यं वचनान्मे महामुने ॥९६॥ उसी समय सभी जीवों की बुद्धि धार्मिक हो गयी ॥८ १॥ श्रीसम्पत्न त्रैलोक्य का पालन भगवान् विष्णु ने किया । उस समय लोक को धारण करने वाले ब्रह्माजी ने देवताओं से कहा ॥८२॥ मैंने आपलोगों की रक्षा करने के लिए भगवान् विष्णु को नियुक्त कर दिया है । शङ्करजी तथा श्रीभगवान् आपलोगों का निर्वाह करेंगे ॥८३॥ चूकि उपासना किये जाने पर ये दोनों आप सबों का कल्याण करेंगे, अतएव ये दोनों क्षेम्य तथा आपलोगों को वर प्रदान करने वाले होंगे॥८३-८४॥ इस तरह से कहकर ब्रह्माजी अपने लोक में चले गये । सर्वलोक पितामह ब्रह्माजी के अदृश्य हो जाने पर ॥८५॥ तथा इन्द्र के स्वर्ग लोक चले जाने पर, उसी समय श्रीभगवान् विष्णु अपने लोक में चले गये और शङ्करजी कैलास पर्वत पर चले गये ॥८६॥ उसी समय से देवराज भी त्रैलोक्य के स्वामी हो गये । इसतरह से महाभागा लक्ष्मीजी क्षीरसागर से उत्पन्न हुयी ॥८७॥ ये ही पुनः भृगु महर्षि की पत्नी ख्याति देवी के गर्म से उत्पन्न हुयीं । ये सनातनी हैं महर्षि भृगु से लक्ष्मी देवी के साथ एक नगरी भी उत्पन्न हुयी, नर्मदा नदी के पूर्व तट पर उसे लक्ष्मीजी ने बसाया और ब्रह्माजी ने उसका अनुमोदन किया ॥८८-८९॥ लक्ष्मीजी ने उस नगरी का नाम लक्ष्मीपुर रखा और नगरी का ताला और चाबी को आपने पिता को समर्पित किया । जब वे देवलोक आयीं तो पुन: अपने पिता से उस नगरी की चाभी माँगीं ॥९०॥ प्रार्थना करने पर भी महर्षि ने लोभ के कारण जब उन्हें उस नगरी को नहीं दिया तो उन्होंने भगवान् केशव से कहा ॥९१॥ पिताजी ने मुझे धोखा दिया है उन्होंने मेरा नगर ले लिया है अतएव आप उनके हाथ से छीन कर मेरे नगर को लाइये ॥९२॥ चक्र तथा गदाधारी श्रीभगवान् उन मुनि के पास जाकर उस नगरी को देने के लिए प्रार्थना किये और कहे कि आप अपनी पुत्री को उस नगर को दे दें ॥९३॥ प्रसन्नता पूर्वक ताला और चाभी दे दें । करुद्ध होकर भृगु महर्षि ने कहा मैं नगर नहीं दे सकता हूँ ॥९४॥ वह लक्ष्मी का नगर नहीं है मैने उसे स्वयं उत्पन्न किया है हे केशव ! आप आग्रह छोड़ दें मैं नगर नहीं दे सकता हूँ ॥९५॥ इसके बाद भी भगवान् ने महर्षि से कहा लक्ष्मी के उस नगर को आप दे दें । हे महामुने ! मेरे कथनानुसार आपको उस

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